चुनाव आयोग के भीतर चल रहे विवाद पर IAS अधिकारी अशोक खेमका ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट का जिक्र कर चिंता जताई है और अपील की है कि चुनाव आयोग को पारदर्शी तरीके से काम करना चाहिए। उन्होंने कहा है कि रिपोर्ट में हुए खुलासे ने चुनाव आयोग की विश्वसनीयता को लेकर जनता की चिंताओं को और गहरा कर दिया है।
अशोक खेमका के मुताबिक तीनों चुनाव आयुक्तों को पारदर्शी, सामूहिक और कानून के दायरे में रहकर काम करना चाहिए, क्योंकि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की वैधता के लिए ECI पर जनता का भरोसा बेहद जरूरी है।
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अशोक खेमका, पूर्व IAS अधिकारी:-
'द इंडियन एक्सप्रेस' के खुलासे ने चुनाव आयोग की विश्वसनीयता को लेकर जनता की चिंताएं बढ़ा दी हैं। तीनों आयुक्तों को पारदर्शिता, आपसी सहयोग और कानून के दायरे में रहकर काम करना चाहिए। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की वैधता के लिए ECI में जनता का भरोसा बहुत जरूरी है।
क्यों अहम है यह बयान?
अशोक खेमका का यह बयान ऐसे वक्त में आया है जब चुनाव आयोग ने पर सवाल उठ रहे हैं। ज्ञानेश कुमार पर सवाल उठ रहे हैं कि वह अपने सहयोगी आयुक्तों की बात नहीं नहीं सुनते हैं, उनकी आपत्तियों विचार नहीं करते हैं। वह राज्य आयोग में गैर जरूरी दखल देते हैं। कॉकरोच जनता पार्टी ने दिल्ली में उनके इस्तीफे तक, आंदोलन जारी रखने का एलान किया है।
अशोक खेमका कौन हैं?
अशोक खेमका 1991 बैच के हरियाणा कैडर के IAS अधिकारी हैं। वह 30 अप्रैल 2025 को ट्रांसपोर्ट विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। वह साल 2012 में रॉबर्ट वाड्रा और DLF के बीच हुए जमीन सौदे का म्यूटेशन रद्द करने के फैसले के चलते राष्ट्रीय सुर्खियों में आए थे। उन्हें ईमानदार IAS अधिकारी के तौर पर जाना जाने लगा। अपने 33 साल से ज्यादा लंबे करियर में उन्हें रिकॉर्ड 57 बार तबादले का सामना करना पड़ा। वह भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के खिलाफ सबसे मुखर अधिकारियों में शामिल रहे हैं।
रिपोर्ट में क्या दावे किए गए हैं?
इंडियन एक्सप्रेस की जांच में सामने आया कि तीन सदस्यीय आयोग में से दो चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित रूप से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के फैसलों पर आपत्ति दर्ज की। उन्होंने शिकायत की कि कई फैसले उनकी जानकारी के बिना लिए गए। ज्यादात आपत्तियां स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन ( SIR ) से जुड़ी थीं। इसमें नए मतदाताओं को जोड़ने, नाम हटाने, फॉर्म-6 में बदलाव और मतदाता सूची के सॉफ्टवेयर पर नियंत्रण जैसे मुद्दे शामिल थे।
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SIR पर हुई थी अनबन?
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दावा किया गया था कि सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने फॉर्म-6 में किए गए बदलाव को अनधिकृत और अवैध बताया था। उन्होंने चेतावनी दी थी कि मतदाता डेटाबेस को दिल्ली में केंद्रित करने से राज्य स्तर के अधिकारियों को दरकिनार किया जा रहा है। मतदाता सॉफ्टवेयर की विश्वसनीयता को लेकर दोनों आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव को भी पत्र लिखा था।
बवाल क्यों मचा?
रिपोर्ट सामने के बाद देशभर में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। सामाजिक संगठन, राजनीतिक दल से लेकर आम आदमी तक, चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहे हैं। चुनाव आयोग ने असहमतियों का जिक्र किया है लेकिन इन्हें सुझाव बताया है। चुनाव आयोग इन आरोपों से इनकार कर रहा है। शनिवार को तीनों अधिकारियों ने संयुक्त रूप से अपनी बात रखी है। चुनाव आयोग ने इंडियन एक्सप्रेस की जांच रिपोर्ट पर जवाब देते हुए कहा है कि संस्था के अंदर अलग-अलग राय और सुझाव सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हैं। आयोग के अनुसार पिछले एक साल के सभी फैसले पूर्ण आयोग की सर्वसम्मति से लिए गए।
