भारतीय शेयर बाजार में इन दिनों एक अजीब सा विरोधाभास देखने को मिल रहा है। एक तरफ जहां कॉरपोरेट सेक्टर वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही यानी जुलाई-सितंबर में 20% से 27% तक की मजबूत कमाई और मुनाफा दर्ज करने की तैयारी में है। वहीं दूसरी तरफ शेयर बाजार में भारी बिकवाली का माहौल बना हुआ है। 8 अक्टूबर को सेंसेक्स और निफ्टी लंबे समय के अपने सबसे निचले स्तरों पर बंद हुए। इससे आम निवेशक इस उलझन में हैं कि मजबूत नतीजों के बावजूद बाजार में गिरावट क्यों आ रही है?
बाजार के जानकारों का कहना है कि यह गिरावट देश की आंतरिक आर्थिक स्थिति की वजह से नहीं हो रहा है। यह दुनिया भर से मिल रहे नकारात्मक संकेतों के कारण है। शेयर बाजार आज के आंकड़ों के बजाय भविष्य में आने वाले वैश्विक खतरों को ध्यान में रखकर अपना रुख तय कर रहा है।
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कहां दिखेगी चमक और कहां रहेगा दबाव?
शेयर बाजार में भले ही विदेशी पूंजी बाहर जाने से दबाव बना हुआ है। भारत का मजबूत घरेलू बाजार कंपनियों की कमाई को संभाल रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि इस तिमाही में बैंक और वित्तीय संस्थान कमाई के सबसे बड़ी कड़ी बने रहेंगे। कर्ज की मजबूत मांग, फंसे हुए कर्ज (NPA) में कमी और कम क्रेडिट कॉस्ट से बड़े बैंकों के नतीजे शानदार रहने की उम्मीद है।
इसके साथ ही ऑटोमोबाइल और नए जमाने के टेक प्लेटफॉर्म्स में मजबूती देखी जा रही है। पिछले 8 महीनों से जारी अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण कच्चे तेल की सप्लाई प्रभावित हुई है। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए इससे लागत बढ़ी है। इसका फायदा बड़ी कंपनियों को मिलेगा लेकिन ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के मार्जिन पर दबाव दिख सकता है। IT सेक्टर में मांग सुस्त रहने के आसार हैं।
मार्केट में गिरावट के 5 बड़े कारण
अब तक जो संकेत मिल रहे हैं उसके हिसाब से 5 बड़े कारण है जो साफ दिखा रहे हैं कि मार्केट में गिरावट क्यों हो रही है। आइए जानते हैं क्या?
भले ही भारतीय कंपनियों के वित्तीय नतीजे अच्छे दिख रहे हो लेकिन विदेशी निवेशक (FPIs) लगातार बाजार से अपना पैसा निकालकर सुरक्षित जगहों पर लगा रहे हैं। घरेलू निवेशकों और रिटेल SIP की खरीदारी भी इस FPI आउटफ्लो के सामने बाजार को संभाल नहीं पा रही है।
अमेरिका में 10-साल की बॉन्ड यील्ड और डॉलर इंडेक्स के मजबूत होने से विदेशी निवेशकों को बिना किसी जोखिम के अच्छा रिटर्न मिल रहा है। इस वजह से वे भारत जैसे ऊंचे वैल्यूएशन वाले बाजारों से पैसा निकालकर अमेरिकी डेट मार्केट में ट्रांसफर कर रहे हैं।
क्रूड ऑयल के महंगा होने से आने वाली तिमाहियों में कंपनियों की लागत बढ़ जाएगी। इससे उनके मुनाफे का मार्जिन घटेगा। भारत अपनी जरूरत का 85% तेल आयात करता है। इसलिए महंगा तेल देश में महंगाई और चालू खाते के घाटे को भी बढ़ाता है।
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डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचने से विदेशी निवेशकों का असल रिटर्न घट जाता है। उदाहरण के लिए, अगर किसी शेयर पर 15% का फायदा हो और रुपया 5% गिर जाए, तो विदेशी निवेशक का असल डॉलर-रिटर्न घटकर सिर्फ 10% रह जाता है।
भारतीय बाजार का वैल्यूएशन औसत से ऊपर चल रहा है जबकि चीन या कोरिया जैसे अन्य बाजारों में शेयर सस्ते मिल रहे हैं। इसके अलावा, विश्लेषकों को डर है कि अगर वैश्विक मंदी और महंगे तेल का असर जारी रहा, तो आने वाले समय में कॉरपोरेट कमाई की यह तेज रफ्तार धीमी पड़ सकती है।
