अवध के नवाबों ने 18वीं और 19वीं शताब्दी में जिन आम के बागों की नींव रखी थी, वही आज उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी कृषि पहचान बन चुके हैं। मलिहाबाद का दशहरी आम अब केवल एक फल नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये की अर्थव्यवस्था, हजारों परिवारों की रोजी-रोटी और भारत की वैश्विक पहचान का हिस्सा बन गया है। अपनी खास मिठास और खुशबू के दम पर यह आम आज खाड़ी देशों से लेकर अमेरिका और यूरोप तक पहुंच रहा है।
मलिहाबादी दशहरी आम की कहानी लखनऊ की काकोरी तहसील के दशहरी गांव से शुरू होती है। यहीं स्थित एक ऐतिहासिक 'मदर ट्री' को दशहरी आम की मूल जननी माना जाता है। यह पेड़ करीब 185 से 200 वर्ष पुराना बताया जाता है और आज भी फल देता है। यह पेड़ कभी नवाब सैयद अंसार जैदी के बाग में था और आज भी उनके परिवार की देखरेख में मौजूद है। दशहरी गांव में यह पेड़ मलिहाबादी आम की विरासत का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है।
नवाबों ने लगाया, बागवानों ने संवारा
18वीं और 19वीं शताब्दी में अवध के नवाबों ने आम की बागवानी को संरक्षण दिया। बड़े-बड़े बाग लगाए गए और अच्छी किस्मों को विकसित करने का काम शुरू हुआ। दशहरी गांव से निकली आम की यह किस्म धीरे-धीरे मलिहाबाद, माल, काकोरी और आसपास के क्षेत्रों में फैलती चली गई। बागवानों ने कलम तकनीक के जरिए इसकी पौध तैयार की और देखते ही देखते यह किस्म उत्तर भारत की सबसे लोकप्रिय आम प्रजातियों में शामिल हो गई।
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हजारों हेक्टेयर में फैला आम का साम्राज्य
आज मलिहाबाद को "मंगो कैपिटल" कहा जाता है। यहां हजारों हेक्टेयर में आम की खेती होती है और दशहरी इसकी पहचान बना हुआ है। दशहरी के अलावा लंगड़ा, चौसा, सफेदा, आम्रपाली और कई अन्य किस्मों की भी खेती की जाती है। आम के मौसम में पूरा इलाका हरियाली और फलों से लदे बागों से भर जाता है।
दुबई से अमेरिका तक मलिहाबाद की धूम
मलिहाबादी दशहरी आम की मांग देश के बड़े शहरों के अलावा विदेशों में भी लगातार बढ़ रही है। संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कतर, ओमान, ब्रिटेन, अमेरिका, जापान और मलेशिया जैसे देशों में हर साल बड़ी मात्रा में आम भेजा जाता है। इसकी खुशबू, कम रेशा और अधिक गूदे की वजह से विदेशी बाजारों में इसे प्रीमियम भारतीय आम माना जाता है।
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1200 करोड़ तक पहुंचा कारोबार
मलिहाबाद का आम उद्योग अब एक विशाल कृषि अर्थव्यवस्था का रूप ले चुका है। किसानों, व्यापारियों, पैकिंग यूनिट, ट्रांसपोर्ट, मंडियों और निर्यातकों को मिलाकर हर साल लगभग 800 से 1200 करोड़ रुपये तक का कारोबार होने का अनुमान लगाया जाता है। आम का सीजन शुरू होते ही पूरे क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियां तेज हो जाती हैं और हजारों परिवारों की आय इसी उद्योग पर निर्भर रहती है।
ऐसे पहुंचता है विदेशों तक
विदेश भेजे जाने वाले आमों की पहले ग्रेडिंग की जाती है। इसके बाद गुणवत्ता जांच, पैकिंग और प्रोसेसिंग की प्रक्रिया पूरी होती है। विशेष पैक हाउस में तैयार होने के बाद आम को लखनऊ और दिल्ली के एयर कार्गो केंद्रों तक पहुंचाया जाता है। वहां से हवाई मार्ग के जरिए इन्हें विभिन्न देशों में निर्यात किया जाता है। यही वजह है कि ताजा दशहरी आम कुछ ही दिनों में विदेशी बाजारों तक पहुंच जाता है।
बागवानों के सामने बढ़ती चुनौतियां
मौसम में बदलाव मलिहाबाद के बागवानों के लिए सबसे बड़ी चिंता बनकर उभरा है। बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि, तेज हवाएं और बढ़ती गर्मी उत्पादन को प्रभावित कर रही हैं। इसके अलावा कीट रोग, बढ़ती लागत और किसानों को उचित मूल्य न मिल पाना भी बड़ी समस्या है। कई किसान मानते हैं कि बिचौलियों की वजह से उन्हें उनकी उपज का पूरा लाभ नहीं मिल पाता।
क्या सुधार की जरूरत है?
विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक कोल्ड स्टोरेज, अधिक पैक हाउस, बेहतर निर्यात सुविधाएं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्रांडिंग से मलिहाबादी दशहरी आम का कारोबार कई गुना बढ़ सकता है। किसानों को सीधे निर्यातकों से जोड़ने और आधुनिक बागवानी तकनीकों का प्रशिक्षण देने की भी जरूरत है। इससे न सिर्फ उत्पादन बढ़ेगा बल्कि किसानों की आय में भी बड़ा इजाफा होगा।
विरासत भी, अर्थव्यवस्था भी
करीब दो सदी पहले दशहरी गांव में खड़े एक पेड़ से शुरू हुई कहानी आज पूरी दुनिया तक पहुंच चुकी है। नवाबों की शाही पसंद रहा यह आम अब भारत की कृषि विरासत और उत्तर प्रदेश की आर्थिक ताकत का प्रतीक बन गया है
