शेयर बाजार या म्यूचुअल फंड में पैसा लगाने वाले हर निवेशक के सामने यह कंफ्यूजन हमेशा रहता है कि वे अपने निवेश से हर साल डिविडेंड निकालें या उस पैसे को वहीं रहने देकर लंबे समय के लिए फायदा बनाएं। देखने में दोनों ही रास्ते सही लगते हैं लेकिन टैक्स के नियमों और कंपाउंडिंग की वजह से दोनों विकल्पों से मिलने वाले अंतिम रिटर्न में बड़ा अंतर आ जाता है।

 

कोई भी कंपनी और फंड हाउस दो तरह से काम करते हैं। अच्छा कैश फ्लो रखने वाली कंपनियां अपने मुनाफे का कुछ हिस्सा डिविडेंड के रूप में अपने शेयर होल्डर को देती हैं। इसके उलट ग्रोथ स्टॉक कंपनियां मुनाफे को दोबारा बिजनेस में वापस लगाकर शेयर की कीमत बढ़ाती हैं। देखने में दोनों ही आकर्षक लगती हैं लेकिन टैक्स के नियमों और कंपाउंडिंग के कारण दोनों के नतीजों में जमीन-आसमान का फर्क आ जाता है।

 

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डिविडेंड और रिइंवेस्टमेंट करने वाली कंपनियां

डिविडेंड देने वाली कंपनियां स्थापित और स्थिर कंपनियां होती है जिनके पास कैश का फ्लो अच्छा होता है। इसमें एक समस्या यह है कि इसमें बिजनेस को तुरंत बढ़ाने के सीमित मौके होते हैं। यह कंपनियां अपने मुनाफे का एक हिस्सा शेयर होल्डर के साथ शेयर करती हैं। इसके उलट ग्रोथ या रिइंवेस्टमेंट करने वाली कंपनियां अपने मुनाफे को शेयरहोल्डर में बांटने के बजाय नए प्रोजेक्ट्स या बिजनेस को बढ़ाने में दोबारा लगाती हैं। इससे कंपनी की भविष्य की कमाई तेजी से बढ़ती है, जिसका सीधा असर शेयर की कीमत पर दिखता है। 

क्यों पिछड़ जाता है डिविडेंड?

सबसे पहले समझते हैं कि शेयर बाजार या म्यूचुअल फंड दोनो से ही मिलने वाला डिवेडेंड कितना फायदेमंद होता है। भारतीय टैक्स प्रणाली में डिविडेंड को अन्य स्रोतों से आय माना जाता है जिस पर इनकम टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्स लगता है। यदि आप 30% वाले टैक्स स्लैब में आते हैं तो कमाई का बड़ा हिस्सा टैक्स में चला जाता है।

 

बाजार में एक साल से अधिक समय तक बने रहने पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस (LTCG) टैक्स लगता है। इसमें अगर आप 1.25 लाख रुपये तक का सालाना लाभ कमा रहे हैं तो वह टैक्स-फ्री होता है। इसके साथ ही उससे ऊपर 12.5% तक टैक्स लगता है। सबसे हैरानी की बात है कि डिविडेंड पर हर साल आपको टैक्स देना पड़ता है। उसी जगह पर कैपिटल गेंस पर टैक्स सिर्फ पैसा निकालते समय ही देना होता है।  इस वजह से आपका बकाया टैक्स भी आपके लिए लगातार रिटर्न कमाता रहता है। 

 

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डिविडेंड और ग्रोथ दोनों में से क्या चुनें?

डिविडेंड में मिलने वाला पैसा कोई एक्सट्रा बोनस नहीं होता। जैसे ही फंड भुगतान करता है उसकी प्रति यूनिट शेयर की कीमत उसी अनुपात में गिर जाती है यानी आपके ही निवेश का हिस्सा आपको लौटाया जाता है। इसके उलट ग्रोथ में फंड का पूरा फायदा उसी में फिर से इंवेस्ट कर दिया जाता है। इस वजह से इसमें प्रति यूनिट शेयर की कीमत तेजी से बढ़ती है और  कंपाउंडिंग का पूरा लाभ मिलता है।

 

हर निवेशक को यह समझना चाहिए कि निवेश करने का मतलब केवल टैक्स ही बचाना ही नहीं होता। इस मामले में कोई भी फैसला समय, रिस्क और वित्तीय लक्ष्य के आधार पर होना चाहिए। यदि आपको फिक्स इनकम की जरूरत है और आप लोअर टैक्स स्लैब में आते हैं तो डिविडेंड एक सही विकल्प हो सकता है। साथ ही अगर आपका लक्ष्य रिटायरमेंट प्लानिंग का है और आप हाई टैक्स स्लैब में आते हैं तो ग्रोथ विकल्प आपका बेहतर फैसला हो सकता है। 

 

नोट: इस खबर में दी गई सभी बाते सामान्य जानकारी पर लिखी गई है। अगर निवेश के बारे में कुछ जानना है तो एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।