इस्लाम धर्म में रमजान के महीने को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस महीने दान के कामों को जरूरी माना जाता है। फितरा (जकात-उल-फितर) इन्हीं दानों में से एक हैं। फितरा इस्लाम के उन महत्वपूर्ण दान कार्यों में से एक है, जिसे रमजान के पवित्र महीने के समापन पर यानी ईद-उल-फितर की नमाज से पहले अदा करना अनिवार्य होता है। यह सिर्फ एक वित्तीय मदद नहीं है, बल्कि यह रोजे को पूर्णता प्रदान करने का एक जरिया है।
माना जाता है कि रमजान के दौरान अगर रोजेदार से कोई छोटी-मोटी चूक या गलती हुई हो, तो फितरा उसे सही करने का काम करता है। इस्लाम में फितरा हर उस मुसलमान पर जरूरी है जिसके पास अपनी जरूरत से अधिक संपत्ति या खाना उपलब्ध हो।
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फितरा क्यों माना जाता है जरूरी?
फितरा परिवार का मुखिया अपने साथ-साथ अपने घर के छोटे बच्चों और आश्रितों की तरफ से भी यह अदा करता है। इसका मूल संदेश सामाजिक समानता है ताकि ईद के दिन कोई भी भूखा न रहे और हर व्यक्ति सम्मान के साथ त्योहार मना सके। इसकी अहमियत को कुछ इस तरह से समझा जा सकता है जैसे इंसान होने के नाते रोजे के दौरान कभी-कभी बेवजह की बातें या छोटी गलतियां हो जाती हैं। फितरा इन कमियों को दूर कर रोजे को अल्लाह के सामने स्वीकार्य बनाता है।
ईद को खुशियों का त्योहार माना जाता है। फितरा यह सुनिश्चित करता है कि समाज का गरीब तबका भी नए कपड़े पहन सके और अच्छे भोजन का आनंद ले सके। यह समाज के अमीर और गरीब के बीच की दूरी को कम करता है। साथ ही भाईचारे की भावना को बढ़ावा देता है।
ऐसा माना जाता है कि यह अल्लाह को रमजान के महीने को ठीक से पूरा करने की शक्ति देने के लिए एक प्रकार से शुक्रिया करना है।
कितना देना होता है?
फितरे की मात्रा आमतौर पर प्रति व्यक्ति लगभग 2.045 किलोग्राम गेहूं या उसकी बाजार कीमत के बराबर होती है। इसे खजूर, जौ या किशमिश के रूप में भी दिया जा सकता है।
कब देना चाहिए?
इसे रमजान के आखिरी दिनों में या ईद की नमाज से पहले देना अनिवार्य है। नमाज के बाद दिया गया दान सामान्य सदका माना जाता है, फितरा नहीं।
फितरा किसे दिया जा सकता है?
फितरा केवल उन लोगों को दिया जाना चाहिए जो वास्तव में इसके हकदार हैं। जैसे गरीब और जरूरतमंद, अनाथ बच्चे या ऐसे लोग जिनके पास ईद के दिन के भोजन का प्रबंध न हो।
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जकात और फितरा में मुख्य अंतर
सबसे बड़ा अंतर इनके हिसाब और देने के समय में है। जकात कुल जमा संपत्ति का 2.5% होती है। इसे साल में कभी भी दिया जा सकता है जब इसकी शर्तें पूरी हो जाएं। जबकी फितरा हर व्यक्ति के लिए तय रकम होती है। इसे ईद की नमाज से पहले देना जरूरी होता है।
जकात का मकसद लंबे समय तक गरीबी को कम करना और जरूरतमंदों की मदद करना है। जबकि फितरा का मकसद यह है कि ईद की खुशी हर गरीब तक पहुंचे और कोई भी ईद के दिन दुखी न रहे।
जकात सिर्फ उन लोगों पर फर्ज है जिनकी संपत्ति निसाब से ज्यादा हो। फितरा हर सक्षम मुस्लिम परिवार पर देना जरूरी है।
नोट: इस खबर में लिखी गई बातें धार्मिक और स्थानीय मान्यताओं पर आधारित हैं। हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।