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स्वच्छ भारत के 12 साल: प्लास्टिक के लिए 5 शहरों के मॉडल, फिर क्यों धीमी रफ्तार?

प्लास्टिक से निपटने के लिए 5 शहरों में 5 अलग-अलग मॉडल अपनाए गए हैं। आंकड़ों के मुताबिक, देश हर साल लगभग 41 लाख टन प्लास्टिक कचरा पैदा कर रहा है लेकिन इसे निपटने की रफ्तार अब भी बहुत धीमी है।

Swachh Bharat Mission

सांकेतिक तस्वीर, Photo Credit-Chat GPT

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भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2 अक्टूबर 2014 में स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत की थी, इस मिशन के 12 साल पूरे हो रहे हैं। यह देश का एक सबसे बड़ा जन आंदोलन बन चुका है। इन 12 सालों में मिशन का दायरा केवल शौचालय निर्माण और खुले में शौच से मुक्ति तक सीमित न रहकर कचरा प्रबंधन, खासतौर से प्लास्टिक के कचरे से निपटारे तक आगे बढ़ा। आंकड़ों के मुताबिक, देश हर साल लगभग 41 लाख टन प्लास्टिक कचरा पैदा कर रहा है लेकिन इसे निपटने की रफ्तार अब भी बहुत धीमी है। 

 

इसी दिशा में केंद्र सरकार ने हाल ही में देश के 5 शहरों के मॉडल सामने रखे हैं। इस मॉडल में शहरों में प्लास्टिक के पूरे जीवन-चक्र को संभालने पर जोर दिया गया है। इसमें प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करना, दोबारा इस्तेमाल करना, वापस लेना, उससे उपयोगी चीजें बनाना और उसे फिर से तैयार करना शामिल है। इसके अलावा, प्लास्टिक कचरे से निपटने के लिए नियम भी बनाए गए हैं। 

 

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प्लास्टिक कचरे के लिए क्या हैं नियम? 

भारत में प्लास्टिक कचरे को कंट्रोल में रखने और उससे निपटने के लिए प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन (PWM) नियम, 2016 लागू है। ये नियम पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत बनाए गए हैं। इन नियमों ने 2011 के पुराने नियमों की जगह ली और इसके तहत प्लास्टिक बनाने वाली कंपनियों की जिम्मेदारी ग्रामीण इलाकों तक भी बढ़ाई गई। 

 

1 जुलाई 2022 से कई सिंगल यूज प्लास्टिक चीजों पर रोक लगा दी गई। इनमें प्लास्टिक कटलरी, प्लेट, कप, स्ट्रॉ, ईयरबड और गुब्बारे की प्लास्टिक स्टिक जैसी चीजें शामिल हैं। 
सितंबर 2021 में प्लास्टिक कैरी बैग की न्यूनतम मोटाई 75 माइक्रोन और फिर दिसंबर 2022 में इसे बढ़ाकर 120 माइक्रोन कर दिया गया।

 

2022 के EPR यानी एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पांसिबिलिटी नियमों के तहत प्लास्टिक बनाने वाली कंपनियों, आयातकों और ब्रांड मालिकों के लिए प्लास्टिक कचरे को वापस लेने और रिसाइकिल करने के लक्ष्य तय किए गए। 2018 में ऐसे मल्टीलेयर प्लास्टिक को लेकर नियम कड़े किए गए, जिसे न रिसाइकिल किया जा सकता है, न ऊर्जा में बदला जा सकता है और न ही उसका कोई दूसरा उपयोग संभव है।

5 शहरों में 5 अलग-अलग मॉडल

प्लास्टिक से निपटने के लिए 5 शहरों में 5 अलग-अलग मॉडल अपनाए गए हैं। तिरुचिरापल्ली में रीड्यूस मॉडल के तहत मंडियों में कपड़े के थैलों का अभियान चलाकर एक साल में 2,200 किलो, चार महीने में 620 किलो और छह महीने में 300 किलो प्लास्टिक थैली का इस्तेमाल बचाया गया। 

 

विटा में रीयूज मॉडल के तहत सिक्का डालकर थैला देने वाली 5 मशीनों से अब तक 6,000 कपड़े के थैले बिक चुके हैं। इसके अलावा, अंडमान-निकोबार में रिटर्न मॉडल के तहत दूध के 17,600 खाली पाउच जमा करने पर लोगों को बदले में 352 लीटर दूध दिया गया।

 

बेंगलुरु में रिकवर मॉडल के तहत एक कचरा प्रबंधन केंद्र प्लास्टिक को छांटकर पुनर्चक्रण के लिए भेजता है, जिसने महामारी के दौरान 76 सफाई कर्मियों को रोजगार दिया था। पटियाला में रीक्रिएट मॉडल के तहत एक कारखाना रोज 10 टन बेकार प्लास्टिक से 75 से 100 मजबूत लकड़ी के तख्ते बनाता है।

 

 

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फिर भी धीमी है रफ्तार

ये सभी मॉडल असल में काम कर रहे हैं लेकिन जब इन्हें राष्ट्रीय आंकड़ों के सामने रखा जाता है तो तस्वीर साफ हो जाती है। यानी सफलता तो मिल रही है लेकिन उस रफ्तार से नहीं, जिस रफ्तार से देश में प्लास्टिक कचरा बढ़ रहा है।

 

एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में प्लास्टिक की कुल रिकवरी का 80% से अधिक हिस्सा अनौपचारिक क्षेत्र से ही होता है  फिर भी वे असुरक्षित और गैर-मान्यता प्राप्त हालात में काम करते हैं। यानी जिस तंत्र पर पूरा रिकवर मॉडल टिका है, वही सबसे कम सुरक्षित और सबसे कम संसाधन में काम कर रहे हैं।  

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