logo

मूड

ट्रेंडिंग:

FCRA: विदेशी चंदे पर सरकार की नजर, लाइसेंस रद्द हुआ तो जब्त होगी संपत्ति

FCRA संशोधन बिल 2026 में विदेशी चंदे और उससे बनी संपत्तियों को लेकर कई बड़े बदलाव प्रस्तावित हैं। पढ़ें नए कानून से NGO, धार्मिक संस्थाओं और पत्रकारों के लिए क्या बदलेगा।

FCRA Amendment Bill 2026, Foreign Funding

सांकेतिक तस्वीर, Photo Credit - Social Media

शेयर करें

google_follow_us

संबंधित खबरें

Advertisement

इसी साल 25 मार्च को FCRA यानी फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट संशोधन बिल 2026 लोकसभा में पेश किया गया था, अब इसे 12 अगस्त को संसद में लाया जा सकता है। ऐसे में एफसीआरए संशोधन बिल 2026 को लेकर बहस तेज हो गई है। यह कानून एनजीओ, सामाजिक संगठनों, शैक्षणिक संस्थानों और धार्मिक संस्थाओं को मिलने वाले विदेशी चंदे पर निगरानी रखता है और उसे कंट्रोल करता है। एफसीआरए संशोधन बिल 2026 का मकसद विदेशी पैसे के इस्तेमाल में पारदर्शिता लाना और देश की सुरक्षा को मजबूत करना है। 

 

हाल ही में अमेरिका के सांसद राइली मूर ने एफसीआरए संशोधन बिल 2026 में प्रस्तावित संशोधनों को ईसाइयों पर हमला बताया। उन्होंने इसे भारत और अमेरिका के रिश्तों के लिए सबसे बड़ी चिंता बताई थी। इसके अलावा, भारत के ईसाई संगठनों ने भी एफसीआरए में प्रस्तावित बदलावों पर आपत्ति जताई है। उन्होंने मांग की है कि इन बदलावों को लाने से पहले सभी पक्षों से चर्चा की जाए।  

 

यह भी पढ़ें: 'भारत-इजरायल के खिलाफ इस्लामिक NATO', ख्वाजा आसिफ ने बताया पाकिस्तान का प्लान

फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट है क्या? 

FCRA यानी फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट एक ऐसा कानून है जो भारत में NGO (गैर-सरकारी संगठन) और धार्मिक संस्थाओं को विदेश से मिलने वाले चंदे या पैसे पर नजर रखता है। अगर कोई विदेशी व्यक्ति, संस्था या सरकार भारत के किसी NGO, ट्रस्ट या संगठन को पैसा भेजना चाहती है, तो उस संगठन के पास FCRA के तहत रजिस्ट्रेशन होना जरूरी है। इसका मकसद यह देखना है कि विदेशी पैसा कहीं देश की सुरक्षा, राजनीति या सामाजिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने में तो इस्तेमाल नहीं हो रहा। यह कानून सबसे पहले इंदिरा गांधी सरकार के समय बना था, और समय-समय पर इसमें बदलाव होते रहे हैं, ताकि विदेशी फंडिंग पर सरकार की निगरानी और मजबूत हो सके।  

मौजूदा कानून में कहां है कमी?

केरल में चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईसाई समुदाय को भरोसा दिलाया था कि उनकी सरकार कभी भी उनके हितों के खिलाफ काम नहीं करेगी। पीएम मोदी ने यह भी आरोप लगाया था कि विपक्ष एफसीआरए में प्रस्तावित बदलावों को लेकर गलत जानकारी फैला रहा है। विधेयक में कहा गया है कि ये बदलाव विदेशी चंदे और उससे खरीदी या बनाई गई संपत्तियों के प्रबंधन से जुड़ी कानूनी और प्रशासनिक कमियों को दूर करने के लिए किए जा रहे हैं।

 

खास तौर पर उन मामलों के लिए बदलाव प्रस्तावित हैं, जब किसी संस्था का एफसीआरए रजिस्ट्रेशन रद्द हो जाए, संस्था खुद अपना रजिस्ट्रेशन वापस ले ले या संस्था बंद हो जाए। मौजूदा कानून में यह बताया गया है कि ऐसी स्थिति में विदेशी चंदे से बनी संपत्तियों का नियंत्रण किसके पास जाएगा। लेकिन इन संपत्तियों की देखरेख कौन करेगा, उनका आगे कैसे इस्तेमाल होगा और विवाद होने पर उसे कैसे सुलझाया जाएगा, इसे लेकर साफ तौर पर कोई नियम नहीं हैं। सरकार का कहना है कि नियमों में इस कमी के कारण विदेशी चंदे और उससे बनी संपत्तियों के गलत इस्तेमाल की आशंका बढ़ सकती है। 

FCRA संशोधन बिल: नए कानून से क्या बदलेगा?

रिपोर्ट्स और अब तक मिली जानकारी के मुताबिक, अब संस्थाओं को समय-समय पर अपना FCRA रजिस्ट्रेशन रिन्यू कराना जरूरी होगा। समय पर आवेदन न करने या आवेदन खारिज होने पर रजिस्ट्रेशन खत्म हो जाएगा। इसके लिए बिल में एक नया चैप्टर (III-A) जोड़ा गया है, जिसके तहत केंद्र सरकार एक नई अथॉरिटी बनाएगी। यह अथॉरिटी रद्द हुए संगठनों की संपत्ति और विदेशी चंदे से बनी संपत्ति की देखरेख करेगी। अगर संस्था बाद में दोबारा रजिस्ट्रेशन ले लेती है, तो बचा हुआ पैसा उसे लौटा दिया जाएगा। अगर तय समय में ऐसा न होने पर, या संस्था बंद हो जाने पर संपत्ति और पैसा हमेशा के लिए अथॉरिटी के पास चला जाएगा। ऐसे में रजिस्ट्रेशन खत्म रहने तक संस्था न विदेशी चंदा ले पाएगी, न उसका इस्तेमाल कर पाएगी।

 

दूसरी ओर अथॉरिटी इस संपत्ति को सरकारी विभागों को दे सकती है, या जरूरत पड़ने पर बेच भी सकती है। संपत्ति बेचने से मिला पैसा और बचा हुआ चंदा सरकार के खजाने में जमा होगा। अथॉरिटी अगर कोई जमीन या मकान बेचती है, तो खरीदार को पुराने मालिकाना दस्तावेज न होने पर भी पूरा हक मिल जाएगा  क्योंकि बिक्री खुद सरकार करेगी। इसके अलावा, ऐसे मामलों में कोर्ट या ट्राइब्यूनल का दखल भी बहुत सीमित रहेगा।  

 

यह भी पढ़ें: सोमालिया-पाकिस्तान डिफेंस डील, कैसे खतरे में भारत और इजरायल के हित?

नए बिल में क्या और जुड़ने वाला है 

FCRA कानून, 2010 के तहत कुछ लोगों को पहले से ही विदेश से चंदा लेने की इजाजत नहीं है। इनमें चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार, राजनीतिक पार्टियां, जज, सांसद-विधायक और पत्रकार शामिल हैं। समय के साथ इस पाबंदी के दायरे को बढ़ाया गया। न्यूज और करंट अफेयर्स से जुड़े प्रोग्राम बनाने या दिखाने वाली कंपनियों और संस्थाओं को भी इस लिस्ट में शामिल कर दिया गया। अब नए FCRA बिल में यह प्रस्ताव है कि यह पाबंदी सिर्फ कंपनियों तक सीमित न रहे। न्यूज या करंट अफेयर्स से जुड़ा काम करने वाले व्यक्तिगत लोगों (जैसे पत्रकार, कंटेंट क्रिएटर आदि, जो व्यक्तिगत तौर पर ऐसा काम करते हों उनपर भी यही पाबंदी लागू होगी।

कानून तोड़ने पर सजा कम?

नए विधेयक में कुछ राहत भरे प्रावधान भी हैं। पहला, कानून तोड़ने पर अब तक अधिकतम 5 साल की सज़ा का प्रावधान था, जिसे घटाकर 1 साल करने का प्रस्ताव है। दूसरा, अगर कोई व्यक्ति या संस्था अथॉरिटी के फैसले से संतुष्ट नहीं है, तो वह 90 दिन के भीतर जिला न्यायाधीश की अदालत में अपील कर सकता है। इसके अलावा नए कानून के तहत अगर कोई संस्था विदेशी चंदे से बनी अपनी संपत्ति को लेकर कोई फैसला लेना चाहती है, तो उसे पहले केंद्र सरकार की मंजूरी लेनी अनिवार्य होगी।


और पढ़ें