आज के समय में AI हमारे रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन चुका है। बड़ी-बड़ी टेक कंपनियां न सिर्फ इसमें भारी निवेश कर रही हैं बल्कि अब अपनी इस आधुनिक तकनीक को सेना और रक्षा एजेंसियों को भी उपलब्ध करा रही हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब यह तकनीक सेना के पास चली जाती है तो क्या इसे बनाने वाली कंपनियों के पास इसके इस्तेमाल की निगरानी करने या इसे रोकने की कोई ताकत बचती है?

 

हाल ही में Google और अमेरिकी रक्षा विभाग के बीच हुए एक करार के बाद यह मुद्दा दुनिया भर में सुर्खियों में आ गया है। गुगल DeepMind के कुछ विशेषज्ञों के इस्तीफे ने इन आशंकाओं को और गहरा कर दिया है। मुख्य बहस इस बात पर है कि जब कोई AI मॉडल सेना के सुरक्षित और गोपनीय नेटवर्क पर चलने लगता है तो क्या कंपनी उस पर नजर रख सकती है। या तकनीक सौंपते ही सारा कंट्रोल सेना के हाथ में चला जाता है?

 

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कैसे तय होता है कंपनियों का नियंत्रण

किसी AI पर किसका और कितना नियंत्रण रहेगा यह इस बात से तय होता है कि तकनीक सेना तक किस माध्यम से पहुंच रही है। अगर सेना Google के अपने सर्वर से इंटरनेट के माध्यम से AI चलाती है तो कंपनी यह देख सकती है कि सिस्टम का कितना इस्तेमाल हो रहा है और उसमें क्या तकनीकी खराबी आ रही है। अगर नियमों का उल्लंघन होता है तो कंपनी दूर बैठे ही इसकी सेवा बंद कर सकती है।

 

अगर कंपनी AI के मुख्य कोड की कॉपी सीधे सेना के बंद और गोपनीय सिस्टम में इंस्टॉल कर देती है तो कंपनी का तकनीकी नियंत्रण लगभग खत्म हो जाता है। इंटरनेट से कटे इन नेटवर्कों पर कंपनी चाहकर भी वास्तविक समय में निगरानी नहीं रख सकती और न ही उसे रिमोट से बंद कर सकती है।

सेना AI का इस्तेमाल कैसे करती है?

सेनाएं अपने खुफिया डेटा, सैटेलाइट की तस्वीरों और डिजिटल नक्शों का विश्लेषण करने के लिए AI मॉडल को अपने रक्षा प्रणालियों जैसे 'मावेन स्मार्ट सिस्टम' से जोड़ती हैं। सुरक्षा और गोपनीयता के सख्त नियमों के कारण बाहरी कंपनियों को सेना के गोपनीय डेटा या पूछे जा रहे सवालों को देखने की इजाजत नहीं होती। भले ही सिस्टम के अंदर इस्तेमाल का रिकॉर्ड दर्ज होता हो। जब तक सेना खुद वह रिकॉर्ड न दिखाए तब तक टेक कंपनी को यह पता ही नहीं चलता कि AI से क्या काम लिया जा रहा है।

 

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Google और अमेरिकी सरकार के बीच हुए समझौते में ऑटोनोमस हथियारों और बड़े पैमाने पर आम नागरिकों की जासूसी न करने जैसी शर्तें तो शामिल हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिकी सरकार और सेना के कानूनी फैसलों को रद्द करने का कोई अधिकार कंपनियों के पास नहीं है। इसी तरह, Google के इजराइल के साथ चल रहे 'प्रोजेक्ट निंबस' और अमेरिकी रक्षा विभाग के समझौते में बड़ा अंतर है।

विशेषज्ञों की चिंता और सवाल

DeepMind के शोधकर्ताओं के इस्तीफे ने दो सबसे बड़ी कमियों को सामने रखा है। उनका कहना है कि युद्ध जैसे तनावपूर्ण और संवेदनशील माहौल में यदि AI कोई गलत जानकारी देता है तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। साथ ही उनकी यह भी चिंता है कि यदि AI की गलत सलाह से कोई बड़ा हादसा होता है तो उसकी कानूनी जिम्मेदारी तकनीक बनाने वाली कंपनी की होगी। सेना के ठेकेदार की होगी या फैसला लेने वाले सैन्य अधिकारी की यह बात अभी भी स्पष्ट नहीं है।

 

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सेना को AI देने के बाद टेक कंपनियों का नियंत्रण पूरी तरह से खत्म नहीं होता बल्कि बंट जाता है। कंपनियों के पास तकनीक के अपडेट और ढांचे का अधिकार रहता है जबकि उसके व्यावहारिक इस्तेमाल और डेटा पर पूरी तरह सेना का कब्जा होता है। कंपनियां नीतियां और शर्तें तो बना सकती हैं लेकिन सेना के फैसलों पर उनके पास अंतिम रोक लगाने की शक्ति नहीं होती।