मध्य-पूर्व में पाकिस्तान का सैन्य दखल बढ़ता जा रहा है। सऊदी अरब के साथ मक्का समझौते के बाद तुर्की और पाकिस्तान ने अब कतर के साथ एक नई डिफेंस डील की है। इसमें इंडोनेशिया को भी शामिल किया गया। दुनियाभर में इस नए समझौते की चर्चा है। सबसे खास बात यह है कि ईरान युद्ध ने मध्य-पूर्व के देशों को नए-नए गठबंधन बनाने पर मजबूर कर दिया है।
कतर को अमेरिका बेहद करीबी माना जाता है, लेकिन हूती विद्रोहियों के खिलाफ सऊदी अरब को वाशिंगटन से मिले धोखे से दोहा सतर्क है। कतर को आशंका है कि युद्ध जैसी स्थिति में अमेरिका से पूर्ण सहयोग मिलेगा बेहद मुश्किल है। यही कारण है कि दोहा अब इस्लामाबाद और अंकारा के साथ सैन्य सहयोग व गठबंधन बनाने में जुटा है। ताजा समझौता इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
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तुर्की, पाकिस्तान, कतर और इंडोनेशिया के बीच हुए नए समझौते को 'बद्र डिफेंस' डील नाम दिया गया है। हालांकि यह समझौता मक्का पैक्ट की तरह नहीं है। अभी तक इसमें एक-दूसरे की रक्षा की बात नहीं की गई। मगर संयुक्त हथियार प्रोडक्शन पर फोकस जरूर किया गया है। इसका सबसे अधिक लाभ तुर्की को मिलने की उम्मीद है। प्रस्ताव के मुताबिक चारों देश तुर्की में साझा प्रोडक्शन करेंगे। इसकी वजह यह है कि तुर्की के पास उन्नत हथियार बनाने का अनुभव है।
कहां से लिया गया बद्र नाम?
पैगंबर मुहम्मद और उनके अनुयायियों ने वर्ष 624 में हुई बद्र की लड़ाई में अपने विरोधियों को धूल चटाई थी। इसी ऐतिहासिक लड़ाई से चारों देशों ने 'बद्र' नाम लिया। संयुक्त बयान में कहा गया कि 'बद्र' शब्द का अर्थ पूर्णिमा होता है। नाम के अनुरूप चारों देश-एक दूसरे के पूरक होंगे। सऊदी अरब में मदीना के पास बद्र नाम का एक ऐतिहासिक जगह भी है।
कैसे काम करेगा बद्र समझौता?
सबसे पहले सभी देश उन कमियों का अध्ययन करेंगे, जहां उन्नत तकनीक और हथियार की जरूरत है। राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से क्या बेहद जरूर है। मसलन कतर को ईरानी मिसाइल रोकने के लिए एक उन्नत एयर डिफेंस सिस्टम चाहिए। पाकिस्तान को एडवांस्ड ड्रोन तकनीक। तुर्की को साइबर वारफेयर से निपटने का ढांचा। सभी देश अपनी-अपनी जरूरतों को एग्जीक्यूटिव बोर्ड के सामने रखेंगे। इसमें हर देश की तकनीकी टीम शामिल होगी। बोर्ड सभी की जरूरत के हिसाब से एक प्लान बनाएगा।
एग्जीक्यटिव बोर्ड के प्लान को स्ट्रेटेजिक बोर्ड के पास भेजा जाएगा। यह सबसे अहम पड़ाव होगा। यहां से हरी झंडी मिलने के बाद सीधे ज्वाइंट प्रोडक्ट पर काम शुरू हो जाएगा। उत्पादन कहां किया जाएगा और प्रोजेक्ट पर कितनी रकम खर्च होगी? यह फैसला भी स्ट्रेटजिक बोर्ड ही करेगा।
स्ट्रेटजिक बोर्ड में कौन होगा
- मंत्री
- उपमंत्री
- सैन्य अधिकारी
- रक्षा कंपनियों के अधिकारी
कतर को क्यों पड़ी समझौते की जरूरत?
ईरान युद्ध ने मध्य-पूर्व की सबसे नाजुक स्थिति को दुनिया के सामने उजागर कर दिया। सभी खाड़ी देशों की सुरक्षा अमेरिकी कंधों पर टिकी है, लेकिन ईरान के खिलाफ अमेरिका ने अपने सहयोगियों को अकेले छोड़ दिया। उसने अपने एयरबेस, सैनिक, हथियार और इजरायल की सुरक्षा को अधिक तवज्जो दिया।
खड़ी देशों की अनुरोध पर मिसाइल इंटरसेप्टर मिसाइलें नहीं भेजी। नतीजा यह हुआ कि जब में संयुक्त अरब अमीरात के बाद कतर को भारी नुकसान उठाना पड़ा। उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में पड़ गई। अमेरिका अपना बेस खाली करके बाहर निकल गया। मगर ईरान के साथ कतर की कड़वाहट कम नहीं हुई। जमीनी हमले तक की धमकी मिलने लगी।
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पिछले साल इजरायल ने भी राजधानी दोहा पर मिसाइल से हमला किया। उस वक्त भी अमेरिका से कतर को कुछ खास सहयोग नहीं मिला। यही कारण है कि कतर अब तुर्की और पाकिस्तान के सहारे आत्मनिर्भर बनना चाहता है, ताकि अमेरिका पर उसकी निर्भरता कम हो। युद्ध जैसी स्थिति में हथियारों का संकट न झेलना पड़े।
एक वजह यह भी है कि इजरायल लगातार कतर के खिलाफ बोल रहा है। कतर को अगला निशाना बनाने की चर्चा इजरायल में आम है। कतरी सरकार को भी लगता है कि देर-सबेर इजरायल ऐसा कर भी सकता है। समझौते के पीछे यह भी अहम वजह है। खबरों के मुताबिक बद्र समझौते के तहत कतर पैसा लगाएगा। अंकारा अपनी तकनीकी ज्ञान का निवेश करेगा। इस्लामाबाद मानव संसाधन और युद्ध से मिले अनुभव को साझा करेगा।
