भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद (UNSC) का स्थायी सदस्य बनने की कोशिश कर रही है। फिलहाल उसकी नजर 2028-29 में सुरक्षा परिषद में अस्थायी सीट पाने पर है। इसी बीच संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच पर भारत ने वीटो पावर का मुद्दा उठाया है। भारत का कहना है कि अगर UNSC के नए सदस्यों को वीटो पावर नहीं मिलेगी तो वे सेकेंड क्लास देश की तरह रह जाएंगे। भारत का कहना है कि इस तरह नए देश UNSC के सदस्य भले बन जाएंगे लेकिन फैसले लेने का अधिकार उन्हीं पांच देशों के पास रहेगा जिनके पास अभी है। सोमवार को संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पर्वतनेनी हरीश यानी पी हरीश ने ये बातें रखकर सनसनी मचा दी है।
पी हरीश ने कहा कि जब तक वीटो का प्रावधान मौजूद है, तब तक सुधार के बाद भी परिषद के सभी स्थायी सदस्यों को यह अधिकार मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि निष्पक्षता और न्याय के लिए जरूरी है कि सभी स्थायी सदस्यों के अधिकार और जिम्मेदारियां समान हों। बता दें कि मौजूदा वक्त में सिर्फ चीन, अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, रूस और फ्रांस ही UNSC के स्थायी सदस्य हैं और इन पाचों के पास ही वीटो का अधिकार है। वीटो का मतलब है कि अगर किसी भी फैसले पर इनमें से कोई भी एक देश असहमत हो और वह वीटो का इस्तेमाल करे तो वह फैसला लागू नहीं हो सकता है।
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पी हरीश ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में ‘वीटो के सवाल पर विषयवार चर्चा’ के मुद्दे पर आयोजित अंतर-सरकारी वार्ता (IGN) के पूर्ण सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि सुरक्षा परिषद में सुधार के तहत वीटो के अधिकार के बिना स्थायी सदस्यों की एक नई श्रेणी बनाने से इस श्रेणी में शामिल देश वास्तव में सेकेंड क्लास सदस्य बन जाएंगे। इससे पांच स्थायी सदस्यों (P5) के फैसले लेने के तरीके में कोई बदलाव नहीं आएगा।
भारत ने UNGA के मंच पर क्या-क्या कहा?
पी हरीश ने भारत का पक्ष रखते हुए कहा, 'वीटो एक जिम्मेदारी है जिसका इस्तेमाल बहुत संवेदनशीलता से होना चाहिए। अभी तक कुल लगभग 200 प्रस्तावों पर 331 बार वीटो का इस्तेमाल हुआ है। हम यह भी जानते हैं कि पांच में से दो सदस्यों ने पिछले साढ़े तीन दशक में एक भी बार वीटो का इस्तेमाल नहीं किया है। ज्यादातर वीटो का इस्तेमाल सिर्फ 3 देशों ने ही किया है।'
उन्होंने आगे कहा, 'वीटो पर भारत की राय यही है कि जब तक वीटो है तक तक इसका अधिकार सभी सदस्यों के पास होना चाहिए। हमारी मांग है कि लिखित में समझौते होने चाहिए। भारत हमेशा इसका समर्थन करेगा।'
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क्या चाहता है भारत?
भारत स्थायी और अस्थायी दोनों तरह की कैटगरी में सदस्यों की संख्या के विस्तार की लगातार मांग करता रहा है। भारत ने आगाह किया है कि अगर सुधार के प्रयास केवल अस्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने तक सीमित रहे तो वे लगभग फेल साबित होंगे। भारत सुरक्षा परिषद में सुधार को लेकर कई साल से जारी प्रयासों में सबसे आगे रहा है। भारत का कहना है कि 1945 में बनी यह संस्था 21वीं सदी के हिसाब से उपयुक्त नहीं है और यह मौजूदा भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को नहीं दर्शाती है।
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भारत इस बात पर लगातार जोर देता रहा है कि वह सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का उचित हकदार है। भारत 2028-29 के कार्यकाल के लिए सुरक्षा परिषद में अस्थायी सीट पाने की कोशिश भी कर रहा है। इस कार्यकाल के लिए चुनाव अगले साल जून में होने हैं। इसमें एशिया-प्रशांत समूह के लिए आवंटित एकमात्र सीट के लिए भारत और ताजिकिस्तान के बीच मुकाबला होगा। भारत इससे पहले 2021-22 में सुरक्षा परिषद का सदस्य रहा था। यह परिषद में उसका आठवां कार्यकाल था। इससे पहले भारत 1950-51, 1967-68, 1972-73, 1977-78, 1984-85, 1991-92 और 2011-12 में भी परिषद का सदस्य रह चुका है।
बता दें कि चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका 15 सदस्यीय सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य हैं और इनके पास वीटो का अधिकार है। परिषद में 10 अस्थायी सदस्य भी होते हैं, जिन्हें दो साल के कार्यकाल के लिए चुना जाता है।
