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आदिवासी पहचान या बिहार का बदला, JMM को असम चुनाव से उम्मीद क्यों है?

झारखंड मुक्ति मोर्चा, असम में विस्तार की राह देख रहा है। चुनाव के एलान में महज कुछ दिन बचे हैं, उससे पहले एक बार फिर हेमंत सोरेन असम पहुंचे हैं।

Hemant Soren

झारखंड मुक्ति मोर्चा के चीफ हेमंत सोरेन। Photo Credit: PTI

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झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, अपनी पार्टी का विस्तार असम में करना चाहते हैं। असम प्रदेश कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष गौरव गोगोई ने झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से रांची में गुरुवार को मुलाकात भी की है। यह बैठक विधानसभा भवन में बजट सत्र के दौरान हुई है। एक घंटे से ज्यादा देर तक चली बैटक को लेकर तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रहीं हैं।

गौरव गोगोई के साथ ऑल इंडिया कांग्रेस कमिटी (AICC) के महासचिव जीतेंद्र सिंह और झारखंड मामलों के प्रभारी के राजू भी थे। मुलाकात के बाद हेमंत सोरेन ने ऐसा इशारा किया है, जिससे अटकलों को और बल मिला है। उन्होंने कहा है कि असम में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं इसलिए चर्चाएं चल रहीं हैं।

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किस आधार पर असम गए हैं हेमंत सोरेन?

झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) का असम की राजनीति में उतरना तय था। वह भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बढ़ते दबदबे और कांग्रेस के वोटों के बिखराव को अवसर की तरह देख रहे हैं। JMM की नजरें असम के 'चाय बागान' और झारखंडी मूल के प्रवासियों पर टिकी हैं। झारखंड की एक बड़ी आबादी, असम के बागान वाले इलाकों में बस गई है। ये झारखंड के श्रमिक थे, जो रोजगार की तलाश में असम गए थे। 

असम की 'चाय जनजातियों' के साथ झारखंड का एक भावनात्मक नाता भी है। जिन जनजातियों को चाय जनजाति कहा जाता है, उनमें झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के आदिवासी समुदायों की बड़ी हिस्सेदारी है। संथाल, मुंडा, उरांव, जैसी जनजातियों के लोग बड़ी संख्या में हैं।

इन जनजातियों को ब्रिटिश काल में यहां बसाया गया था। झारखंड मुक्ति मोर्चा, यहां 19 विधासनभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारना चाहती है। JMM खुद को इन पार्टियों का संरक्षक मान रही है। हेमंत सोरेन पहले ही असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को पत्र लिखकर असम के इन चाय जनजातियों को ST का दर्जा देने की मांग की है।

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आदिवासी कार्ड कितना काम करेगा?

झारखंड में BJP आदिवासियों के मुद्दों पर JMM को घेरती है। बीजेपी आरोप लगाती है कि आदिवासियों के बीच बांग्लादेशी मुसलमानों को झारखंड मुक्ति मोर्चा बसा रही है। अब JMM ने असम में उसी 'आदिवासी कार्ड' के जरिए BJP को तगड़ी चुनौती दी है। JMM अब सिर्फ झारखंड ही नहीं, देश के दूसरे राज्यों में भी आदिवासियों की आवाज बनने की कोशिश कर रही है। 

चौंकाने वाली बात क्या है?

हेमंत सोरेन, झारखंड के सोरेन समुदाय के नेता हैं। भारत में अलग-अलग राज्यों में आदिवासियों की प्रथाओं और पहचान में इतना अंतर है कि वह आदिवासी समुदाय से आने के बाद भी सर्वमान्य नेता नहीं बन पाए हैं। झारखंड, बिहार से ही अलग हुआ राज्य है, फिर भी झारखंड मुक्ति मोर्चा को हाल के चुनावों में बिहार में कोई कामयाबी नहीं मिली। अब वह आदिवासी पहचान के साथ ही असम में अपना विस्तार देख रहे हैं।

 

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कांग्रेस से ज्यादा JBP पर जोर क्यों?

झारखंड मुक्ति मोर्चा ने असम में कांग्रेस नहीं, जय भारत पार्टी (JBP) के साथ गठबंधन की योजना बनाई है। JMM सिर्फ अपना वोट बैंक मजबूत करना चाह रही है। बिहार में कांग्रेस ने JMM को भाव नहीं दिया, अब कांग्रेस को असम में JMM तरजीह नहीं देना चाह रही है।  

क्या झारखंड और असम के आदिवासियों का दर्द एक है?

'जल, जंगल और जमीन' की राजनीति करने वाले वाली झारखंड मुक्ति मोर्चा के लिए असम भी बड़ा मौका है। असम में चाय बागान, अपने लिए बेहतर स्थिति चाहते हैं। मजदूरी, आवास से लेकर शिक्षा तक, झारखंड और असम के आदिवासियों की मुश्किलें एक जैसी रही  हैं।  

JMM का जोर है कि राष्ट्रीय पार्टियां, किसी समुदाय विशेष का ख्याल नहीं रख पाती है। कांग्रेस और बीजेपी दोनों दलों के एजेंडे, JMM के एजेंडे से बिलकुल अलग हैं। JMM चाहती है कि मूल पहचान और अधिकार की बात करके जमीनी स्तर पर असम में भी पैठ बनाई जाए। 

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हेमंत सोरेन, मुख्यमंत्री, झारखंड:-
धीरे-धीरे, आप सभी को सब कुछ पता चल जाएगा। असम में जल्द ही विधानसभा चुनाव होने की उम्मीद है, इसलिए रणनीतियां बनाने के लिए काफी चर्चाएं चल रही हैं। मुझे लगता है कि इस बार असम में कुछ बेहतर होगा।

मुलाकात अहम क्यों हैं?

झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रमुख हेमंत सोरेन, असम में कुछ दिनों पहले पहुंचे थे। वहां उन्होंने एक बड़ी जनसभा को संबोधित किया था। हेमंत सोरेन ने अपनी पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) और असम की नई पार्टी जय भारत पार्टी (JBP) के बीच गठबंधन की घोषणा की थी। यह गठबंधन असम चुनाव में लड़ने के लिए है। कांग्रेस या तो उनके साथ गठबंधन में उतरने के मूड में है या मनाने के। अगर वह कांग्रेस से अलग होकर चुनाव लड़ेंगे तो कांग्रेस का नुकसान हो सकता है। 

JMM को असम से क्या उम्मीद है?

JMM को बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और RJD ने गठबंधन से बाहर रखा था। अब JMM असम में 19 अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों पर दावा ठोकना चाहती है। पिछले दो महीनों में हेमंत सोरेन असम के चाय बागान इलाकों में कई बार गए और रैलियां कीं। मकसद यह है कि JMM को वहां की राजनीतिक स्थिति का जानकारी मिल सके। 

 

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कांग्रेस क्यों JMM का साथ चाहती है?

गौरव गोगोई, हर हाल में चाहते हैं कि असम में विपक्ष के वोटों का बिखराव न हो। वह बदरुद्दीन अजमल की पार्टी, ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) से पहले ही गठबंधन तोड़ चुके हैं। एक और बिखराव कांग्रेस अब नहीं चाहती है। कांग्रेस की कोशिश है कि एक जैसी विचाराधारा वाली पार्टियों को साथ चुनाव लड़ना चाहिए। 

कितनी मजबूत है हेमंत सोरेन की दावेदारी?

भारत में आदिवासियों की कई जातियां हैं। साल 2011 में हुई जनगणना के मुताबिक असम में करीब 12.4 फीसदी आबादी अनुसूचित जनजाति है। असम में जनजातीय आबादी तो है लेकिन जिस आबादी का प्रतिनिधित्व हेमंत सोरेन करते हैं, उसकी मौजूदगी असम में इतनी मजबूत नहीं है कि कोई बड़ा नतीजा मिले।

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कब हैं असम में चुनाव? 

असम विधानसभा चुनाव 2026 में मार्च-अप्रैल के आसपास होने की उम्मीद है। ऐसे में सभी पार्टियां अब जोड़-तोड़ और गठबंधन की तैयारी में जुटी हुई हैं। कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा भी इसी कवायद में जुटे हैं।


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