अमेरिका ने पिछले दो दशक में दूसरी बार अपनी सेना को इराक से वापस बुला लिया है। करीब 12 वर्ष पहले इस्लामिक स्टेट के खिलाफ लड़ाई में अमेरिका ने अपने सैनिकों को इराक में तैनात किया था। अमेरिकी सैनिकों की वापसी को इराक ने जहां अपनी संप्रभुता का सम्मान बताया तो वहीं पड़ोसी देश ईरान ने खुशी जाहिर की। जबकि इराक के एक बड़े क्षेत्र में बसे कुर्दों को सुरक्षा की चिंता सताने लगी है। आज जानेंगे कि अमेरिका ने कब-कब अपने सैनिकों को इराक में तैनात किया, कब वापस बुलाया, इराक से अमेरिकी सैनिकों के जाने का क्या असर होगा, कुर्द क्यों चिंतित है?

 

अमेरिकी सैनिकों की वापसी पर इराक के प्रधानमंत्री अली अल-जैदी ने 1 अक्टूबर को संभ्रभुता दिवस मनाने की घोषणा की है। इराक में अमेरिका के लगभग 2500 सैनिक तैनात थे। वहीं 2003 से 2011 तक करीब 4500 अमेरिकी सैनिकों की मौत भी हो चुकी है। अमेरिका का कहना है कि भले ही उसकी सैन्य वापसी हो रही है, लेकिन बगदाद को टारगेटेड प्रशिक्षण और खुफिया जानकारी उपलब्ध कराई जाती रहेगी।

कब-कब हुई अमेरिकी सैनिकों की तैनाती?

अमेरिका ने सबसे पहले साल 2003 में अपने सैनिकों की तैनाती इराक में की थी। उस वक्त बुश प्रशासन ने इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन पर 'सामूहिक विनाश' के हथियार बनाने का आरोप लगाया था। 2006 में सद्दाम हुसैन को फांसी की सजा मिलने के पांच साल बाद यानी 2011 में अमेरिकी सैनिक इराक से लौटे। करीब 8 साल तक इराक में अमेरिकी सैन्य तैनाती रही।

 

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साल 2014 में सीरिया और इराक में तेजी से इस्लामिक स्टेट का उभार हुआ। 2014 में अमेरिका ने आईएसआईएस के खिलाफ जंग में अपने सैनिकों को उतारा। यह दूसरी बार था जब इराक में अमेरिकी सैनिकों को तैनात किया गया। अबकी लगभग 12 साल बाद इन सैनिकों की वापसी हो रही है। ईरान के साथ तनाव के बीच जहां अमेरिकी मध्य-पूर्व में अपनी सैन्य तैनाती के विकल्प खोजने में जुटा है। उसी बीच इराक से उसका जाना बड़ा झटका माना जा रहा है।   

आईएस के कमबैक का खतरा

साल 2014 में आईएस सीरिया और इराक में तेजी से फैला। उसने उत्तरी इराक और सीरिया के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया। अमेरिकी समर्थक कुर्द इलाके भी संकट में आ गए। राजधानी बगदाद तक खतरा बढ़ गया। इसके बाद वाशिंगटन को सैन्य हस्तक्षेप करना पड़ा। 2019 तक आईएसआईएस काफी हद तक परास्त हो चुका था। इराक और सीरिया में उसके पैर उखड़ने लगे। मगर अमेरिका की सेना अगले सात साल तक बनी रही, ताकि आईएस दोबारा सिर न उठा सके। अब अमेरिकी सैन्य वापसी से आईएस के कमबैक का खतरा मंडराने लगा है। 

अमेरिकी की वापसी क्या ईरान की बड़ी जीत?

इराक में शिया मुस्लिमों की अच्छी खासी आबादी है। इन पर ईरान का खूब प्रभाव है। सांस्कृतिक और धार्मिक जुड़ाव भी गहरे हैं। इराक में कई शिया मिलिशियाओं को भी ईरान का समर्थन हासिल है। अमेरिकी की गैर-मौजूदगी में ईरान का दखल बढ़ने की आशंका है। शिया मिलिशिया अधिक मजबूत हो सकते हैं। यही कारण है कि अमेरिकी की वापसी का ईरान ने जश्न मनाया। इसे ईरान की बड़ी जीत के तौर पर भी देखा जा रहा है, क्योंकि तेहरान लंबे समय से मध्य-पूर्व में अमेरिकी की सैन्य मौजूदगी नहीं चाहता है। 

 

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अमेरिका खाली कर रहा ईरान का पड़ोस

ईरान की सीमा सीरिया से लगती है। इसी साल वहां से भी अमेरिका ने अपनी सेना वापस बुला ली। 2021 में पड़ोसी देश अफगानिस्तान से भी बोरिया-बिस्तर समेट लिया। अब एक और पड़ोसी देश इराक से अमेरिकी सैनिकों का लौटना तेहरान की बड़ी जीत है। ईरान की तीन दिशाओं से अमेरिका की सैन्य वापसी हो चुकी है। अब अगर उसकी सैन्य मौजूदगी बची है तो फारस के खाड़ी के उस पार सऊदी अरब, कतर, कुवैत, बहरीन, यूएई और जॉर्डन में है।

क्यों चिंता में इराकी कुर्द?

अमेरिकी की वापसी से इराक के कुर्दिस्तान क्षेत्र रहने वाले कुर्द समुदाय की चिंता बढ़ गई है। पिछले कई दशक से अमेरिका विभिन्न संघर्षों में इस समुदाय का इस्तेमाल किया और बदले में सुरक्षा की गारंटी दी, लेकिन 23 साल बाद इराक से अमेरिकी सैन्य वापसी से यह समुदाय खुद को बेसहारा पा रहा है। कुर्दिस्तान की राजधानी एरबिल में अमेरिका का एक सैन्य अड्डा था। यहां अमेरिका ने अपने एयर डिफेंस सिस्टम को तैनात कर रखा था। इसके हटने से कुर्दिश लोगों को हवाई हमले का डर सताने लगा है। उनके पास ड्रोन और मिसाइल से बचने की कोई जतन भी नहीं है।