यह दुनिया रहस्यों से भरी है। कई रहस्यों से पर्दा उठ चुका है। कई रहस्य आज भी अनसुलझे हैं। आज से लगभग 118 वर्ष पहले एक ऐसी घटना हुई, जिसने दुनियाभर के वैज्ञानिकों को हैरत में डाल दिया। सैकड़ों शोध हुए... हजारों लेख लिखे गए, लेकिन घटना के पीछे की वास्तविकता आज तक सामने नहीं है। 100 साल से अधिक बीत चुके हैं। आज भी सिर्फ अनुमान और कयासबाजी ही हाथ लगी है।
रूस की राजधानी मॉस्को से हजारों किलोमीटर दूर स्थित एवेंकीस्की जिले में पोडकामेन्नाया तुंगुस्का नदी के नजदीक एक भीषण धमाका हुआ। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक पहले आसमान में धुआं उठा। इसके बाद सूर्य से भी तेज चमक उठी। कुछ देर बाद ऐसा लगा, जैसे आसमान से तोपें गरजने लगीं। लोग दूर जा गिरे और बेहोश हो गए। होश आने पर चारों तरफ सिर्फ तबाही के निशान बाकी थे। दिल्ली से लगभग डेढ़ गुने आकार के क्षेत्रफल में पेड़ गिर चुके थे या जल चुके थे।
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आसमान में हुआ धमाका, धरती में मची तबाही
30 जून 1908 को रूस के मध्य साइबेरिया में एक आम सी सुबह हुई। कुछ चारवाहे बारहसिंगा चराने निकल पड़े थे। आसमान बेहद साफ और हाड़ कंपाने वाली ठंड थी। सुबह 7:15 बजे कुछ चारवाहों ने आसमान में एक रहस्यमयी घटना देखी। आकाश में धुएं का एक विशाल गुबार उठा रहा था। कुछ क्षण में सूरज से भी तेज चमक उठी। जोरदार धमाके के साथ सभी चारवाहे दूर जा गिरे। जब होश आया तो चारों तरफ सिर्फ तबाही दिखी। उनके घर और जंगल उजड़ चुके थे। खड़े-खड़े पेड़ जल रहे थे। उस वक्त रूस में जार निकोलस द्वितीय का शासन था।
ऐसी चमक उठी कि लंदन में रात में अखबार पढ़ लो
नासा के अलावा अलग-अलग अनुमानों में लगभग 8 करोड़ पेड़ों को नुकसान लगाया गया। लंदन तक ऐसी चमक उठी कि लोग रात के अंधेरे में भी अखबार पढ़ सकते थे। यह घटना रूस के सबसे दुर्गम और दूरस्थ साइबेरियाई टैगा क्षेत्र में हुई। यहां आबादी बेहद कम रहती है। इस कारण जान-माल का नुकसान उतना नहीं हुआ। एक अनुमान के मुताबिक अगर यह घटना न्यूयॉर्क में होती तो पूरा शहर साफ हो जाता। रूस का यह इलाका कितना दुर्गम है इसका अनुमान इस बात से लगा सकते हैं कि यहां तक पहली वैज्ञानिक टीम को पहुंचने में 19 साल का समय लग गया।
1927 में पहली बार वैज्ञानिक पहुंचे
रूस की क्रांति, गृह युद्ध और प्रथम विश्वयुद्ध के कारण भी वैज्ञानिक टीमों को यहां भेजने में देरी हुई। साल 1921 में पहली बार सोवियत विज्ञान अकादमी ने भूविज्ञानी लियोनिद, ए कुलिक को यहां भेजा। लेकिन बेहद दुर्गम इलाक होने के कारण वह पहले प्रयास में यहां तक नहीं पहुंच सके। छह साल बाद 1927 में कुलिक को सफलता मिली।
घटनास्थल पर पहुंचने पर कुलिक को हैरतअंगेज नजारा देखने को मिला। विस्फोट के केंद्र पर पेड़ खड़े थे। आसपास के सभी पेड़ उखड़ चुके थे। केंद्र में खड़े पेड़ों की डालियां टूट चुकी थीं। पूरे तने की छाल उतर चुकी थी। बहुत से पेड़ों पर आग लगने के निशान थे। लेकिन सबसे बड़ा रहस्य बाकी था कि इतना बड़ा धमाका कैसे हुआ?
उल्कापिंड और धूमकेतु में उलझे रहे वैज्ञानिक
वर्षों तक वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया कि उल्कापिंड से यह धमाका हुआ। मगर आज तक घटनास्थल पर उल्कापिंड के अवशेष या कोई भौतिक प्रमाण नहीं मिला। बाद में वैज्ञानिकों ने धूमकेतु के कारण धमाके का अनुमान लगाया। रूसी वैज्ञानिकों को मानना था कि यह धमाका धूमकेतु से हुआ है, क्योंकि धूमकेतु बर्फ और धूल के कणों से बने होते हैं। इस कारण उनके टकराने से उल्कापिंड जैसा गड्ढा नहीं बन सकता है।
एलियन के जहाज की थ्योरी
एक अन्य अनुमान में कहा गया कि रूस का यह इलाका दलदली जमीन वाला है। यहां भारी मात्रा में मीथेन गैस बनी होगी और उसकी वजह से यह धमाका हुआ और पेड़ों में आग लगी। साल 1946 में विज्ञान पर लिखने वाले लेखक अलेक्जेंडर कज़ांत्सेव अलग ही थ्योरी थी। उनका कहना था कि एलियन का अंतरिक्ष यान साइबेरिया के ऊपर वायुमंडल में तबाह हो गया था। इससे ही यह तबाही मची थी।
कितना भयानक था धमाका
आधुनिक मानव इतिहास में इस घटना को सबसे बड़ा धमाका कहा जाता है। जापान के हिरोशिमा परमाणु धमाके से 15 किलोटन और नागासाकी विस्फोट से 21 किलोटन टीएनटी के बराबर ऊर्जा निकली थी। अनुमान के मुताबिक तुंगुस्का धमाके से निकली ऊर्जा 10 से 15 मेगाटन टीएनटी के बराबर थी। मसलन यह धमाका हिरोशिमा और नागासाकी के परमाणु धमाके से भी कई सौ गुना अधिक बड़ा था।
तितली के आकार में दिखी तबाही
1950 और 60 के दशक में वैज्ञानिकों ने घटनास्थल का जमीन और हवाई सर्वेक्षण किया। इसमें भी वैज्ञानिकों को कोई उल्कापिंड या क्षुद्रग्रह टकराने से बना गड्ढा नहीं मिला। हालांकि 830 वर्ग मील में तितली के आकार का एक निशान मिला। जहां हर तरफ तबाही दिख रही थी। घटना के केंद्र में बड़ी संख्या में पेड़ गोलाकार आकृति में गिरे पड़े थे। एक जगह कुछ पेड़ खड़े थे, लेकिन उनमें तना के अलावा कुछ नहीं बचा था।
क्या है चेको झील का रहस्य?
बाद में रूस वैज्ञानिक वीए कोशेलेव और केपी फ्लोरेन्स्की ने धमाके के केंद्र से करीब आठ किलोमीटर दूर एक झील का पता लगाया। इस झील का नाम चेको है। माना गया कि यह झील उल्कापिंड के टकराने से बनी है। हालांकि वैज्ञानिक केपी फ्लोरेन्स्की का मानना था कि यह झील घटना से भी पुरानी है। अभी तक वैज्ञानिकों को झील और धमाके बीच कोई सीधा कनेक्शन नहीं मिला। यहां तक यह भी पता नहीं चला कि झील कैसे बनी?
नासा क्या मानता है?
नासा के अलावा अधिकांश वैज्ञानिकों का मानना है कि 30 जून 1908 को हुई यह घटना क्षुद्रग्रह का नतीजा थी। इस बात पर मुहर तब और लग गई जब साल 2016 में संयुक्त राष्ट्र ने 30 जून को अंतरराष्ट्रीय क्षुद्रग्रह दिवस घोषित कर दिया।
वैज्ञानिकों के अनुमान के आधार पर नासा का मानना है कि 150 से 300 फुट व्यास की कोई वस्तु हमारे वायुमंडल में दाखिल हुई। घटनास्थल एवेनकीस्की जिले की सतह से करीब 6 से 10 किमी ऊपर धमाके के साथ तबाह हो गई। नतीजा यह हुआ कि क्षुद्रग्रह का अधिकांश हिस्सा भाप बन गया।
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तेज रफ्तार और धमाके से पैदा हुई भूकंपीय तरंग और ऊष्मीय विकिरण से धरती पर तबाही मची। हालांकि घटना के 100 साल से अधिक बीत जाने के बाद भी वैज्ञानिकों को आज भी सटीक वजह और क्षुद्रग्रह के अवशेषों की तलाश है।
पहले ही धरती पर तबाही मचा चुके क्षुद्रग्रह
हमारी धरती से क्षुद्रग्रहों और पिंडों के टकराने का खतरा हमेशा बना रहता है। आज से लगभग 44 लाख साल पहले एक पिंड हमारे गृह से टकराया था। इस पिंड का आकार मंगल गृह के इतना था। नतीजा यह हुआ कि इसके मलबे से ही हमारा चंद्रमा बना। 50 हजार वर्ष पहले भी 165 फुट चौड़ा एक क्षुद्रग्रह धरती से टकराया था। इससे एरिजोना के विंसलो के नजदीक एक मील चौड़ा क्रेटर बना था।
66 मिलियन वर्ष पहले करीब 6 मील चौड़ा एक क्षुद्रग्रह पृथ्वी से टकराया था। इससे डायनासोर हमेशा-हमेशा के लिए गायब हो गए। 75 फीसद अन्य प्रजातियां भी लुप्त हो गईं। भूवैज्ञानिकों ने 1990 में मेक्सिको के युकाटन प्रायद्वीप में एक क्रेटर को खोजा। यह लगभग 125 मील चौड़ा और पानी में डूबा है। माना जाता है कि यह क्रेटर उस घटना का ही नतीजा है, जिसके कारण डायनासोर गायब हुए थे।
वह घटना जिसने नासा को क्षुद्रग्रहों की निगरानी करने पर मजबूर किया
रूस के चेल्याबिंस्क के ऊपर 15 फरवरी 2013 को एक अद्भूत घटना हुई। आकाश में करीब 60 फुट चौड़ा क्षुद्रग्रह हवा में ही धमाके के साथ उड़ गया। इसमें 500 किलोटन टीएनटी के बराबर ऊर्जा निकली। यह ऊर्जा हिरोशिमा परमाणु बम से लगभग 33 गुना अधिक थी। इस घटना ने दुनिया की सबसे बड़ी स्पेस एजेंसी नासा को हिला दिया। नतीजा यह हुआ कि नासा ने 7 जनवरी 2016 को एक ग्रहीय रक्षा समन्वय कार्यालय (PDCO) की स्थापना की। इस इसका काम पृथ्वी के नजदीक आने वाली वस्तुओं की निगरानी करने वाली एजेंसियों फंडिंग देना था। अगर कोई पिंड या क्षुद्रग्रह खतरा होता है तो दुनियाभर में चेतावनी भेजी जाती है।
क्या क्षुद्रग्रह से बचाने की तकनीक मौजूद है?
नासा ने 23 नवंबर 2021 को डबल एस्टेरॉयड रीडायरेक्शन टेस्ट (DART) मिशन को लॉन्च किया। इस मिशन को धरती की तरफ बढ़ते क्षुद्रग्रह की दिशा बदलने के लिए तैयार किया गया था। इसमें एक अंतरिक्ष यान लगभग 14,000 मील प्रति घंटे की रफ्तार 26 सितंबर 2022 को करीब 500 फीट व्यास वाले डिमोर्फोस क्षुद्रग्रह से टकराया। नतीजा यह हुआ कि डिमॉर्फोस की डिडिमोस के चारों ओर की कक्षा 33 मिनट धीमी हो गई। ऐसा पहली बार हुआ था जब तकनीक के जरिये क्षुद्रग्रह की दिशा को बदला गया था, ताकि भविष्य में धरती को क्षुद्रग्रह और पिंडों की टक्कर से बचाया जा सके।
