रात को सोने से ठीक पहले तक मोबाइल स्क्रॉल करना और सुबह जागते ही फोन उठा लेने की आदत मानसिक सेहत के लिए खतरनाक बनती जा रही है। इससे नींद टूटती है, तनाव और चिंता बढ़ती है और दिमाग की एकाग्रता भी कमजोर पड़ने लगती है। इससे निपटने के लिए अब जेन-जी (जनरेशन जेड) डिजिटल डिटॉक्स का सहारा ले रही है और यह तरीका कारगर भी साबित हुआ है। 

 

पीजीआई के क्लिनिकल साइकोलॉजी के विशेषज्ञ डॉ. कृष्ण कुमार और पारुल यूनिवर्सिटी, वडोदरा के विजेंद्र नाथ पाठक के शोध में यह बात सामने आई है। शोध के मुताबिक, डिजिटल डिटॉक्स के बाद युवाओं की नींद, मानसिक स्थिति और माइंडफुलनेस में सुधार के संकेत मिले हैं। 

 

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शोध में क्या आया सामने? 

यह शोध अगस्त 2026 में एनल्स ऑफ न्यूरो साइंसेज जर्नल में प्रकाशित हुई है। शोध में शामिल 18 से 21 साल के 200 स्टूडेंट्स के डिजिटल व्यवहार का अध्ययन किया गया। शोध में पाया गया कि ज्यादा डिजिटल इस्तेमाल करने वाले छात्रों में 'फियर ऑफ मिसिंग आउट' यानी FOMO, डिप्रेशन, एंग्जायटी, तनाव और खराब नींद की समस्या ज्यादा पाई गई, साथ ही माइंडफुलनेस यानी ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कम पाई गई।

 

इसके अलावा, ज्यादा डिजिटल इस्तेमाल से नार्सिसिज्म, मैकियावेलियनिज्म और साइकोपैथी जैसे 'डार्क ट्रायड' व्यक्तित्व लक्षणों से भी जुड़ा पाया गया। हालांकि, 4 हफ्ते के स्ट्रक्चर्ड डिजिटल डिटॉक्स प्रोग्राम के बाद, जिन छात्रों ने डिटॉक्स अपनाया उनमें पहले की तुलना में साफ सुधार देखा गया। ऐसे छात्रों में FOMO, डिप्रेशन, एंग्जायटी, तनाव और डार्क ट्रायड लक्षणों में कमी आई, जबकि नींद और माइंडफुलनेस बेहतर हुई।

 

इन्हें 2 ग्रुप में बांटा गया था, जब डिटॉक्स करने वाले समूह यानी एक्सपेरिमेंटल ग्रुप की तुलना बिना डिटॉक्स वाले समूह यानी कंट्रोल ग्रुप से की गई, तो अंतर और भी स्पष्ट था। जिन्होंने अपनाया उनकी मानसिक स्थिति, नींद और माइंडफुलनेस, कंट्रोल समूह से कहीं बेहतर पाई गई। डिजिटल डिटॉक्स सामान्य काउंसलिंग से भी ज्यादा असरदार साबित हुआ, यह सिर्फ तुरंत राहत ही नहीं बल्कि लंबे समय में मानसिक सेहत बनाए रखने का एक कारगर उपाय हो सकता है।

रिसर्च मेथड को समझिए 

बता दें कि शोध का डिजाइन क्वासी-एक्सपेरिमेंटल (यानी पहले और बाद की तुलना वाला अध्ययन) था। इसमें गुजरात के वडोदरा जिले से 18-21 साल के 200 अंडरग्रैजुएट और पोस्टग्रैजुएट छात्र (98 लड़के और करीब 102 लड़कियां शामिल थीं), साधारण रैंडम सैंपलिंग से चुने गए। शोध के लिए FOMO स्केल, डिप्रेशन, एंग्जायटी और स्ट्रेस मापने के लिए DASS-21, नींद की गुणवत्ता मापने के लिए PSQI और माइंडफुल अटेंशन अवेयरनेस स्केल के अलावा शॉर्ट डार्क ट्रायड (SD3) स्केल का इस्तेमाल किया गया। 

 

इसके लिए प्रतिभागियों को दो समूहों में बांटा गया, एक एक्सपेरिमेंटल ग्रुप, जिसे 4 हफ्ते का डिजिटल डिटॉक्स प्रोग्राम दिया गया। दूसरा कंट्रोल ग्रुप, हर हफ्ते 40 से 45 मिनट की मीटिंग होती थी, जिसमें स्क्रीन टाइम घटाकर वॉक, खेल, पढ़ाई, कुकिंग, पेंटिंग जैसी एक्टिविटीज अपनाने को कहा गया। नतीजे क्या आए आंकड़ों से समझें। 

 

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4 हफ्ते डिजिटल डिटॉक्स करने वाले छात्र

 

यह नतीजे उन 100 छात्रों के हैं, जिन्होंने 4 हफ्ते डिजिटल डिटॉक्स किया। इससे डिटॉक्स से पहले और डिटॉक्स के बाद उनकी स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। केवल 4 हफ्तों में इन्हीं छात्रों में तनाव, चिंता, डिप्रेशन घटीं, जबकि नींद और मानसिक शांति बढ़ी।

 

डिजिटल ओवरलोड है असली समस्या?

आज के समय में परेशानी केवल स्क्रीन टाइम नहीं है, बल्कि डिजिटल ओवरलोड भी एक बड़ी समस्या है। लगातार आने वाले नोटिफिकेशन, सोशल मीडिया, गेम्स और वीडियो देखने की आदत का डिजिटल बोझ लोगों पर बढ़ रहा है। दूसरी ओर रात को बिस्तर पर लेटकर भी स्क्रॉल करते रहना दिमाग को कभी आराम ही नहीं करने देता। 

 

आज के समय में इंस्टाग्राम रील्स, शॉर्ट वीडियो, ऑनलाइन चैटिंग और गेमिंग अब युवाओं की जिंदगी का इतना बड़ा हिस्सा बन चुके हैं कि उनसे दूर रहना मुश्किल लगता है। जो लोग डिजिटल चीजों का इस्तेमाल ज्यादा करते हैं, उनमें तनाव और खराब मानसिक हालत भी ज्यादा देखी गई। इसलिए डिजिटल डिटॉक्स को एक अच्छा उपाय माना जा रहा है।

डिजिटल डिटॉक्स का मतलब फोन छोड़ देना नहीं

डिजिटल डिटॉक्स का मतलब यह नहीं कि आप मोबाइल, इंटरनेट या सोशल मीडिया को छोड़ ही दें। इसका मतलब है एक बैलेंस बनाना, जैसे बिना वजह स्क्रॉल करना कम करना, जो जरूरी नहीं, उन नोटिफिकेशन को बंद रखना, सोने से पहले स्क्रीन से दूरी बनाना, और दिन में कुछ समय फोन से अलग रहना। मतलब साफ है - फोन से भागना नहीं है, बस फोन को अपनी पूरी जिंदगी पर हावी नहीं होने देना है।

डिजिटल डिटॉक्स का आसान फॉर्मूला समझिए

  • नोटिफिकेशन पर कंट्रोल करें, गैरजरूरी ऐप के नोटिफिकेशन को कम रखें।  
  • उठते ही फोन न उठाएं,  सुबह की शुरुआत नोटिफिकेशन देखने की बजाय अपनी दिनचर्या से करें।
  • खाना खाते, पढ़ाई करते या परिवार के साथ समय बिताते वक्त मोबाइल अलग रख दें।
  • सोने से पहले स्क्रीन ब्रेक लें, बिस्तर पर स्क्रॉलिंग करने की बजाय स्क्रीन से दूरी बनाएं।
  • स्क्रॉलिंग का समय तय करें, सोशल मीडिया के लिए एक निश्चित समय तय करें।
  • इसके अलावा, स्क्रीन की जगह असल जिंदगी के रिश्तों को समय दें। दोस्तों, परिवार से आमने सामने बातचीत करें। खेल, टहलना और दूसरी गतिविधियां अपनाएं।