भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने बच्चों के लिए पोषण से जुड़े नियमों में संशोधन करने के लिए एक मसौदा तैयार किया है। FSSAI के ड्राफ्ट में यह प्रस्ताव दिया गया है कि 6 महीने तक के शिशुओं के लिए बनने वाले खाद्य उत्पादों में सुक्रोज और फ्रक्टोज नहीं मिलाए जाएंगे। सुक्रोज और फ्रक्टोज शुगर की अलग-अलग किस्में हैं। सुक्रोज घरों में इस्तेमाल होने वाली आम चीनी है, जबकि फ्रक्टोज फलों और शहद में पाई जाने वाली प्राकृतिक मिठास है। 

 

यह मसौदा खाद्य सुरक्षा और मानक (शिशु पोषण के लिए खाद्य) नियम, 2020 में संशोधन के लिए है। पुराने नियम कहते हैं कि एक दिन के बच्चे से लेकर छह महीने के बच्चों के लिए बने आहार में सुक्रोज और फ्रक्टोज मिलाया जा सकता है। शर्त बस इतनी सी है कि दोनों मिलाकर कुल कार्बोहाइड्रेट का 20 प्रतिशत से ज्यादा न हो।

यह भी पढ़ें: चाय पर FSSAI की नजर, कीटनाशकों पर क्या नियम बनाने की है तैयारी?

क्या बदलने की तैयारी है?

इस उम्र के शिशुओं के लिए बनने वाले डिब्बाबंद उत्पादों में ऊपर से सुक्रोज और फ्रक्टोज मिलाने पर पूरी तरह रोक लगाई जाएगी। मौजूदा नियमों में सीमित मात्रा में इन्हें मिलाने की छूट थी लेकिन अब सरकार इसे पूरी तरह बंद करना चाहती है।

 

FSSAI ने यह फैसला छोटे बच्चों को शुरुआत से ही अतिरिक्त चीनी से बचाने के लिए लिया है। चीनी की वजह से उनमें मोटापे और अन्य बीमारियों का खतरा बढ़ सकता था। डॉक्टरों का तर्क है कि जीवन के 6 महीने तक बच्चे को सिर्फ मां का दूध पीना चाहिए।

मसौदा जारी करने का क्या मकसद है?

FSSAI चाहता है कि लोग और हेल्थ एक्सपर्ट अपनी राय रखें। सभी सुझावों पर विचार करने के बाद ही इस नियम को अंतिम रूप दिया जाएगा। अभी के नियमों के तहत जन्म से लेकर 24 महीने तक के बच्चों के डिब्बाबंद आहार में पोषण, गुणवत्ता और सुरक्षा के कड़े नियम लागू हैं। 

 

एनर्जी और कार्बोहाइड्रेट के लिए लैक्टोज और ग्लूकोज पॉलिमर को सबसे बेहतर विकल्प माना गया है, जबकि सुक्रोज और फ्रक्टोज केवल जरूरत पड़ने पर ही एक तय सीमा के अंदर मिलाने की इजाजत है। अब नए मसौदे में FSSAI ने एक खास शर्त जोड़ने की सिफारिश की है, जिसके तहत 6 महीने तक के शिशुओं के उत्पादों में सुक्रोज और फ्रक्टोज के इस्तेमाल पर पूरी तरह पाबंदी होगी।



यह भी पढ़ें: प्रियागोल्ड बिस्किट में चोकर मिला, FSSAI ने दर्ज कराया केस

FSSAI का डर क्या है?

FSSAI का कहना है कि जिंदगी के शुरुआती छह महीने बच्चे की सेहत और संपूर्ण विकास के लिए सबसे नाजुक होते हैं, इसलिए इस उम्र के बच्चों के आहार में बिना अलग से कोई चीनी मिलाए सिर्फ उनकी जरूरी पोषण संबंधी आवश्यकताएं पूरी होनी चाहिए। 

नए ड्राफ्ट का मकसद कम उम्र में ही मीठा खाने की आदत और उससे जुड़े मोटापे जैसे स्वास्थ्य जोखिमों को रोकना है। इसके अलावा, यह पहल शुरुआती छह महीने सिर्फ और सिर्फ मां का दूध पिलाने की सलाह को बढ़ावा देती है और कंपनियों को भी ऐसे सुरक्षित विकल्प बनाने के लिए प्रेरित करती है जो छोटे बच्चों की प्राकृतिक जरूरतों के पूरी तरह अनुकूल हों।

अभी क्या हैं नियम और क्या बदलेगा?

मौजूदा नियमों में जन्म से 24 महीने तक के बच्चों के लिए बनने वाले शिशु पोषण उत्पादों के पोषण, गुणवत्ता और सुरक्षा के मानक तय हैं। इनमें कार्बोहाइड्रेट के लिए लैक्टोज और ग्लूकोज पॉलिमर को पहली पसंद माना गया है। सुक्रोज या फ्रक्टोज तभी डाले जा सकते हैं, जब कार्बोहाइड्रेट के स्रोत के तौर पर इनकी जरूरत हो, और वह भी तय सीमा में। नए मसौदे में इसी में एक शर्त जोड़ने का प्रस्ताव है। प्रस्तावित प्रावधान के मुताबिक 6 महीने तक के शिशुओं के लिए बनने वाले उत्पादों में सुक्रोज और फ्रक्टोज नहीं मिलाए जाएंगे।

FSSAI के अनुसार जीवन के पहले छह महीने बच्चे की सेहत और विकास के लिहाज से अहम होते हैं। प्रस्ताव का मकसद है कि इस उम्र के बच्चों के उत्पाद उनकी पोषण जरूरतें पूरी करें और उनमें अलग से चीनी न डाली जाए। इस कदम का एक मकसद अतिरिक्त चीनी के शुरुआती सेवन से जुड़ी चिंताओं को कम करना भी बताया गया है। इनमें बच्चों में मोटापे जैसे खान-पान से जुड़े जोखिम शामिल हैं।

FSSAI चाहता है कि मां, बच्चे को कम से कम 6 महीने तक अपना दूध पिलाए। शिशुओं को उम्र के हिसाब से सही आहार मिले और दूध या बच्चों के लिए खाद्य पदार्थ बनाने वाली कंपनियां यह ख्याल रखें कि उनके फॉर्मूले में तय नियमों का उल्लंघन न हो। 



यह भी पढ़ें: दिल्ली के सेवन सीज होटल पर FSSAI का ऐक्शन, फंगस-कॉकरोच मिलने पर लाइसेंस सस्पेंड

अतिरिक्त शुगर पर क्या कहते हैं हेल्थ एक्सपर्ट?

सीनियर न्यूट्रिशनिस्ट सुनीत खन्ना की सलाह है कि 2 से 18 साल के बच्चों को रोज 6 चम्मच से कम चीनी देना चाहिए। ज्यादा चीनी से मोटापा, टाइप 2 डायबिटीज और इंसुलिन की समस्या हो सकती है। इससे बच्चे ज्यादा सक्रिय हो जाते हैं, भावनाओं में उतार-चढ़ाव आता है और बाद में दिमाग के विकास में दिक्कत हो सकती है। इसलिए घर में डिब्बाबंद जूस, पैकेट वाले स्नैक्स और प्रोसेस्ड खाना नहीं रखना चाहिए। बच्चों को ताजा और प्राकृतिक खाना ही लाभ दे सकता है। 

 

डॉ. सप्तर्षि भट्टाचार्य अपोलो हॉस्पिटल के एंडोक्रिनोलॉजी विभाग के सीनियर कंसल्टेंट हैं। उनका कहना है कि भारत में 10 से 14 प्रतिशत बच्चे ज्यादा वजन वाले या मोटापे के शिकार हैं। बचपन में जो खाना शुरू करते हैं, उसका असर शरीर पर पड़ता है और मेटाबॉलिज्म में ऐसे बदलाव आते हैं, जो आगे चलकर डायबिटीज, कोलेस्ट्रॉल की समस्या या दिल की बीमारी का खतरा बढ़ा देते हैं।

एडेड शुगर पर हुई स्टडी क्या कहती है?

अमेरिका के नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इन्फॉर्मेशन की एक स्टडी में भी चौंकाने वाली बात सामने आई। अमेरिका के नॉर्थ कैरोलिना में हुए एक नए शोध से पता चला है कि कम आय वाले परिवारों के छोटे बच्चों में तेजी से वजन बढ़ने की एक बड़ी वजह फॉर्मूला दूध में मिली अतिरिक्त चीनी है। वैज्ञानिकों ने 234 मां और बच्चों पर 6, 9 और 12 महीने की उम्र में नजर रखी। इस दौरान सामने आया कि बच्चों को ठोस खाने के मुकाबले फॉर्मूला दूध से कहीं ज्यादा, रोजाना करीब 33 ग्राम चीनी मिल रही थी।

स्टडी के मुताबिक, फॉर्मूला दूध के जरिए बच्चे जितनी ज्यादा चीनी ले रहे थे, उनकी लंबाई के अनुपात में उनका वजन उतना ही असामान्य रूप से बढ़ रहा था। शोधकर्ताओं का मानना है कि इतनी छोटी उम्र में ज्यादा चीनी बच्चों में मोटापे का खतरा बढ़ा सकती है। इसलिए उनका सुझाव है कि फॉर्मूला दूध बनाने वाली कंपनियों को इसमें ऊपर से चीनी मिलाना कम करना चाहिए और पैकेट के लेबल पर यह साफ-साफ लिखना चाहिए कि इसमें कितनी चीनी मौजूद है।

बच्चों की सेहत से खेल रही हैं कंपनियां?

FSSAI ने नेस्ले, एबॉट और जायडस वेलनेस समेत पांच बड़ी कंपनियों को नोटिस भेजा है। यह नोटिस बच्चों के दूध के पाउडर और पोषण पेय कॉम्प्लान के विज्ञापनों में किए गए बड़े-बड़े वादों को लेकर भेजा गया है। कंपनियों ने अपने विज्ञापनों और पैकेटों पर दावा किया था कि इनके इस्तेमाल से बच्चों की लंबाई तेजी से बढ़ती है, दिमाग तेज होता है, पाचन आसान रहता है और बीमारियां दूर रहती हैं। FSSAI ने कंपनियों से पूछा है कि उनके पास इन बातों को सच साबित करने के लिए क्या कोई ठोस वैज्ञानिक सबूत है।

 

नेस्ले से उसके उत्पाद लैक्टोजन और नैन एक्सेला को लेकर जवाब मांगा गया है। कंपनी ने यह दावा किया था कि उसका प्रोटीन आसानी से पच जाता है और यह बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। इसी तरह बच्चों के ड्रिंक कॉम्प्लान बनाने वाली कंपनी जायडस वेलनेस से पूछा गया है कि वह किस आधार पर दोगुनी फास्टर ग्रोथ, बेहतर याददाश्त और 34 जरूरी पोषक तत्वों जैसे दावे कर रही है।

 

सोशल मीडिया पर इन्फ्लुएंसर्स के जरिए बच्चों के दूध पाउडर का प्रचार करवाने को लेकर भी कंपनियों पर नियमों के उल्लंघन का आरोप लगा है। कानूनन ऐसे उत्पादों के खुले प्रचार पर कड़े नियम लागू होते हैं। FSSAI किसी भी कंपनी को दोषी नहीं ठहराया है, बल्कि सिर्फ अपना पक्ष रखने और दावों के सबूत पेश करने के लिए समय दिया है। अगर कंपनियां अपने दावों के पीछे कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं दे पाती हैं, तभी उनके खिलाफ आगे की कार्रवाई की जाएगी।

यह भी पढ़ें: ज्यादा नमक, चीनी और फैट वाले खाने पर दिखेगा रेड अलर्ट, FSSAI क्या बदलेगा?

यह मुसीबत सिर्फ हमारे देश में है?

भारत में बिकने वाले कई बहुराष्ट्रीय ब्रांड के उत्पादों में यूरोपीय बाजारों की तुलना में ज्यादा चीनी पाई गई है। भारत में बिकने वाली स्प्राइट में प्रति 100 मिली 11.7 ग्राम चीनी है, जबकि यूरोप में यह 4.4 ग्राम है। नेस्ले के सेरेलक में भारत में प्रति सर्विंग लगभग 3 ग्राम अतिरिक्त चीनी है, जबकि कुछ यूरोपीय बाजारों में इसमें एडेड शुगर नहीं है।

 

भारत में एंड एम में टाइटेनियम डाइऑक्साइड (E171) है, जिसे यूरोपीय संघ ने 2022 में प्रतिबंधित कर दिया था। घरेलू ब्रांडों के उत्पादों में भी चीनी, नमक और फैट ज्यादा पाया गया है। हल्दीराम नट क्रैकर में नमक FSSAI की सीमा से 7.9 गुना और 160 मिली की लाहौरी जीरा की बोतल में 18.9 ग्राम चीनी है।

भारतीयों को इन उत्पादों से मिल क्या रहा है?

इकनॉमिक सर्वे 2025-26 के मुताबिक भारत में मोटापा तेजी से बढ़ रहा है और अब यह एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बन गया है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) 2019-21 के आंकड़े बताते हैं कि 24 फीसदी महिलाएं और 23 फीसदी पुरुष अधिक वजन या मोटे हैं। पांच साल से कम उम्र के बच्चों में अतिरिक्त वजन की समस्या 2015-16 के 2.1 फीसदी से बढ़कर 2019-21 में 3.4 फीसदी हो गई है। 

 

सर्वे का कहना है कि गलत खान-पान, कम शारीरिक गतिविधि और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का बढ़ता सेवन इस समस्या को और गंभीर बना रहा है। डायबिटीज, दिल की बीमारी और हाई ब्लड प्रेशर जैसे खतरे बढ़ रहे हैं। सर्वे में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड को चिंता का विषय बताया गया है। भारत में इनकी बिक्री 2009 से 2023 के बीच 150 फीसदी से ज्यादा बढ़ी है, जिससे पारंपरिक खान-पान धीरे-धीरे पीछे छूट रहा है।

यह भी पढ़ें: FSSAI ने डाबर के प्रोडक्ट्स की बिक्री पर लगाई रोक, शहद-घी के दावे निकले झूठ

कोर्ट तक पहुंच गई है बात, FSSAI इस वजह से सख्ती बरत रहा?

सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर में हुई सुनवाई में FSSAI से पूछा कि पैकेज्ड फूड पर शुगर, नमक और सैचुरेटेड फैट की चेतावनी वाले फ्रंट-ऑफ-पैक लेबल लगाने में अब तक चार साल क्यों लग गए और अब भी लगभग दो साल का समय क्यों मांगा जा रहा है। कोर्ट ने कहा कि 2022 से शुरू हुई प्रक्रिया में क्या काम हुआ और स्वास्थ्य के मुद्दे पर इतना समय क्यों बर्बाद किया जा रहा है। 

 

FSSAI ने बताया कि पहले स्टार-रेटिंग वाली योजना थी, अब वार्निंग लेबल वाली नई व्यवस्था है, जिसके लिए चार महीने में नियम बनाने और अगले साल जुलाई तक अधिसूचित करने के बाद कंपनियों को एक साल का स्वैच्छिक समय दिया जाएगा। कोर्ट ने इसे जल्द लागू करने और सार्वजनिक स्वास्थ्य के हित में कदम उठाने को कहा है।