देश में मेडिकल उपकरणों के इस्तेमाल से मरीजों को होने वाले गंभीर नुकसान के मामले तेजी से बढ़े हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय के तहत भारतीय औषधकोश आयोग (IPC) के रिकॉर्ड के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, मेडिकल उपकरणों से जुड़े गंभीर नुकसान के मामले 2020 में 808 थे, जो 2025 में बढ़कर 2,176 हो गए। यानी महज छह साल में ऐसे मामलों की संख्या करीब तीन गुना हो गई।
पेसमेकर, हार्ट स्टेंट, सिरिंज और कैथेटर जैसे मेडिकल उपकरणों के इस्तेमाल से मरीजों को होने वाली गंभीर परेशानियों के मामले, जिसे सीरियस एडवर्स इवेंट्स (SAEs) कहा जाता है, इसके मामले तेजी से बढ़े हैं। ऐसे में एक बड़ा सवाल उठता है कि क्या अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले इन उपकरणों की गुणवत्ता और सुरक्षा की ठीक से जांच हो रही है और अगर किसी उपकरण से मरीज को नुकसान पहुंचता है, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?
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आंकड़े क्या बताते हैं?
भारतीय औषधकोश आयोग (IPC) के आंकड़े बताते हैं कि मेडिकल उपकरणों से जुड़ी गंभीर घटनाओं के मामले हर साल बढ़े हैं। 2020 में 808 मामले दर्ज हुए थे, जबकि 2025 में यह संख्या बढ़कर 2,176 पहुंच गई। 2023 में 1,805 मामले दर्ज हुए, जो 2022 के मुकाबले ज्यादा थे। वहीं 2025 में 2,176 मामले दर्ज हुए, जो इस छह साल की अवधि में सबसे अधिक हैं।

बात करें मेडिकल उपकरणों से जुड़ी प्रतिकूल घटनाओं (MDAEs) की शिकायतों की तो आंकड़े इस समस्या का दूसरा पहलू भी दिखाते हैं। आंकड़ों के मुताबिक, तीन वित्त वर्षों में कुल 28,721 शिकायतें दर्ज की गईं। इनमें से केवल 50 मामले केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) को भेजे गए।0.17% मामले ही CDSCO को भेजे गए। हालांकि, केवल इस आंकड़े से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि बाकी शिकायतों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
गलती होने पर जिम्मेदारी किसकी?
मेडिकल उपकरण से मरीज को नुकसान होने पर जिम्मेदारी तय करना इस बात पर निर्भर करता है कि खराबी कहां हुई। अगर उपकरण में निर्माण संबंधी खामी है, तो बनाने वाली कंपनी की जवाबदेही बन सकती है। अगर अस्पताल में उपकरण का गलत इस्तेमाल, रखरखाव में लापरवाही या निगरानी की कमी सामने आती है, तो अस्पताल और संबंधित स्वास्थ्यकर्मियों की भूमिका की जांच हो सकती है।
नियमों के तहत निर्माता और लाइसेंसधारकों की भी प्रतिकूल घटनाओं की रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी है। CDSCO ऐसी घटनाओं के आधार पर नियामकीय कार्रवाई कर सकता है। वहीं मरीज, उनके परिजन और स्वास्थ्यकर्मी मेडिकल उपकरण से जुड़ी संदिग्ध प्रतिकूल घटना की शिकायत MvPI के जरिए दर्ज करा सकते हैं। IPC ने इसके लिए मरीजों और उपभोक्ताओं के लिए अलग रिपोर्टिंग फॉर्म भी उपलब्ध कराया है।
रोजमर्रा के मेडिकल सामान भी शामिल
IPC की रिपोर्ट में दर्ज घटनाओं में से जिन मामलों को आगे की जांच के लिए भेजा गया, उनमें कई तरह के मेडिकल उपकरण शामिल थे। इनमें सर्जिकल दस्ताने, सिरिंज, यूरिन बैग, प्रेग्नेंसी टेस्ट किट, कैथेटर और ब्लड प्रेशर मॉनिटर जैसे सामान थे। इसके अलावा दवा छोड़ने वाले स्टेंट, मैकेनिकल वेंटिलेटर और ब्लड ट्रांसफ्यूजन सेट भी लिस्ट में शामिल थे।
मैटेरियोविजिलेंस प्रोग्राम ऑफ इंडिया (MvPI)
मेडिकल डिवाइस के इस्तेमाल से होने वाली परेशानियों पर नजर रखने के लिए 2015 में मैटेरियोविजिलेंस प्रोग्राम ऑफ इंडिया (MvPI) शुरू किया गया था।IPC इसके तहत ADRMS नाम के ऑनलाइन पोर्टल के जरिए ऐसी घटनाओं की जानकारी जुटाता है। नियम है कि मेडिकल डिवाइस से जुड़ी गंभीर घटना की जानकारी 15 दिन के भीतर IPC को देना जरूरी है।
अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार इस स्थिति में किसी घटना को गंभीर तब माना जाता है, जब उससे मरीज की मौत हो जाए और उसकी जान को खतरा हो, उसे लंबे समय तक अस्पताल में रहना पड़े या शरीर को स्थायी नुकसान पहुंचे।