उत्तर प्रदेश में गर्मी के मौसम में बोया जाने वाला साठी धान एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। करीब दो महीने में तैयार होने वाली यह फसल किसानों को अतिरिक्त आमदनी देती है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इसकी खेती भूजल संसाधनों पर भारी दबाव डाल रही है। पश्चिमी और मध्य यूपी के कई जिलों में साठी धान का रकबा लगातार बढ़ रहा है, जिससे जल संरक्षण को लेकर नई बहस छिड़ गई है।

 

साठी धान की खेती मुख्य रूप से शाहजहांपुर, हरदोई, सीतापुर, लखीमपुर खीरी, बहराइच, पीलीभीत, फर्रुखाबाद, मुजफ्फरनगर, शामली, मेरठ और आसपास के जिलों में बड़े पैमाने पर की जाती है। किसान गेहूं कटने के बाद खाली पड़े खेतों में यह फसल लगाते हैं और मानसून आने से पहले इसकी कटाई कर लेते हैं।

 

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आखिर क्या है साठी धान?

साठी धान एक अल्पावधि धान फसल है, जो लगभग 60 से 90 दिनों में तैयार हो जाती है। फरवरी-मार्च में इसकी बुवाई और जून-जुलाई में कटाई होती है। कम समय में तैयार होने के कारण इसे किसानों की नकदी फसल माना जाता है। कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक, साठी धान की औसत पैदावार 35 से 50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पहुंच जाती है। अच्छी देखभाल और अनुकूल मौसम मिलने पर उत्पादन इससे भी अधिक हो सकता है। साठी धान की खेती से किसानों को प्रति हेक्टेयर 60 हजार रुपये से लेकर एक लाख रुपये तक की सकल आय हो सकती है। यही वजह है कि बड़ी संख्या में किसान कम समय में अतिरिक्त आमदनी के लिए इस फसल की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

 

विशेषज्ञों का कहना है कि साठी धान की खेती उस समय होती है जब बारिश नहीं होती और पूरी सिंचाई भूजल पर निर्भर रहती है। एक किलो चावल उत्पादन में हजारों लीटर पानी खर्च होता है। मई और जून की भीषण गर्मी में बार-बार सिंचाई करनी पड़ती है, जिससे ट्यूबवेलों पर दबाव बढ़ जाता है।

 

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लखनऊ से उठी चेतावनी

लखनऊ स्थित कृषि एवं जल प्रबंधन विशेषज्ञों का कहना है कि यदि साठी धान का रकबा लगातार बढ़ता रहा तो कई जिलों में भूजल स्तर तेजी से नीचे जा सकता है। कृषि विभाग भी किसानों को कम पानी वाली फसलों की ओर बढ़ने की सलाह देता रहा है।

 

किसानों का कहना है कि गेहूं कटने और खरीफ सीजन शुरू होने के बीच खेत खाली छोड़ने से कोई आय नहीं होती। ऐसे में साठी धान उन्हें अतिरिक्त कमाई का अवसर देता है। कई किसान इसे खेती की आर्थिक मजबूरी और लाभकारी विकल्प बताते हैं।

उपयोगी फसल या दुरुपयोग?

साठी धान किसानों को कम समय में अच्छा मुनाफा देता है लेकिन इसकी भारी जल खपत भविष्य के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक सिंचाई तकनीक, जल संरक्षण और वैकल्पिक फसलों को बढ़ावा देकर ही इस समस्या का समाधान निकाला जा सकता है। उत्तर प्रदेश में साठी धान फिलहाल किसानों की आय बढ़ाने का मजबूत माध्यम बना हुआ है लेकिन भूजल संकट की आशंका ने इसकी उपयोगिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले समय में सरकार, कृषि वैज्ञानिकों और किसानों को मिलकर ऐसा रास्ता निकालना होगा जिससे खेती भी लाभकारी रहे और जल संसाधन भी सुरक्षित रहें।