दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती एनर्जी रूट की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। भारत के भी सामने यही चुनौती है। वैश्विक जरूरत का 20 फीसद ईंधन आपूर्ति करने वाला स्ट्रेट ऑफ होर्मुज अभी बंद है। दूसरी तरफ लाल सागर में तनाव बढ़ रहा है। हूती विद्रोहियों ने बाब अल-मंडेब की घेराबंदी शुरू कर दी है। पश्चिमी हिंद महासागर के करीब अदन की खाड़ी और हॉर्न ऑफ अफ्रीका में तुर्की, पाकिस्तान, सऊदी अरब ने नए रणनीतिक गठबंधन बनाने शुरू कर दिए हैं, ताकि लाल सागर पर अपना नियंत्रण बरकरार रखा जा सके।
तुर्की और पाकिस्तान का गठजोड़ और उसकी लाल सागर में उपस्थिति भारत के लिए सिरदर्द बन सकती है। ईरान के साथ भारत के रिश्ते अच्छे हैं, लेकिन होर्मुज बंद होने से भारत की ऊर्जा सुरक्षा खतरे में हैं। हिंद महासागर में भारत के व्यापक हित है। क्षेत्र की सबसे बड़ी नौसेना होने के नाते भारत नहीं चाहेगा कि दुनिया के दो अहम ऊर्जा मार्गों पर उन शक्तियों को नियंत्रण हो, जो भविष्य में कोई बड़ा संकट खड़ा करने की मंशा रखती हों।
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ऐसे में अगर भारत को अपने एनर्जी रूट को सुरक्षित रखना है तो कुछ बड़े कदम उठाने होंगे। लाल सागर से होर्मुज तक नए रणनीतिक समीकरणों पर ध्यान देना होगा। संयुक्त अरब अमीरात, इजरायल और अमेरिका के साथ उन रणनीतिक केंद्रों पर फोकस करना होगा, जहां से लाल सागर और होर्मुज पर अपना प्रभाव बनाया जा सके।
लाल सागर में पाकिस्तान और तुर्की की बढ़ी दखल क्यों चिंताजनक?
आज लाल सागर पर नियंत्रण को लेकर हॉर्न ऑफ अफ्रीका भू-राजनीति का हॉटस्पॉट बना है। तुर्की का दखल सबसे अधिक बढ़ रहा है। वह लाल सागर के दोनों किनारों पर अपनी सैन्य मौजूदगी चाहता है। यही कारण है कि उसने सोमालिया में भारी निवेश किया। सबसे बड़ा सैन्य अड्ढा बनाया। इजरायल के जवाब में वहां एफ-16 की तैनाती की। इस खेल में तुर्की ने पाकिस्तान को भी शामिल कर लिया है। हाल ही में तुर्की के ही इशारे पर पाकिस्तान और सोमालिया के बीच रक्षा समझौता हुआ है। नए समझौते से न केवल तुर्की, बल्कि पाकिस्तान की भी सैन्य मौजूदगी सोमालिया में रहेगी। यह गठबंधन भारत के सामने भविष्य में चुनौती खड़ा कर सकता है।
क्या सोमालीलैंड बनेगा गेमचेंजर?
तुर्की की चाल से इजरायल पहले से ही वाकिफ था। इजरायल ने पिछले साल सोमालिया के विद्रोही क्षेत्र सोमालीलैंड को मान्यता देकर तुर्की को सीधा संदेश भेजा। ईरान के साथ युद्ध के दौरान सोमालीलैंड में अपनी सेना भी तैनात की। लाल सागर के आसपास तुर्की के प्रभाव को खत्म करना इजरायल की पूरी कोशिश है। सोमालीलैंड को खुलकर तो नहीं, लेकिन अंदरखाने संयुक्त अरब अमीरात का भी समर्थन प्राप्त है।
क्या भारत भी बदलेगा अपनी रणनीति?
विशेषज्ञ सोमालीलैंड को बेहद अहम मान रहे हैं। उनका मानना है कि यह इलाका ही लाल सागर पर किसका नियंत्रण होगा... यह तय करेगा। सोमालीलैंड और हॉर्न क्षेत्र के मामलों का विश्लेषण करने वाले रणनीतिकार और राजनयिक गुलाद यूसुफ इदान का कहना है कि अमेरिका और भारत जैसे देशों को सोमालीलैंड पर विचार करना चाहिए। यूएई और इजरायल के साथ मिलकर रणनीतिक पकड़ को मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए। वैसे भी सोमालिया ने पाकिस्तान के साथ रक्षा समझौता करके पहले ही भारत को सोमालीलैंड पर विचार करने का मौका दे दिया है। हालांकि भारत की नीति बिल्कुल अलग है। वह सोमालीलैंड को सोमलिया का अभिन्न हिस्सा मानता है।
लाल सागर पर नियंत्रण की होड़
दुनिया सबसे बड़े सवाल से जूझ रही है कि लाल सागर पर किसका नियंत्रण होगा। एक तरफ तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब हैं। दूसरी तरफ इजरायल और संयुक्त अरब अमीरात का गठबंधन हैं। भारत अभी तक तटस्थ है, लेकिन उसके हित यूएई और इजरायल से अधिक जुड़े हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर लाल सागर में नियंत्रण और हितों की रक्षा करनी है तो भारत, संयुक्त अरब अमीरात, इजरायल और अमेरिका को एक साथ आना होगा, क्योंकि तुर्की मिस्र के सहारे स्वेज नहर से अदन की खाड़ी तक अपनी सैन्य उपस्थिति चाहता है। मक्के समझौते के तहत अंकारा लाल सागर के सऊदी वाले हिस्से में भी अपनी सैन्य मौजूदगी पाकिस्तान के साथ बनाना चाहता है।
यमन में यूएई का गेम, भारत को कैसे होगा फायदा?
यमन में यूएई ने दक्षिणी संक्रमणकालीन परिषद (एसटीसी) का समर्थन किया। इसका मकसद यह था कि हूती विद्रोहियों को पीछे धकेल कर दक्षिण यमन को एक नए देश के तौर पर मान्यता दिलाना, ताकि लाल सागर के दोनों छोर पर यूएई का सीधा दखल हो सके। हालांकि यूएई की इस चाल को सऊदी अरब ने अपने लिए खतरा माना और एसटीसी पर हवाई हमला किया। दोनों देशों की प्रतिद्विंद्विता का नतीजा यह है कि बाब अल-मंडेब पर हूती विद्रोहियों का नियंत्रण है। अगर अमेरिका, इजरायल और यूएई एसटीसी का समर्थन करते हैं तो हूती विद्रोही कमजोर पड़ेगा और अदन की खाड़ी पर इन देशों का प्रभाव तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब की तुलना में अधिक होगा। अगर एसटीसी दक्षिण यमन में अपना प्रभाव बनाने में कामयाब होता है तो लाल सागर के दोनों तटों पर यूएई और इजरायल की उपास्थिति मजबूत होगी। इसका सीधा फायदा भारत को मिलेगा।
पुंटलैंड पर सैन्य मौजूदगी बढ़ा रहा अमेरिका
उधर, अमेरिका भी लाल सागर की भू-राजनीति में कूद गया है। सोमालिया से अलग हुए पुंटलैंड में अमेरिका ने अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा दी है। अदन की खाड़ी पर स्थित बंदरगाह शहर बोसासो में अमेरिकी सैन्य अड्डे के विस्तार किया जाएगा। दूसरी तरफ सोमालीलैंड में इजरायल की सेना पहले ही तैनात है। जिबूती में अमेरिका का एक बड़ा सैन्य अड्डा भी है। यमन में यूएई की मौजूदगी गठबंधन को और बल देगा। इसके अलावा पुंटलैंड के बोसासो में भी यूएई की सैन्य उपस्थिति है। सूडान के अर्धसैनिक रैपिड सपोर्ट फोर्सेज को यही से यूएई हथियारों की सप्लाई करता है।
इजरायल, अमेरिका और संयुक्त अरब अमीरात लाल सागर के आसपास जिन समीकरणों को आकार देने में जुटे हैं, उनका सीधा फायदा भारत को भी मिल सकता है। इससे न केवल हॉर्न ऑफ अफ्रीका में भारत की उपस्थिति मजबूत होगी, बल्कि यूएई और इजरायल के साथ रणनीतिक संबंध बेहतर होने से दो प्रमुख जलमार्गों के रास्ते भारत की ऊर्जा आपूर्ति भी सुरक्षित होगी।
मिस्र के साथ सक्रियता बढ़ाने की जरूरत
लाल सागर के एक छोर पर बाब अल-मंडेब और दूसरे छोर पर स्वेज नहर है। स्वेज नहर पर मिस्र का नियंत्रण है। भारत के रिश्ते मिस्र के साथ बेहद अच्छे है। कुछ मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया कि मक्का पैक्ट में मिस्र को भी शामिल होना था, लेकिन भारत की वजह से काहिरा ने ऐसा नहीं किया। कुछ दिन पहले ही तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने कहा था कि मिस्र भी रक्षा समझौते में शामिल हो सकता है। इसके बाद हाकान फिदान ने काहिरा की यात्रा की। माना जा रहा है कि तुर्की हर हाल में मिस्र को गठबंधन में खींचना चाहता है।
भारत के सामने चुनौती यह है कि मिस्र को मक्का पैक्ट से अलग कैसे रखा जाए? काहिरा में तुर्की के प्रभाव को कैसे कम किया जाए। भारत को मिस्र के साथ रणनीतिक साझेदारी को और गहरा करने की जरूरत है।
ईरान से बेहतर रिश्ते और यूएई के साथ बढ़ाना होगा सहयोग
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज भारत के लिए बेहद अहम है। खाड़ी देशों के साथ होने वाला अधिकांश व्यापार इसी मार्ग से होता है। भारत को यहां अपने हितों की रक्षा करने के लिए न केवल ईरान से बेहत रिश्ते रखने होंगे, बल्कि संयुक्त अरब अमीरात और ओमान के साथ रणनीतिक साझेदारी को और ऊंचाइयों तक ले जाना होगा, ताकि क्षेत्र में होने वाले किसी भी उथल-पुथल का असर भारत पर कम ही पड़े।
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क्या बलूचिस्तान से निकलेगा होर्मुज विजय का मार्ग?
अमेरिका की कोशिश है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर उसका नियंत्रण रखे। ईरान के साथ अब यह मामला प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है। लेकिन कुछ विश्लेषकों का मानना है कि होर्मुज पर नियंत्रण की चाबी ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान औ पाकिस्तान के बलूचिस्तान राज्य में है। यहां दशकों से विद्रोह की आग भड़क रही है। अगर इजरायल और अमेरिका को होर्मुज पर नियंत्रण चाहिए तो यहां फैले विद्रोह को खाद पानी देना होगा। अगर यह इलाका आजाद हो जाता है तो यहां भविष्य में अमेरिका की सेना अपनी मौजूदगी दिखा सकती है। फारस की खाड़ी के नजदीक होने के कारण होर्मुज पर निगाह रखी जा सकती है। इसके अलावा ग्वादर बंदरगाह के जरिये अरब सागर तक चीन के सीधे दखल को रोका जा सकता है।
अमेरिका की रणनीति अपनी सेना को ईरानी धरती पर उतारने की है, लेकिन किसी भी खाड़ी के देश ने इसकी इजाजत नहीं दी है। लेकिन अलग होने पर बलूचिस्तान से यह करना आसान होगा। अमेरिका पाकिस्तान में एक सैन्य अड्डा बनाना चाहता है। इमरान खान की सरकार ने इससे साफ इनकार कर दिया था। उसका यह ख्वाब बलूचिस्तान में पूरा हो सकता है। यहां यह भी बताना जरूरी है कि इजरायल ने बलूचिस्तान पर फोकस करना शुरू कर दिया है।
ऊर्जा क्षेत्र में विविधता क्यों ला रहा भारत?
ईरान यु्द्ध ने भारत को एक सबक दिया। सबक यह था कि किसी एक या कुछ देशों पर ही ऊर्जा की निर्भरता नहीं बनानी है। युद्ध के बाद भारत ने 40 से अधिक देशों से गैस और कच्चा तेल खरीदा। आज संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब के अलावा भारत अमेरिका, वेनेजुएला, ब्राजील और रूस से तेल खरीद रहा है। विविधिता के कारण देश की ऊर्जा आपूर्ति न केवल सुरक्षित है, बल्कि वैश्विक उथल-पुथल भी उतना असर नहीं पड़ा, लेकिन होर्मुज और लाल सागर पर प्रभाव बनाना जरूरी है, क्योंकि दक्षिण अमेरिका से आने वाला तेल इसी रास्ते से आता है। इसके अलावा भारत के व्यापार का एक बड़ा हिस्सा भी इन्हीं मार्गों पर निर्भर है।
