हर साल मानसून के साथ कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी नदी के पानी को लेकर विवाद भी लौट आता है। इस बार भी मामला तब गरमा गया जब कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) ने कर्नाटक को 15 दिनों तक रोजाना 3,500 क्यूसेक पानी तमिलनाडु को छोड़ने का निर्देश दिया। आदेश के बाद दोनों राज्यों के बीच राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है, जबकि किसान संगठन भी सड़कों पर उतर आए हैं।
कर्नाटक का कहना है कि इस साल कावेरी बेसिन में सामान्य से कम बारिश हुई है। जलाशयों में पानी का स्तर लगातार नीचे है और राज्य के सामने पीने के पानी, सिंचाई और पशुओं के लिए पानी उपलब्ध कराने की चुनौती है। दूसरी ओर, तमिलनाडु का तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट और कावेरी जल विवाद ट्रिब्यूनल के आदेश के मुताबिक उसे उसके हिस्से का पानी मिलना ही चाहिए। यही टकराव हर बार मानसून के दौरान विवाद को फिर से जिंदा कर देता है।
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हर मानसून में क्यों लौट आता है विवाद?
हर साल मानसून के दौरान कावेरी जल विवाद क्यों बढ़ जाता है? इसकी वजह डिस्ट्रेस ईयर यानी कम बारिश वाले सालों के नियम हैं। 16 फरवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने 2007 के कावेरी ट्रिब्यूनल के फैसले में बदलाव करते हुए कर्नाटक के हिस्से का पानी बढ़ाकर 284.75 TMC और तमिलनाडु के हिस्से का पानी 404.25 TMC तय किया था। साथ ही, कोर्ट ने साफ कहा था कि किसी भी स्थिति में सबसे पहले पीने के पानी की जरूरत को प्राथमिकता दी जाएगी।
जब बारिश अच्छी होती है तो कावेरी का पानी बिना किसी परेशानी के तमिलनाडु तक पहुंच जाता है। जैसे ही मानसून कमजोर पड़ता है पानी के बंटवारे को लेकर विवाद शुरू हो जाता है। ट्रिब्यूनल के अनुपातिक कटौती वाले नियम को लेकर दोनों राज्यों में खींचतान बढ़ जाती है। तमिलनाडु कहता है कि उसे नियम के मुताबिक अपना तय हिस्सा मिलना चाहिए, जबकि कर्नाटक का कहना होता है कि पहले अपने लोगों के पीने के पानी की जरूरत पूरी करनी होगी।
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ताजा विवाद क्या है?
CWRC के आदेश के बाद तमिलनाडु का दावा है कि 1 जून से 23 जुलाई के बीच उसे तय कोटे से काफी कम (केवल 3.5 TMC) पानी मिला है, जबकि कम बारिश के नियम के हिसाब से भी उसे कम से कम 3 TMC पानी और मिलना चाहिए था। कर्नाटक सरकार इस गणित को मानने को तैयार नहीं है। मुख्यमंत्री डी के शिवकुमार का कहना है कि नदी का तल सूखा पड़ा है, इसलिए तमिलनाडु की सीमा तक 3,500 क्यूसेक पानी पहुंचाने के लिए कर्नाटक को करीब दोगुना पानी छोड़ना होगा। इससे रास्ते में काफी पानी बर्बाद हो जाएगा।
इसी वजह से कर्नाटक सरकार इस आदेश को कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) में चुनौती देने की तैयारी कर रही है। वहीं, इस मुद्दे को लेकर बेंगलुरु, मैसूर और मांड्या में किसान और कन्नड़ संगठनों ने सड़कों पर उतरकर विरोध शुरू कर दिया है।
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कितना पुराना है कावेरी जल विवाद?
कावेरी जल विवाद भारत के सबसे पुराने अंतरराज्यीय जल विवादों में से एक है, जो मुख्य रूप से कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच है। इसकी नींव 1892 और 1924 के औपनिवेशिक समझौतों में पड़ी, जिनमें मैसूर रियासत को नए बांध या जलाशय बनाने से पहले मद्रास प्रेसिडेंसी की मंजूरी लेना जरूरी था। आधुनिक विवाद 1974 में तब तेज हुआ, जब कर्नाटक ने तमिलनाडु की सहमति के बिना कावेरी के पानी का उपयोग बढ़ाया। कई दौर की बातचीत के बावजूद समाधान नहीं निकल सका।
केंद्र सरकार ने 1990 में कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) का गठन किया, जिसने 2007 में तमिलनाडु को 419 TMC, कर्नाटक को 282 TMC, केरल को 30 TMC और पुडुचेरी को 7 TMC पानी आवंटित किया। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने बेंगलुरु की पेयजल जरूरतों को देखते हुए कर्नाटक को 14.75 TMC अतिरिक्त पानी दिया। फैसले के बाद कावेरी मैनेजमेंट बोर्ड बना लेकिन हर साल मानसून, पानी की कमी और मेकेदातु बांध जैसे मुद्दों पर विवाद फिर उभर जाता है।
