करीब 4,200 करोड़ रुपये की लागत से तैयार हुआ लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे उद्घाटन के महज 19 दिन के भीतर तीन बार धंसने और उखड़ने से सवालों के घेरे में आ गया है। ताजा मामला उन्नाव के असोहा ब्लॉक के बेगमखेड़ा गांव के पास सामने आया है, जहां सड़क तीसरी बार धंस गई। लगातार सामने आ रही घटनाओं ने निर्माण की गुणवत्ता, निगरानी व्यवस्था और हाईटेक तकनीक के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जानकारी के मुताबिक एक्सप्रेसवे के किलोमीटर 30.07 पर सड़क धंसने के बाद निर्माण एजेंसी फिर से मरम्मत में जुटी है। इससे पहले 25 जुलाई को भी सड़क धंसने की घटना सामने आई थी। हालत यह रही कि मरम्मत सामग्री लेकर पहुंचा भारी ट्रक भी सड़क में धंस गया। उद्घाटन के तीन सप्ताह भी पूरे नहीं हुए और एक्सप्रेसवे की बार-बार बिगड़ती हालत लोगों को हैरान कर रही है।
57 करोड़ प्रति किलोमीटर की सड़क, फिर भी पहली बारिश में फेल
केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने लोकार्पण के दौरान कहा था कि यह एक्सप्रेसवे ऑटोमैटिक इंटेलिजेंस मशीन गाइड कंस्ट्रक्शन तकनीक से बनाया गया है। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के अनुसार अमेरिका और जर्मनी के बाद भारत में पहली बार इस तकनीक का इस्तेमाल किया गया। दावा किया गया कि एक किलोमीटर सड़क के निर्माण पर करीब 57 करोड़ रुपये खर्च हुए। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि इतनी महंगी तकनीक और भारी लागत के बावजूद सड़क पहली ही बरसात में बार-बार क्यों धंस रही है।
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कम बोली में ठेका, फिर कॉस्ट कटिंग का खेल?
निर्माण क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि बड़ी निर्माण कंपनियां अक्सर सबसे कम बोली लगाकर परियोजनाएं हासिल कर लेती हैं। इसके बाद लागत कम करने के लिए कई स्तरों पर कॉस्ट कटिंग की जाती है। पैसा बचाने के लिए अनुभवी इंजीनियरों की जगह कम अनुभव वाले इंजीनियर और तकनीकी कर्मचारी लगाए जाते हैं, जिनके सामने नई तकनीक और गुणवत्ता मानकों के अनुरूप काम करना बड़ी चुनौती होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अर्थवर्क, मिट्टी की कॉम्पैक्टिंग, ड्रेनेज सिस्टम और गुणवत्ता नियंत्रण में लापरवाही बरती जाए तो अत्याधुनिक तकनीक भी सड़क को धंसने से नहीं बचा सकती।
लापरवाही पर कार्रवाई, तीन अधिकारियों पर दो साल का प्रतिबंध
लगातार सामने आई खामियों के बाद एनएचएआई ने परियोजना से जुड़े तीन अधिकारियों को दो वर्ष के लिए डिबार (प्रतिबंधित) कर दिया है। प्रारंभिक जांच में निर्माण कार्य में गुणवत्ता संबंधी लापरवाही मिलने के बाद यह कार्रवाई की गई। मामले की विस्तृत जांच अभी जारी है और आगे और जिम्मेदार लोगों पर भी कार्रवाई हो सकती है।लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे से पहले गंगा एक्सप्रेसवे के निर्माण की गुणवत्ता को लेकर भी शिकायतें सामने आई थीं। वहीं बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे उद्घाटन के कुछ दिनों बाद ही धंसने और गड्ढे बनने के कारण चर्चा में आ गया था। अब लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे की स्थिति ने एक बार फिर बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था पर बहस छेड़ दी है।
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क्या बोले विशेषज्ञ
एन. राम, सेवानिवृत्त अधीक्षण अभियंता, लोक निर्माण विभाग:-
सड़क की मजबूती की सबसे अहम कड़ी अर्थवर्क है। हर 25 से 30 सेंटीमीटर की मिट्टी की परत पर मानक के अनुसार कॉम्पैक्टर चलना जरूरी होता है। ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे का स्तर पर्याप्त ऊंचा होना चाहिए और पानी निकासी की समुचित व्यवस्था भी जरूरी है। यदि कॉम्पैक्टिंग सही तरीके से हो जाए तो मिट्टी स्थिर हो जाती है और सड़क धंसने की संभावना काफी कम हो जाती है।
संदीप गुप्ता, सेवानिवृत्त महाप्रबंधक, उत्तर प्रदेश राज्य सेतु निगम ने बताया,'किसी भी बड़े सड़क प्रोजेक्ट में निर्माण गुणवत्ता के साथ उसकी लगातार निगरानी भी उतनी ही जरूरी होती है। अच्छी सलाहकार एजेंसी और प्रभावी मॉनिटरिंग से ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता है। यदि हर चरण पर गुणवत्ता की सख्त निगरानी होती तो सड़क धंसने जैसी नौबत शायद नहीं आती।'
