मौत के बाद भी अपनों का इंतजार करना पड़ा। कैंसर से जूझ रहे मन्नू साह का निधन हो गया लेकिन घर में अंतिम संस्कार के लिए पैसे नहीं थे। दोनों बेटे प्रदेश में मजदूरी कर रहे थे और समय पर पहुंच नहीं सके। ऐसे में तीन दिनों तक पत्नी शव के पास बैठी रही। पास में बेटे का मोबाइल नंबर तक नहीं था।
आखिर में गांव वालों ने इंसानियत की मिसाल पेश की। ग्रामीणों ने आपस में चंदा जुटाया। किसी ने नकद दिए, किसी ने लकड़ी का इंतजाम किया तो किसी ने अंतिम संस्कार की अन्य सामग्री उपलब्ध कराई। सोशल मीडिया पर जब घटना की जानकारी फैली तो बड़ी संख्या में लोग मृतक के घर पहुंचे। सबने मिलकर पूरे सम्मान और विधि-विधान के साथ गंडक नदी किनारे मन्नू का अंतिम संस्कार कराया।
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बीमारी ने तोड़ दिया था परिवार
स्थानीय लोगों ने बताया कि मन्नू लंबे समय से कैंसर से पीड़ित थे। इलाज के चक्कर में घर की जमा पूंजी खत्म हो गई थी। बीमारी के कारण काम भी नहीं कर पाते थे। घर की आर्थिक स्थिति पहले से ही खराब थी। मृत्यु के बाद स्थिति ऐसी हो गई कि अंतिम संस्कार के लिए भी घर में पैसे नहीं बचे। मन्नू साह के घर में पत्नी के अलावा और कोई नहीं था। दोनों बेटे बादल और राजीव रोजी-रोटी के लिए प्रदेश में मजदूरी करते हैं। पत्नी के पास बेटों का मोबाइल नंबर नहीं था। किसी तरह बेटों को सूचना दी लेकिन दूर होने के कारण वे समय पर घर नहीं पहुंच सके।
तीन दिन तक शव के पास बैठी रही पत्नी
पत्नी ने बताया कि पति के जाने के बाद वह तीन दिनों तक शव के पास ही बैठी रही। घर में न पैसे थे न कोई सहारा। बेटों का नंबर भी उनके पास नहीं था। गांव के कुछ लोगों की मदद से किसी तरह बेटों तक सूचना पहुंचाई गई। लेकिन मजदूरी और दूरी की वजह से बेटे तुरंत नहीं आ सके। इस बीच गांव में चर्चा होने लगी कि अंतिम संस्कार कैसे होगा। इसी बीच कुछ युवाओं ने सोशल मीडिया पर घटना की जानकारी डाली। देखते ही देखते खबर पूरे इलाके में फैल गई।
सोशल मीडिया पर खबर आते ही गांव के लोग जुटने लगे। ग्रामीणों ने आपस में बैठक कर चंदा जुटाने का फैसला लिया। किसी ने 100 रुपये दिए तो किसी ने 500 दिए। कुछ लोगों ने लकड़ी की व्यवस्था की तो कुछ ने घी, तेल और अंतिम संस्कार में लगने वाली अन्य सामग्री जुटाई। धीरे-धीरे घर के बाहर लोगों की भीड़ लग गई। हर कोई अपनी तरफ से मदद करना चाहता था। किसी ने कहा कि वह अर्थी उठाने में मदद करेगा, किसी ने कहा कि वह नदी तक साथ जाएगा। गांव की इस एकजुटता ने एक परिवार की सबसे बड़ी चिंता दूर कर दी।
पति को पत्नी ने दी मुखाग्नि
बेटों के नहीं पहुंच पाने के कारण ग्रामीणों की सहमति से अंतिम संस्कार का निर्णय लिया गया। पूरे विधि-विधान के साथ अंतिम यात्रा निकाली गई। गंडक नदी किनारे ग्रामीणों की मौजूदगी में मन्नू का अंतिम संस्कार किया गया। इस दौरान पत्नी ने ही अपने पति को मुखाग्नि दी। गांव की महिलाओं ने भी पत्नी को ढांढस बंधाया। सबने कहा कि इस दुख की घड़ी में पूरा गांव उनके साथ है।
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जनप्रतिनिधि और समाजसेवी भी पहुंचे
घटना की जानकारी मिलते ही नगर परिषद के जनप्रतिनिधि भी मौके पर पहुंचे। सभापति, वार्ड पार्षद और कई सामाजिक कार्यकर्ता भी घर आए। सभी ने अपनी क्षमता के अनुसार आर्थिक सहायता दी। कुछ लोगों ने परिवार को भविष्य में भी मदद का भरोसा दिलाया। समाजसेवी चंदन कुमार ने कहा कि मन्नू के साथ जो हुआ वह किसी के साथ न हो। सरकार को ऐसे गरीब परिवारों के लिए तत्काल सहायता की व्यवस्था करनी चाहिए।
गांव ने दिया सहारे का संदेश
इस घटना ने साबित कर दिया कि आज भी गांव में इंसानियत जिंदा है। जब सरकारी मदद और अपने देर से पहुंचे तो पड़ोसियों ने ही परिवार का सहारा बनकर अंतिम संस्कार कराया। ग्रामीणों का कहना है कि मन्नू मिलनसार व्यक्ति थे। बीमारी के कारण वह परेशान थे। उनके जाने के बाद परिवार को सहारा देना हमारा कर्तव्य था। अब गांव वाले मृतक के दोनों बेटों के लौटने के बाद परिवार को आगे की मदद देने पर भी चर्चा कर रहे हैं। उनका कहना है कि कैंसर के इलाज में जो कर्ज हुआ है उसे उतारने में भी मदद की जाएगी। इस घटना ने एक बार फिर दिखाया कि पैसे से बड़ी चीज इंसानियत है।
