बर्फीली वादियों में तैयार होने वाला लाहौल का सेब अब देश की फल मंडियों में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करवा रहा है। गुणवत्ता, स्वाद और लंबे समय तक सुरक्षित रहने की क्षमता के चलते इस सेब की मांग लगातार बढ़ रही है। इस बार प्रदेश के प्रमुख सेब उत्पादक क्षेत्रों कुल्लू और शिमला में उत्पादन कम रहने का फायदा भी लाहौल के बागवानों को मिला है।

 

बाजार में 20 किलो की पेटी के 1300 से 1500 रुपये तक दाम मिलने से बागवानों को राहत मिली है, लेकिन बेहतर कीमत और बढ़ते उत्पादन के बीच लाहौल के बागवानों के सामने एक बड़ा सवाल भी खड़ा है। आखिर जिस सेब की गुणवत्ता के दम पर बाजार में पहचान बन रही है, उसे अपने ही नाम से क्यों नहीं बेचा जा रहा?

 

दरअसल, लाहौल के बागवानों की शिकायत है कि देश की कई मंडियों में उनके क्षेत्र का सेब किन्नौर एप्पल के नाम से बेचा जा रहा है। इससे लाहौल की अपनी अलग पहचान विकसित नहीं हो पा रही है। अब बागवान चाहते हैं कि सरकार और बागवानी विभाग लाहौल एप्पल के नाम से अलग ब्रांड विकसित करने की दिशा में कदम उठाएं, ताकि उत्पाद को उसकी वास्तविक भौगोलिक पहचान मिल सके और बागवानों को भविष्य में बेहतर बाजार मूल्य प्राप्त हो।

90 फीसदी तुड़ान पूरा, अब ग्रेडिंग और पैकिंग में जुटे बागवान

लाहौल घाटी में इस वर्ष सेब सीजन लगभग समाप्ति की ओर है। करीब 90 फीसदी सेब की तुड़ान हो चुकी है और अब बागवान शेष फसल को समेटने के साथ ग्रेडिंग और पैकिंग के काम में जुटे हैं। लगभग 10 फीसदी तुड़ान अभी बाकी है। इस बार 20 किलो की पेटी के 1300 से 1500 रुपये तक दाम मिलने से उत्पादकों को संतोष है । प्रदेश के अन्य प्रमुख सेब उत्पादक क्षेत्रों में कम पैदावार के कारण लाहौल के सेब की मांग बढ़ी। बाहरी राज्यों के व्यापारी भी खरीद के लिए घाटी पहुंच रहे हैं।

 

स्थानीय बागवान राहुल ठाकुर, महेंद्र और सुरेश कुमार के अनुसार लाहौल के सेब की गुणवत्ता अच्छी है। इसका छिलका मोटा और फल रसदार होता है। यही वजह है कि यह सेब लंबे समय तक सुरक्षित रह सकता है। परिवहन के दौरान भी इसकी गुणवत्ता बनाए रखने में मदद मिलती है।

 

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दो दशक में सेब उत्पादन का नक्शा बदला

लाहौल घाटी में सेब उत्पादन की कहानी पिछले दो दशकों में तेजी से बदली है। शुरुआती दौर में करीब 450 हेक्टेयर क्षेत्र में सेब की खेती होती थी और उत्पादन लगभग 125 मीट्रिक टन तक सीमित था। आज सेब उत्पादन का क्षेत्रफल 1000 हेक्टेयर से अधिक पहुंच चुका है। बागवानी विभाग के आंकड़ों के अनुसार घाटी में अब सालाना लगभग 3000 से 4000 मीट्रिक टन सेब का उत्पादन हो रहा है। हर वर्ष करीब 60 हजार नए पौधे लगाए जा रहे हैं। इससे लगभग 120 हेक्टेयर नए क्षेत्र में बागवानी का विस्तार हो रहा है।

 

इस बदलाव ने लाहौल की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भी सेब को महत्वपूर्ण स्थान दिलाया है। पहले जिन क्षेत्रों में खेती के सीमित विकल्प थे, वहां अब बागवानी किसानों के लिए आय का प्रमुख जरिया बन रही है।

पट्टन घाटी बनी सेब उत्पादन का प्रमुख केंद्र

लाहौल की पट्टन घाटी सेब उत्पादन के प्रमुख केंद्र के रूप में उभर रही है। यहां अनुकूल परिस्थितियों और बागवानी के बढ़ते रकबे ने उत्पादन को नई गति दी है। जलवायु परिवर्तन के कारण अब घाटी के उन क्षेत्रों में भी सेब की खेती की संभावनाएं विकसित हुई हैं, जिन्हें पहले इस फसल के लिए अधिक अनुकूल नहीं माना जाता था। बागवानी के विस्तार से स्थानीय स्तर पर रोजगार और स्वरोजगार के अवसर भी बढ़ रहे हैं।

 

लाहौल में सेब उत्पादन के साथ बगीचों को ठेके पर देने का चलन भी बढ़ा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार घाटी के 70 फीसदी से अधिक बागवान अपने बगीचे ठेके पर दे चुके हैं। इससे बागवानों को फसल की देखरेख और विपणन की जिम्मेदारी से कुछ राहत मिलती है। वहीं, सीधे मंडियों में सेब बेचने वाले उत्पादक भी इस बार बेहतर दाम मिलने से संतुष्ट हैं। बाजार में अच्छी मांग रहने से बागवानों को अपनी मेहनत का उचित मूल्य मिलने की उम्मीद जगी है।

 

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अलग ब्रांड बने तो राष्ट्रीय बाजार में चमकेगा लाहौल एप्पल

लाहौल के बागवानों के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती अपने उत्पाद को अलग पहचान दिलाने की है। उनका मानना है कि जिस तरह किन्नौर एप्पल ने देशभर में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है, उसी तरह लाहौल के सेब को भी स्वतंत्र ब्रांड के रूप में स्थापित किया जाना चाहिए। 

 

इसके लिए सरकार और बागवानी विभाग को ब्रांडिंग, पैकेजिंग और विपणन की दिशा में पहल करनी होगी। यदि लाहौल एप्पल के नाम से अलग पहचान विकसित होती है तो इससे न केवल उत्पाद की बाजार में पहचान मजबूत होगी, बल्कि बागवानों को भी बेहतर कीमत मिलने की संभावनाएं बढ़ेंगी।

 

इसके लिए क्षेत्र की भौगोलिक विशेषताओं, सेब की गुणवत्ता और उत्पादन की विशिष्टताओं को आधार बनाकर बाजार रणनीति तैयार की जा सकती है। एपीएमसी कुल्लू एवं लाहौल-स्पीति के सचिव दीक्षित जरियाल के अनुसार घाटी में सेब सीजन अब अंतिम चरण में है और लगभग 10 फीसदी तुड़ान शेष है। अब सवाल सिर्फ सेब की कीमत का नहीं, बल्कि उसकी पहचान का है। जिस लाहौली सेब ने अपनी गुणवत्ता के दम पर बाजार में जगह बनाई है, उसे कब अपने नाम से राष्ट्रीय मंडियों में पहचान मिलेगी? यह मांग अब घाटी के बागवानों के लिए एक अहम मुद्दा बनती जा रही है।