आमतौर पर यह माना जाता है कि एयर टिकट महंगा होने से पूरा टूरिज्म सेक्टर मंदा पड़ जाता है। लेकिन भारत जैसे बड़े और गतिशील बाजार में ऐसा नहीं हुआ। महंगे हवाई टिकट ने ट्रैवल री-रूटिंग इफेक्ट को जन्म दिया है। यानी जिस पैसे को लोग महंगे हवाई टिकट में उड़ाने वाले थे, वह पैसा अब होटल, लोकल ट्रांसपोर्ट, रीजनल ट्रेन और छोटे शहरों री-सर्कुलेट हो रहा है। ट्रैवल कंपनियों को महंगे हवाई टिकटों के बावजूद होटल बुकिंग और अन्य सेवाओं के मजबूत प्रदर्शन से सहारा मिल रहा है।
इस स्थिति का आकलन करने के लिए कई तरीकों से इसकी जांच की जाती है। इसके तहत एयरलाइंस से लेकर टूरिज्म सेक्टर बदलाव के बारे में समझा जाता है। इसमें री-रूटिंग इफेक्ट का बहुत बड़ा योगदान रहा है।
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एयरलाइन का गणित
एयरलाइन की ऑपरेटिंग कॉस्ट में 40% से 50% हिस्सा सिर्फ एविएशन टरबाइन फ्यूल (ATF) का होता है। जब तेल महंगा होता है तो किराया बढ़ाना एयरलाइन की मजबूरी बनती है। महंगे किरायों के बावजूद एयरलाइंस की प्रति यात्री शुद्ध कमाई बहुत ज्यादा नहीं बढ़ी है क्योंकि फ्यूल, लीज रेंटल और एयरपोर्ट चार्जेस ने उस मुनाफे को खत्म कर दिया है। फायदा केवल उन्हें मिला है जिनके पास फुल-कैपेसिटी में उड़ानें हैं।
'रिवर्स टूरिज्म'
अपर मिडिल क्लास से संबंध रखने वाले परिवार साल में दो बार फ्लाइट से छुट्टियां मनाने जाते थे अब उसने अपनी ट्रिप को रोड या ट्रेन ट्रिप में बदल दिया है। फ्लाइट के बढ़े किरायों से सबसे बड़ा फायदा इंटर-सिटी लग्जरी बसों और हाई-स्पीड ट्रेनों को हुआ है। 500-800 किलोमीटर के दायरा वाले रूटों पर अब लोग 4-5 हजार की फ्लाइट टिकट की जगह 1.5-2 हजार का लग्जरी ट्रेन या बस टिकट पसंद कर रहे हैं।
जो मध्यमवर्गीय परिवार थाईलैंड, वियतनाम या दुबई का मन बना रहा था। अब महंगे इंटरनेशनल और कनेक्टिंग किरायों के कारण उसने अपना प्लान बदलकर केरल, राजस्थान या पूर्वोत्तर भारत का बना लिया। फ्लाइट का बचा हुआ पैसा अब लोकल गाइड, हैंडीक्राफ्ट, लोकल कैब ड्राइवरों और सांस्कृतिक अनुभवों में खर्च हो रहा है। इससे जमीनी पर्यटन अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है।
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होटलों को पहुंचता है फायदा
कोई भी जब अपने घूमने के बजट का एक बड़ा हिस्सा फ्लाइट में बचा लेता है तो बचे हुए रुपयों को होटल पर खर्च करता है। इसका सीधा फायदा 3-स्टार, बुटीक होमस्टे और प्रीमियम होटल चेन्स को मिल रहा है। इनका रूम रेंट और ऑक्यूपेंसी रेट रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। होटल बुकिंग और बस टिकटों में ओटीए का मुनाफा मार्जिन फ्लाइट्स की तुलना में कहीं अधिक होता है। इसलिए, जब यूजर फ्लाइट से हटकर होटल और बस बुकिंग की तरफ बढ़ा तो इन ट्रैवल कंपनियों को मिलने वाला लाभ और मजबूत हुआ है।
महंगे हवाई किरायों ने भारतीय ट्रैवल मार्केट को पूरी तरह ध्वस्त नहीं किया बल्कि 'री-डिस्ट्रीब्यूट' कर दिया है। पहले जहां यात्री के बजट का 60% हिस्सा केवल एयरलाइन के पास चला जाता था और बाकी 40% में होटल तथा लोकल खर्चा होता था। अब 30-40% हिस्सा ग्राउंड ट्रांसपोर्ट में जा रहा है और 60-70% पैसा सीधे स्थानीय अर्थव्यवस्था की जेब में पहुंच रहा है। यानी, हवाई किरायों की महंगाई ने भारतीय पर्यटन का 'ग्राउंड इकोनॉमिक्स' बदल दिया है।
