पिछले दो सालों से जिस फिल्म को लेकर सबसे ज़्यादा हाइप बना हुआ था, नितेश तिवारी और नमित मल्होत्रा की रामायण अब सिनेमाघरों में है। फिल्म कैसी है, इसका जवाब अब सामने आने लगा है। एक तरफ फिल्म की लागत, भारी-भरकम स्टारकास्ट की चर्चा है तो दूसरी तरफ पुरानी यानी रामानंद सागर की रामायण से तुलना भी है। तीन घंटे 10 मिनट की इस फिल्म को देखने के बाद क्या है इसका लेखा-जोखा? क्या इसका बजट पर्दे पर नज़र आता है? VFX वाकई वर्ल्ड क्लास हैं या सिर्फ़ उनका हौवा बनाया गया था? रणबीर कपूर राम और यश रावण के किरदारों में कितना असर छोड़ते हैं? साई पल्लवी सीता के रूप में कैसी लगी हैं? सबसे अहम सवाल, क्या नितेश तिवारी और नमित मल्होत्रा भारतीय उपमहाद्वीप की इस सबसे लोकप्रिय कहानी को पर्दे पर कोई नया रंग दे पाए हैं?

 

फिल्म की कहानी हम सब जानते हैं, फिर भी ज़रूरी स्पॉयलर्स से बचने की पूरी कोशिश की जाएगी। थिएटर की लाइट जब डिम होती है, तो फिल्म वक्त गंवाए बिना अपनी दुनिया बनाने लगती है। शुरुआत रावण के बिल्डअप से होती है। कैसे उसने देवासुर संग्राम के बाद हारे हुए असुरों को फिर से मज़बूत बनाने के लिए त्याग किया, तपस्या की, वरदान लिए, कुबेर से लंका छीनी, इंद्र को हराया और लंका का अपना राज्य बनाया। बिल्डअप फिल्म राम का भी करती है। जन्म से लेकर शिक्षा, ताड़का-सुबाहु का वध और फिर बाकी ज़रूरी प्रसंगों के साथ कहानी जटायु वध के बाद एक क्लिफहैंगर पर खत्म होती है।

रामायण के VFX और विजुअल्स कैसे हैं?

एक डर जो मैं लेकर थिएटर गया था, वह था VFX का। ट्रेलर में दिख रहे सीन्स काफ़ी भव्य थे और आदिपुरुष का सदमा अब तक था। साथ ही बिग बजट फिल्मों के अपने अलग ही कर्स का डर भी था लेकिन जो दिखा, उसे देखकर लगा कि इसे आठ बार ऑस्कर जीत चुकी DNEG ने बनाया है। शुरुआत में ही दिखाया गया देवासुर संग्राम आपको फिल्म के विज़न और स्केल का आइडिया दे देता है। इंद्र का ऐरावत, कैकैयी का ऐक्शन, हिमालय के पहाड़ों जैसा सेटअप, ये सीन्स अब तक मेरे देखे हुए हिंदी सिनेमा के किसी भी विजुअल से बहुत आगे हैं।

 

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VFX को खास बनाती है इसकी एक्शन कोरियोग्राफी भी। रावण और इंद्र की लड़ाई हो या रावण की कुबेर की सेना से लड़ाई, एक्शन को इतनी खूबसूरती से कोरियोग्राफ किया गया है कि तारीफ बनती है। फिल्म को लेकर एक डर यह भी था कि ज़्यादातर शूटिंग ग्रीन स्क्रीन पर हुई है, तो सेट्स कैसे लगेंगे। यहाँ भी विजुअल टीम अपना काम बखूबी करती है। चाहे वे जंगल के शॉट्स हों, अयोध्या के या लंका के, एक इंडियन और ग्रैंड टच के साथ विजुअल्स एक स्पेक्टेकल तो क्रिएट करते हैं।

 

कुछ खास मेंशन्स जिन्हें आप लुकआउट कर सकते हैं। देवसूर संग्राम के बाद जब असुरों की पाताल में हालत दिखाई जाती है या जब ब्रह्मा या विष्णु स्क्रीन पर अपीयर होते हैं, तो उन्हें पेश करने का तरीका और उनके आने-जाने का अंदाज़ एक नया एक्सपीरियंस था। साथ ही खर और दूषण से लड़ाई के बीच एक सीन, जो हमने ट्रेलर में भी देखा था, जहाँ राम के इर्द-गिर्द एक टॉरनेडो-सा बनता है। वहाँ मेकर्स ने राम की डिविनिटी दिखाने के लिए परछाइयों के साथ बहुत खूबसूरती से खेला है। मारीच जहाँ-जहाँ आपको दिखेगा, ध्यान से देखिएगा। मज़ेदार विजुअल्स वहाँ भी हैं।

 

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कमाल के विजुअल्स के बाद भी ये पूरी तरह फ्लॉलेस नहीं है। राक्षस, खासकर खर और दूषण, थोड़ी-थोड़ी कार्टूनी फील देते हैं। हालाँकि, मुझे ताड़का-सुबाहु का चित्रण अच्छा लगा। फिल्म में जिन शॉट्स में कुंभकरण को दिखाया गया है, वहाँ भी थोड़ा अनसैटिस्फाइंग काम लगता है। बात को समेटें तो मैं दूसरे पार्ट का इंतज़ार सिर्फ इस फिल्म के विजुअल्स को दोबारा देखने के लिए भी कर सकता हूँ। इफेक्ट्स इतने अच्छे हैं।

फिल्म की दुनिया

रामानंद सागर की रामायण में दिखाए गए राम शुरू से ही परफेक्ट थे और वहीं दिखाया गया कि रावण शुरू से ही अहंकारी था। बाकी विजुअल रीटेलिंग्स में भी हमने यही ट्रेंड देखा है। यहाँ नमित मल्होत्रा का विज़न काफी क्लियर है और एक फ्रेशनेस का एहसास देता है। जहाँ राम शुरू से परफेक्ट नहीं हैं और न ही रावण शुरू से बुरा है। फिल्म की दुनिया दोनों को अपना कैरेक्टर आर्क पूरा करने के लिए समय और स्टोरी देती है। दोनों की कहानी को हुमाइज़ ढंग से पेश करने की कोशिश दिखती है और अच्छे से लैंड भी करती हैं। 


एक और बात जिसका ज़िक्र ज़रूरी है कि फिल्म की दुनिया बहुत दैविक और चमत्कारी नहीं लगती है। हाँ, यहाँ जादू है, वरदान देते हुए भगवान हैं लेकिन फिल्म का कोर एक मानवीय कहानी है। आपको कोई सीन सिर्फ चमत्कारी नहीं लगेगा। कुछ कुछ Game of Thrones की दुनिया याद कीजिए। जहाँ जादू है, गॉड्स हैं, मगर कहानी का कोर रियलिज़्म है।

 

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अगर आपने मार्केज़ को पढ़ा है तो सही शब्द इस दुनिया के लिए होगा Magic Realism और इसीलिए यह बाकी रामायणों से एक अलग दुनिया बनाने में कामयाब होती है।

 

प्रोडक्शन डिजाइन की बात करें तो यहाँ भी फिल्म काफी अच्छा काम करती है। अयोध्या के सेट्स में एक अलग तरह की रौनक और खुशहाली दिखाई देती है, वहीं रावण के लंका पर अधिकार के बाद वहाँ का सेटअप उसकी ताकत और इंटेंसिटी को दिखाता है। खासकर राम, लक्ष्मण और सीता के वनगमन वाला सीन, जहाँ नाइट लाइटिंग और सेट डिज़ाइन मिलकर उस पूरे माहौल में एक उदासी और खालीपन पैदा करते हैं। ये कुछ ऐसे डिटेल्स हैं जो फिल्म की विजुअल स्टोरीटेलिंग को और बेहतर बनाते हैं। 

यश का रावण

फिल्म की कास्टिंग इसकी सबसे बड़ी ताकतों में से एक है। कन्नड़ सुपरस्टार यश रावण के किरदार में फिल्म की सबसे बड़ी हाइलाइट्स में से एक हैं। वीणा से प्रेम करने वाले रावण से लेकर लंका के ख़ौफ़नाक और शक्तिशाली राजा तक, यश इस किरदार के अलग-अलग शेड्स को बखूबी निभाते हैं। रावण तांडव खास तौर पर देखने लायक है। वहीं एक सीन, जहाँ रावण अपने ही दस स्वरों से बातचीत करता नज़र आता है, उसे भी मिस मत कीजिएगा।

 

यश का रावण जब भी स्क्रीन पर आता है, पूरी तरह छा जाता है। उनकी स्क्रीन प्रेज़ेंस किरदार को एक अलग ही वज़न देती है। नितेश तिवारी ने रावण को एक ऐसे इंसान के तौर पर पेश किया है जिसमें इच्छाशक्ति, आत्मविश्वास और अहंकार तो है, लेकिन साथ ही वो एक प्रेम करने वाला बेटा और भाई भी है। इससे एक ऐसे किरदार को एक और आयाम मिलता है, जिसे अक्सर सिर्फ उसके बुरे शेड से ही देखा गया है।

 

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हालाँकि, हिंदी वर्ज़न में रावण के किरदार पर शरद केलकर की डबिंग उतना असर नहीं छोड़ पाती। लिप-सिंक भी कई जगह डिसअपॉइंट करता है। वहीं यंग रावण के किरदार में नमित मल्होत्रा के बेटे उतना इम्पैक्ट नहीं ला पाते, जितना यश अपने रावण के साथ छोड़ते हैं।

साई पल्लवी ने कैसा काम किया?

फिल्म की दूसरी स्टैंडआउट परफॉर्मेंस है साई पल्लवी। सीता के किरदार में जो फ्रेशनेस साई लेकर आती हैं, वह काफी शानदार है। यश के रावण की तरह फिल्म सीता को भी बिल्ड करती है। बचपन से ही उन्हें शस्त्र और शास्त्र, दोनों में महारत रखते हुए दिखाया जाता है। साथ ही फिल्म में वह अयोध्या की एडमिनिस्ट्रेशन की ज़िम्मेदारियाँ निभाती भी नज़र आती हैं।

 

यानी सीता का किरदार सिर्फ राम की पत्नी या आगे चलकर रावण के हाथों अपहरण का शिकार होने तक सीमित नहीं है। उनकी अपनी एक पहचान, समझ और एजेंसी है। साई पल्लवी इस पर्सनैलिटी को काफी सहजता से पर्दे पर लेकर आती हैं, जो की उनकी खूबी भी रही है। उनकी परफॉर्मेंस में एक तरफ कॉन्फिडेंस है, तो दूसरी तरफ वो ग्रेस भी, जो सीता के किरदार के लिए ज़रूरी है। 

खराब डायलॉग फिल्म को डुबा देंगे?

फिल्म के डायलॉग्स के लिए मैं Disappointing से भी नीचे का कोई शब्द ढूँढ रहा हूँ, मगर आगे चलते हैं। डायलॉग लिखे हैं श्रेयस जैन और नीतेश तिवारी ने. श्रीधर राघवन ने फिल्म का स्क्रीनप्ले लिखा है। डायलॉग्स के साथ मुझे यह दिक्कत महसूस हुई कि वे याद नहीं रह जाती हैं। भाषा को संस्कृतनिष्ठ बनाने पर ज़ोर दिखता है। माते और पुत्र टाइप भाषा है लेकिन उनसे ऐसा डायलॉग बन नहीं पाता जिसे दर्शक अपने साथ लेकर थिएटर से बाहर निकल सके।

इसका असर फिल्म के सबसे ज़रूरी सीन्स पर पड़ता है। राम-भरत का मिलन हो, दशरथ और कैकेयी के बीच संवाद या राम के वे डायलॉग्स, जिनके ज़िम्मे कहानी का इमोशनल बॉन्ड बनाना था, वह बन नहीं बाता। डायलॉग असर नहीं छोड़ते हैं।

इमोशनल कनेक्ट

अगर आपने रामलीला देखी हो या रामानंद सागर की रामायण, तो आपको पता होगा कि स्वयंवर में जनक का शोक कितना अहम है। फिल्म जैसे इस पूरे पहलू को भूल ही जाती है। ऊपर से जनक के डायलॉग्स इस कमी को और ज़ाहिर करते हैं। रामायण की कहानी की आत्मा हैं उसके इमोशन। लोग राम भारत मिलाप पर, अयोध्या से वनवास जान के प्रसंग पर, वाकई रोते हैं, फिल्म इन सारे यहां सीन्स के बारे में कुछ भी फ़ील कराने में फेल होती है। एक याद चुनिंदा सीन्स को छोड़ दे जिनकी बात हम आगे करेंगे, तो ईमोशनल बॉन्ड बन ही नहीं पाता। 


एक फ्रेश वर्ल्ड और विजुअल स्पेक्टेकल, खराब राइटिंग की वजह से सफर करता है। और यही फिल्म की सबसे बड़ी कमज़ोरी है, जिसका असर बॉक्स ऑफिस पर भी देखने को मिल सकता है।

रामायण का म्यूजिक कैसा है?

 

म्यूजिक अच्छा है मगर क्या ऑस्कर विनर्स A R रहमान और हंस जीममर लेवल का है, इसमें संदेह है। हंस जीममर की अगर आपने बाकी सकोरेस देखें हो जैसे इन्टर्स्टेलर ले लीजिए तो उनका स्कोर सीन को इन्टेन्स करने के लिए सबसे यहां टूल होता है, ऐसा कुछ भी रामायण से मिसिंग है। म्यूजिक अच्छा है, बेस्ट नहीं है। लीरिक्स पर दो शब्द से ज्यादा नहीं खर्चना चाहूँगा। ये बिलो एवरेज हैं।

चूक गए रणबीर कपूर?

फिल्म की राइटिंग के बाद अगर कुछ निराश करता है तो वह है रणबीर कपूर की एक्टिंग। रणबीर अपनी पोटेंशियल पर खरे नहीं उतरते। पूरी फिल्म में एक ही तरह का सेम फेस कैरी करने की उनकी कोशिश साफ़ दिखती है। वह राम की फील तो देते हैं, मगर किरदार में अपनी तरफ़ से कुछ खास ऐड नहीं कर पाते। हालांकि, कुछ अच्छे परफॉर्मेंस मोमेंट्स उनके हिस्से भी आते हैं। खासकर जब भी उनके सीन्स साई पल्लवी के साथ होते हैं, वे फिल्म के सबसे अच्छे और फील-गुड मोमेंट्स में से हैं। राम और सीता की केमिस्ट्री काफी खूबसूरती से बनती है और पर्दे पर बहुत नैचुरल लगती है। इसके अलावा क्लाइमैक्स तक आते-आते रणबीर का राम इम्पैक्ट छोड़ने लगता है लेकिन ओवरऑल परफॉर्मेंस एवरेज ही रहती है।

 

एवरेज की ही श्रेणी में मुझे लक्ष्मण का किरदार निभा रहे रवि दुबे का काम भी लगा। आम तौर पर हमारे दिमाग में छवि एक शॉर्ट टेम्पर और अड़ियल इन अ गुड वे वाली इमेज है लक्ष्मण की, नितेश लक्ष्मण को फिल्म में ह्यूमर ऐड करने के लिए करते है। हर जगह फ्रेश्नस अच्छी नहीं लगती। कुणाल कपूर इन्द्र के रोल में काफी सही थे, सौरभ सचदेवा का मारीच एक और स्टैन्डाउट था, लारा दत्ता और शीबा चढ़ा भी कैकई और मंथरा के रोल में बढ़िया लगे।  

सिनेमैटोग्राफी कमाल है। इतनी कि आप एक भी फ्रेम मिस नहीं करना चाहते। चाहे संवाद कितने ही बोरिंग हों। पंकज कुमार और महेश लिमये ने इसे निभाया है और बखूबी निभाया है। 

 

फिल्म का फर्स्ट हाफ एंगगईनग है सेकंड बोरिंग है और लंबा है, तीन घंटे आपको महसोस होते है जब आँखों पर भारीपन छाता है। हालांकि क्लाइमैक्स औरजतायु और रावण की फाइट, मतलब, बहुत throughout, इस सीन को देख कर लागत है की एक सोच यही एक डिरेक्शिन है। इसके लिए और सभी एक्शन सीक्वन्स के लिए शाबाशी के हकदार है हॉलिवुड स्टन्ट डायरेक्ट Guy Norris।  जटायु के गिरने के सीन पर ध्यान दीजिएगा कुछ बहुत ही अच्छा देखने मिलेगा। 

 

सारी बातें हो गईं, अब सवालों के जवाब ढूँढते हैं। क्या फिल्म अपना बजट जस्टिफाई करती है? विजुअली तो बिल्कुल हाँ। क्या नमित और नितेश रामायण के साथ कुछ नया कर पाते हैं? इसका जवाब भी हाँ है। एक फ्रेशनेस और एक अलग तरह की दुनिया बनाने में फिल्म कामयाब होती है। यश रावण के तौर पर बेहतरीन हैं, साई पल्लवी भी। रणबीर अपनी पोटेंशियल पर खरे नहीं उतरते और फिल्म की राइटिंग सबसे ज़्यादा डिसअपॉइंट करती है लेकिन VFX और विजुअल स्टोरीटेलिंग फिल्म की सबसे बड़ी USP बनकर सामने आते हैं।