महाराष्ट्र सरकार एक नया DELTA Act लाने का प्रस्ताव तैयार कर रही है। इसका पूरा नाम है महाराष्ट्र डिजिटाइजेशन ऐंड एक्सचेंज ऑफ लैंड टोकन एसेट (डेल्टा अधिनियम)। इसके तहत जमीन जैसी बड़ी संपत्तियों को डिजिटल टोकन के रूप में बदला जा सकेगा। बता दें कि अगर राज्य में यह कानून लागू होता है, तो महाराष्ट्र देश का पहला ऐसा राज्य बन सकता है, जहां जमीन के मालिकाना हक या उसकी आर्थिक कीमत को ब्लॉकचेन पर डिजिटल टोकन के रूप में दर्ज करने की कानूनी व्यवस्था होगी।

 

बता दें कि इसका मकसद जमीन के लेनदेन को आसान, तेज और पारदर्शी बनाना है। आपके मन में अब सवाल उठ रहा होगा कि आखिर DELTA Act है क्या और इससे क्या बदलेगा। आज हम इसी बारे में विस्तार से जानने की कोशिश करेंगे। 

 

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DELTA Act है क्या, भू-आधार से कितना अलग? 

इसको लेकर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने मुंबई में 'महाराष्ट्र डिजिटाइजेशन एंड एक्सचेंज ऑफ लैंड टोकन एसेट एक्ट (DELTA एक्ट)' के मसौदे के बारे में एक बैठक की अध्यक्षता की। बता दें कि भू-आधार यानी ULPIN और DELTA Act दोनों का संबंध जमीन के रिकॉर्ड को डिजिटल बनाने से है। हालांकि दोनों का काम अलग है। भू-आधार में हर जमीन के हिस्से को 14 अंकों की एक खास पहचान संख्या दी जाती है। इससे जमीन की पहचान और उससे जुड़े रिकॉर्ड को आसानी से जोड़ा जा सकता है।

 

दूसरी ओर DELTA Act महाराष्ट्र सरकार का प्रस्तावित कानून है, जिसके तहत जमीन के मालिकाना हक या उसकी कीमत को ब्लॉकचेन पर डिजिटल टोकन के रूप में दर्ज करने की व्यवस्था बनाने की बात की जा रही है। ब्लॉकचेन एक डिजिटल बही-खाता है, जिसमें इंटरनेट के जरिए होने वाले सभी लेन-देन और डेटा को सुरक्षित तरीके से रिकॉर्ड किया जाता है। 

 

सरल भाषा में कहें तो भू-आधार जमीन की पहचान और रिकॉर्ड को डिजिटल बनाता है, जबकि डेल्टा जमीन के मालिकाना हक या उसकी कीमत को डिजिटल टोकन के रूप में बदलने की व्यवस्था बनाने का प्रस्ताव है। इससे जमीन के रिकॉर्ड की जांच और लेनदेन को आसान और पारदर्शी बनाने में मदद मिल सकती है।

कैसे काम आएगा यह?  

भारत में जमीन से जुड़े लेनदेन में कागजी रिकॉर्ड, दस्तावेजों की जांच, रजिस्ट्रेशन में समय और मालिकाना हक के विवाद जैसी समस्याएं हैं। महाराष्ट्र सरकार के अनुमान के मुताबिक, राज्य में संभावित टोकनाइजेशन एसेट बेस करीब ₹50 लाख करोड़ का है। वहीं RBI पहले से कार्ड पेमेंट में टोकनाइजेशन का इस्तेमाल कर रहा है।

 

इसके अलावा RBI और SEBI वित्तीय संपत्तियों, खासकर कॉरपोरेट बॉन्ड के टोकनाइजेशन की संभावनाओं पर काम कर रहे हैं। IFSCA भी रियल वर्ल्ड एसेट्स (RWA) के टोकनाइजेशन के लिए नियमों पर विचार कर रहा है।

 

अगर महाराष्ट्र में यह व्यवस्था सफल होती है, तो बड़े रियल एस्टेट बाजार वाले कर्नाटक, तमिलनाडु, गुजरात, तेलंगाना और दिल्ली जैसे राज्य भी ऐसी व्यवस्था पर विचार कर सकते हैं। हालांकि, जमीन राज्य का विषय है और हर राज्य के जमीन रिकॉर्ड व कानून अलग-अलग हैं।

 

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आम आदमी के लिए क्या बदलेगा? 

  • नए नियम से जमीन के रिकॉर्ड की जांच आसान हो सकती है, इससे मालिकाना हक और संपत्ति से जुड़े रिकॉर्ड डिजिटल रूप में देखे जा सकेंगे।
  • जमीन के लेनदेन में समय की बचत हो सकती है। रिकॉर्ड और दस्तावेजों की जांच डिजिटल होने से प्रक्रिया तेज हो सकती है।
  • फर्जीवाड़े का खतरा कम हो सकता है, क्योंकि ब्लॉकचेन पर रिकॉर्ड होने से उसमें बदलाव करना मुश्किल होगा।
  • मालिकाना हक का रिकॉर्ड ज्यादा पारदर्शी होगा। जमीन के अधिकार और उनके ट्रांसफर का डिजिटल रिकॉर्ड रखा जा सकेगा।
  • जमीन का छोटा हिस्सा भी डिजिटल रूप में दिखा सकेंगे, इसमें किसी संपत्ति की हिस्सेदारी को टोकन के जरिए दर्शाने की व्यवस्था बन सकती है।
  • निवेश का नया रास्ता खुल सकता है, इस स्थिति में आम लोगों के लिए भी कुछ संपत्तियों में छोटी हिस्सेदारी के जरिए निवेश की संभावना बन सकती है।
  • विवाद सुलझाने में मदद मिल सकती है, इस स्थिति में डिजिटल रिकॉर्ड से जमीन के पुराने लेनदेन और मालिकाना हक की जानकारी आसानी से मिल सकती है।