दिल्ली में NEET पेपर लीक के बाद से ही केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, सबके निशाने पर हैं। दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शनकारियों ने उनके इस्तीफे की मांग को लेकर 'चलो संसद' मार्च निकाला, जिसके बाद दिल्ली पुलिस ने बल प्रयोग किया। कई प्रदर्शनकारियों को गंभीर चोटें आईं हैं, कई प्रदर्शनकारियों का राम मनोहर लोहिया और पास के अस्पतालों में इलाज चल रहा है।
छात्रों को पीटने वाले लोगों में सिर्फ पुलिस ही नहीं थी, पुलिस के साथ सिविल ड्रेस में कुछ और लोग थे, जिनके हाथों में लाठियां थी, जिन्होंने प्रदर्शनकारियों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा। मीडिया ने उन लोगों से सवाल किया तो वे चुप रहे या मीडिया को ही दौड़ाने लगे। एक या दो नहीं, कई ऐसे वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं, जिनमें नजर आ रहे लोग लाठी-डंडों से लोगों को पीट रहे हैं, दौड़ाकर बर्बरता से मार रहे हैं।
अब दो सवाल उठ रहे हैं। पहला यह कि क्या पुलिस, प्रदर्शन रोकने के लिए प्राइवेट लोगों को अपने साथ रख सकती है और दूसरा यह कि क्या पुलिस ही सिविल ड्रेस में इस तरह की कार्रवाई शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन कर रहे लोगों पर कर सकती है। सोमवार को जंतर मंतर, संसद मार्ग और राजीव चौक पर हुई पुलिस कार्रवाई और सादे ड्रेस में बिना यूनिफॉर्म के दिख रहे लोगों की बर्बरता पर कई सवाल उठे।
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क्या वर्दी में पुलिस ऐसी कार्रवाई कर सकती है?
नाम न बताने की शर्त पर एक पुलिस अधिकारी ने पुलिस मैन्युअल के हवाले से कहा, 'दंगा और हिंसा की स्थिति में सादे कपड़ों में पुलिस की तैनाती सिर्फ इस मकसद से होती है कि भीड़ में जाए, उनकी खुफिया जानकारियां जुटाएं, अनहोनी की स्थिति में थाने या संबंधित अधिकारी को सूचना दें। सिविल वर्दी में हाथ उठाना गैरकानूनी है, पुलिस मैन्युअल और पुलिस ऐक्ट में ऐसा कहीं नहीं लिखा है कि सिविल ड्रेस में किसी भी स्थिति में पुलिस हथियार उठा सकती है या किसी को पीट सकती है।'
वकील इस मामले पर क्या कहते हैं?
एडवोकेट अनुराग ने पुलिस की इस कार्रवाई पर कहा, 'किसी भी स्थिति में पुलिस, सिविल ड्रेस में न तो किसी को पीट सकती है, न ही लाठी चार्ज करने वाली टुकड़ी का हिस्सा हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट डीके बसु बनाम पश्चिम बंगाल केस में भी कहा है पुलिसकर्मियों को अपने पदनाम के साथ साफ दिखाई देने वाले और साफ पहचान पत्र पहनना अनिवार्य है।'
कई दूसरी अदालों ने भी कहा है कि अगर पुलिस बल प्रयोग कर रही हो तो बैज नंबर, नाम अनिवार्य हो, जिससे अगर किसी व्यक्ति की जान जाए, गंभीर चोट पहुंचे तो जवाबदेही तय की जा सके। बिना पहचान के, सादे कपड़ों में की गई हिंसक कार्रवाई की न्यायिक जांच में और भी सख्ती से जांच होती है।
जून 2025 में 'हेड कांस्टेबल राज कुमार, अन्य बनाम पंजाब केस' में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, 'ड्यूटी की आड़ में सादे कपड़ों में की गई अवैध हिंसा को अधिकारी कानूनी सुरक्षा की तरह इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं।'
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पुलिस क्यों लाठीचार्ज करती है, कानूनी अधिकार क्या हैं?
एडवोकेट अनुराग ने कहा, 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 148 पुलिस को बल प्रयोग का अधिकार देती है। अगर भीड़ इकट्ठी हो जाए, 5 या उससे ज्यादा की संख्या में अशांति फैलाने की कोशिश करे, कर्फ्यू तोड़े या निषेधाज्ञा का उल्लंघन करे, तब पुलिस बल प्रयोग कर सकती है।'
एडवोकेट अनुराग ने कहा, 'कार्यकारी मजिस्ट्रेट या थाने का प्रभारी अधिकारी या उसकी गैर मौजूदगी में सब-इंस्पेक्टर या उससे ऊपर का कोई पुलिस अधिकारी, उस भीड़ को तितर-बितर करने का आदेश दे सकता है।'
कहां पुलिस को छूट मिल जाती है?
एडवोकेट अनुराग ने बताया कि BNSS की 148 का उपबंध 2 कहता है, 'अगर कोई भीड़ या सभा, पुलिस या मजिस्ट्रेट की ओर से हटने का आदेश जारी होने के बाद भी नहीं बिखरती है या यह मंशा दिखाती है कि नहीं बिखरेगी तो कोई भी एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट या पुलिस अधिकारी उस भीड़ को ताकत के इस्तेमाल से बिखेर सकता है। इसके लिए वह किसी भी साधारण व्यक्ति, जो सेना का अधिकारी या जवान न हो तो भी उसकी मदद ले सकता है। जरूरत पड़ने पर वह भीड़ के लोगों को गिरफ्तार करके हिरासत में भी ले सकता है। शर्त बस यही है कि इस बल का इस्तेमाल सिर्फ भीड़ को तितर-बितर करने के लिए ही हो।'
क्यों पुलिस भीड़ पर हिंसा के बाद भी सजा से बच जाती है?
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता विशाल अरुण मिश्रा ने बताया, 'पुलिस अपने अधिकारियों का आदेश मानने के लिए बाध्य है। अगर आदेश सीनियर अधिकारियों की ओर से जारी किए जा रहे हैं तो उसे मानना ही होगा। भारतीय पुलिस अधिनियम, 1861 की धारा 23 के तहत पुलिस अधिकारी सक्षम प्राधिकारी के जारी किए गए वैध आदेशों और वारंटों का पालन करने के लिए बाध्य होते हैं।'
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कब पुलिसकर्मियों पर हो सकती है कार्रवाई?
एडवोकेट विशाल अरुण मिश्र ने बताया, 'अगर पुलिस ने सद्भावनापूर्ण तरीके के काम करने के दौरान कोई क्षति पहुंचाई है तो उस पर केस नहीं हो सकता। तब यह मान लिया जाता है कि भीड़ नियंत्रण, कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए बल प्रयोग जरूरी था। कोर्ट या सरकार की इजाजत से ही उस अधिकारी के खिलाफ केस दर्ज किया जा सकता है।'
क्या पुलिसकर्मियों को भी ऐसी कार्रवाइयों के घेरा जा सकता है?
एडवोकेट विशाल अरुण मिश्रा ने बताया, 'राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में पुलिस की कार्रवाई के खिलाफ शिकायत कर सकते हैं। आयोग कई बार खुद जांच कराता है। पीड़ित पक्ष के पास संविधान के अनुच्छेद 32 और 226 के तहत सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट जाने का अधिकार होता है। बड़ी घटनाओं पर सरकारें और अदालतें न्यायिक आयोग बिठा सकती हैं। पुलिसकर्मियों के खिलाफ पुलिस अधीक्षक और DGP या राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण को लिखित अर्जी दी जा सकती है।'
