साल 1990 में राहुल भट्ट और अनु अग्रवाल की फिल्म 'आशिकी' रिलीज हुई थी। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट हुई थी। इस फिल्म से राहुल और अनु ने इंडस्ट्री में डेब्यू किया था। इस फिल्म के गाने सुपरहिट हुए थे जिसमें 'धीरे-धीरे से मेरी जिंदगी में आना','नजर के सामने जिगर के पास', 'मैं दुनिया भुला दूंगा', 'सांसों की जरूरत है जैसे', 'अब तेरे बिन जी लेंगे हम' का नाम शामिल है। इन गानों को अनुराधा पौडवाल और कुमार सानू ने मिलकर गाया था। इन गानों को नदीम और श्रवण ने मिलकर लिखा था। 

 

इतने सालों बाद अनुराधा पौडवाल ने इस फिल्म को बनाने की कहानी बताई है। उन्होंने कहा कि गानों की वजह से फिल्मों को बनाया गया ताकि उन्हें हम रिलीज कर पाए। वह हाल ही में शुंभाकर मिश्रा के पोडकॉस्ट में शामिल हुई थी। उनसे पूछा गया कि जब नदीम और श्रवण संघर्ष कर रहे थे तब आपने उनसे 27 गाने रिकॉर्ड करवाए थे। क्या यह सच है? ये गाने 'चाहत' एल्बम के थे।

 

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अनुराधा ने नदीम श्रवण से लिखवाए थे 27 गाने

अनुराधा ने कहा, 'उस समय हम सीटिंग पर बैठते तो गाने रिकॉर्ड करते थे। 27 के 27 गाने अच्छे थे। 'आशिकी' ने आपकी जिंदगी मं क्या बदला? उन्होंने कहा,' जब गुलशन जी गाने बनना चाहते थे तब वे ऐसे गाने करते थे जिसको वर्जन कहते है। उन्हें गानों से मतलब नहीं था। वह सिर्फ वर्जन पर ध्यान देते थे ताकि कैसेट्स बिके। मैंने उनसे कहा कि आप कैसेट में अच्छे और ओरिजनल गाने दीजिए। उन्होंने कहा, 'ओरिजिनव कौन देगा? फिर मैंने कहा कि एक एल्बम के साथ मुझ पर भरोसा करें।'

 

 उन्होंने आगे कहा, 'उसके बाद मैं आनंद और मिलिंद के पास गई गाना लिखवाने के लिए। उन्होंने मुझसे पूछा कौन सी फिल्म है? मैंने कहा कोई फिल्म नहीं है लेकिन उसी सिचुएशन पर गाना बनना है जैसे प्यार में पड़ना, प्यार का इजहार, प्यार होने के बाद दिल टूटना। उस समय पहला गाना था 'क्या करते थे साजना तुम हम से दूर रहकर' और एक गाना रिकॉर्ड हुआ। एक शिफ्ट में दो गाने रिकॉर्ड हुए। गुलशन जी बहुत खुश थे। उन्होंने गाने को रेडियो पर चलाया और वह हिट हो गया। वह चाहते थे कि इन गानों को छाया गीत कार्यक्रम में चलाए लेकिन फिल्म नहीं था तो नहीं हुआ। उन गानों को फिर शूट किया गया। गाने को चलाने के लिए सेंसर का ठप्पा चाहिए और फिर उन गानों के लिए थोड़ा थोड़ा कुछ करके फिल्म बनाई गई।

 

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कैसे बनी 'आशिकी' फिल्म?

उन्होंने आगे कहा, 'लाल दुपट्टा मलमल का', 'जीना तेरी गली में', 'आई मिलन की रात'। ये तीने फिल्में बनी जिनमें सिर्फ गाने ही थे। उन्हें आप फिल्म कहेंगे भी नहीं। मैंने फिर गुलशन जी से कहा कि अब आप एक ढंग की फिल्म बनाइए और इसके लिए महेश भट्ट को बुलाइए। महेश भट्ट ने नदीम श्रवण के गाने सुनें और उन्हें सभी पसंद आए। उन्होंने कहा कि मैं तीन फिल्में बनाऊंगा और उनमें इनका इस्तेमाल हुआ। पहली 'आशिकी' थी, दूसरी 'दिल है कि मानता नहीं' और तीसरी 'सड़क' थी। ये हमेशा रहने वाले गाने हैं जो आज भी लोगों को खूब पसंद है।'