हाल ही में इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने एक इंटरव्यू में बड़ा बयान देकर दुनिया का ध्यान खींचा है। उन्होंने कहा है कि इजराइल को एक ऐसी अर्थव्यवस्था तैयार करनी होगी जो अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और बैंकिंग सेक्टर पर लगने वाली पाबंदियों के बीच भी चल सके। इसके लिए उन्होंने ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी और डिजिटल करेंसी को एक संभावित विकल्प के तौर पर सुझाया है।

 

इसके साथ ही नेतन्याहू ने अमेरिका से मिलने वाली सैन्य मदद को लेकर भी आगाह किया है। उन्होंने साफ कहा कि देश को अब यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि अमेरिका से मिलने वाली करोड़ों-अरबों डॉलर की डिफेंस फंडिंग हमेशा मिलती रहेगी। वक्त बदल रहा है और इजराइल को अपने पैरों पर खड़े होने की तैयारी करनी होगी।

 

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क्यों बढ़ रहा है अंतरराष्ट्रीय दबाव?

यह बयान ऐसे समय आया है जब दुनिया के कई देश इजराइल के खिलाफ आर्थिक और कूटनीतिक कदम उठा रहे हैं। 'जेविश पीपुल्स पॉलिसी इंस्टीट्यूट' (JPPI) के आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया के 64 देशों में इजराइल के खिलाफ 139 तरह के प्रतिबंध दर्ज हैं। इनमें से 111 पाबंदियां अभी भी लागू हैं। इनमें फाइनेंस, डिफेंस, ट्रेड और कूटनीति जैसे मामले शामिल हैं। इसमें स्पेन, अमेरिका, ब्रिटेन, बेल्जियम और तुर्की जैसे देश आगे हैं।

 

दूसरी तरफ, इजराइल के 60 से ज्यादा जाने-माने अर्थशास्त्रियों ने भी चेतावनी दी है कि वेस्ट बैंक की नीतियों और चरमपंथी घटनाओं के कारण देश की इकोनॉमी को भारी नुकसान हो रहा है। उनका कहना है कि अगर ब्रिटेन, फ्रांस, नीदरलैंड और कनाडा जैसे देशों के इस तरह के फैसले पूरे यूरोप में फैल गए तो लोगों की मुश्किलें और महंगाई दोनों बहुत बढ़ जाएंगी।

क्या डिजिटल करेंसी वाकई बचा सकती है?

नेतन्याहू ने ब्लॉकचेन और डिजिटल करेंसी को विकल्प तो बताया है लेकिन क्या यह सचमुच किसी देश को अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से बचा सकता है? सबसे पहले समझते हैं कि बैंकिंग प्रतिबंध कैसे काम करते हैं? अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग सिस्टम जैसे SWIFT नेटवर्क के जरिए ही दुनिया भर के देश आपस में पैसे का लेन-देन करते हैं। अगर किसी देश के बैंकों पर प्रतिबंध लग जाए तो वे अंतरराष्ट्रीय लेनदेन, विदेशी मुद्रा भुगतान और दूसरे देशों के वित्तीय संस्थानों तक अपनी पहुंच खो देते हैं।

 

अब समझते हैं कि ब्लॉकचेन क्या बदल सकता है? ब्लॉकचेन तकनीक की मदद से कुछ डिजिटल लेनदेन पारंपरिक बैंकिंग नेटवर्क के बाहर किए जा सकते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि देश की सारी समस्याएं हल हो गईं। इससे विदेशी मुद्रा जुटाना, बड़े पैमाने पर व्यापारिक भुगतान करना जैसे कच्चा तेल या हथियार खरीदना अपने आप आसान नहीं हो जाता।

 

डिजिटल करेंसी से भुगतान हो जाने के बाद भी असली चुनौती यह है कि बेचने वाला देश उस भुगतान को स्वीकार करेगा या नहीं। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन करना और सामान की सही समय पर सप्लाई होना भी उतना ही जरूरी है। यह केवल करेंसी बदलने से संभव नहीं है। डिजिटल करेंसी के इस्तेमाल से पूरी तरह से बचना संभव नहीं है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि प्रतिबंध किस तरह के हैं, किन बैंकों या कंपनियों पर लगे हैं। साथ ही दुनिया के बाकी देश उनका कितना पालन कर रहे हैं। किसी एक तकनीक के सहारे पूरी वैश्विक व्यवस्था से कटकर व्यापार करना बेहद मुश्किल होता है।

 

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नेतन्याहू ने ब्लॉकचेन को भविष्य के लिए एक संभावित विकल्प के तौर पर जरूर सुझाया है लेकिन इसे इजराइल की कोई तैयार या लागू हो चुकी व्यवस्था नहीं समझना चाहिए। हकीकत यही है कि डिजिटल करेंसी कागजी पाबंदियों से भले ही राहत दे लेकिन वैश्विक व्यापार की बड़ी जरूरतों को पूरा करने के लिए यह पारंपरिक अर्थव्यवस्था का पूरा विकल्प नहीं बन सकती।