केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी 'PM-DAKSH' योजना को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। कांग्रेस पार्टी ने आरोप लगाया है कि सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को रोजगार देने के मकसद से शुरू की गई यह योजना जमीनी स्तर पर सही तरीके से लागू नहीं हो पा रही है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए दावा किया कि योजना के क्रियान्वयन में सुस्ती दुख रही। साथ ही तय बजट का पूरा फायदा जरूरतमंदों तक नहीं पहुंचा।
दूसरी ओर, इस योजना के सरकारी आंकड़े एक अलग तस्वीर पेश करते हैं। आंकड़ों के मुताबिक, इस योजना से अब तक पौने दो लाख से ज्यादा लोगों को ट्रेनिंग दी जा चुकी है और हजारों लाभार्थी रोजगार या स्वरोजगार से जुड़ चुके हैं। ऐसे में मुख्य सवाल यह उठता है कि क्या प्रशिक्षण पाने वाले युवाओं को सिर्फ सर्टिफिकेट मिल रहे हैं? या उन्हें स्थायी कमाई का जरिया भी मिल पा रहा है?
यह भी पढ़ें: क्या हवाई जहाज की तरह कार में भी होगा ब्लैक बॉक्स? सेफ्टी के नियम बदलेंगे
क्या है PM-DAKSH योजना?
'प्रधानमंत्री दक्षता और कुशलता संपन्न हितग्राही योजना' (PM-DAKSH) की शुरुआत वित्त वर्ष 2020-21 में हुई थी। यह सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा चलाई जाने वाली एक विशेष योजना है। इसका मुख्य उद्देश्य पिछड़े और वंचित वर्गों के युवाओं को निशुल्क हुनर सिखाना। ताकि वे आसानी से नौकरी पा सकें या खुद का काम शुरू कर सकें।
इसमें मुख्य रूप से अनुसूचित जाति (SC), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS), विमुक्त जनजातियां (DNT), सफाई कर्मचारी और कचरा बीनने वाले लोग शामिल हैं। आमतौर पर 18 से 45 साल की आयु के लोग इसका हिस्सा बन सकते हैं। OBC और EWS श्रेणी के आवेदकों के लिए पारिवारिक आय से जुड़े कुछ नियम तय किए गए हैं।
योजना के तहत अलग-अलग तरह के व्यावहारिक और तकनीकी काम सिखाए जाते हैं। जैसे सिलाई, ब्यूटी वर्क, फर्नीचर निर्माण और खाद्य प्रसंस्करण जैसे सीधे कमाई से जुड़े काम। साथ ही जो लोग पहले से कोई काम कर रहे हैं, उन्हें नई तकनीक और सुरक्षित तरीके सिखाया जाना। इसके अलावा जो अपना खुद का काम शुरू करने या पुराने काम को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी गाइडेंस देना।
कांग्रेस का क्या आरोप?
कांग्रेस ने सरकार पर आरोप लगाया है कि इस योजना पर पिछले साल एक भी रुपया खर्च नहीं किया गया है। कांग्रेस का कहना है कि जब सरकार बजट तय करती है। तब भी जरूरतमंद युवाओं को समय पर ट्रेनिंग और काम क्यों नहीं मिल पाता। जयराम रमेश का आरोप है कि एक अवधि के दौरान योजना का काम लगभग ठप रहा और आवंटित रकम का सही इस्तेमाल नहीं हुआ। उनका तर्क है कि अगर सरकार की योजनाएं कागजों से निकलकर जमीन पर नहीं उतरेंगी तो इसका सबसे बड़ा नुकसान देश के बेरोजगार युवाओं को उठाना पड़ता है।
क्या कहते हैं सरकारी आंकड़े?
11 मार्च 2026 तक के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, अब तक 1,87,305 लाभार्थियों को सफलतापूर्वक कौशल प्रशिक्षण दिया जा चुका है। इनमें से 73,102 लोग या तो नौकरी पा चुके हैं या अपना खुद का स्वरोजगार शुरू कर चुके हैं। सरकार का कहना है कि बीते तीन सालों के दौरान ट्रेनिंग प्रोग्राम आयोजित करने के लिए 'NSFDC' ने 72.29 करोड़ रुपये और 'NBCFDC' ने 64.01 करोड़ रुपये जारी किए गए। सरकार का कहना है कि यह प्रशिक्षण 'नेशनल स्किल्स क्वालिफिकेशंस फ्रेमवर्क' (NSQF) के मानकों के हिसाब से दिया जाता है। ट्रेनिंग पूरी होने के बाद युवाओं को नौकरी दिलाने में मदद की जाती है। साथ ही खुद का काम शुरू करने वालों को गाइडेंस दी जाती है।
यह भी पढ़ें: 'यह कहानी है प्यार की...', इंस्टा पर सोनिया गांधी का डेब्यू, किताब पर क्या लिखा?
किसी भी योजना का असली आकलन सिर्फ इस बात से नहीं हो सकता कि उसकी घोषणा कब हुई या कागजों पर कितना बजट रखा गया। वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि कितने लोगों को सही में रोजगार और नियमित आय का साधन मिला या नहीं। अगर प्रशासनिक ढिलाई के कारण योजना की रफ्तार धीमी होती है तो यह जनता के पैसों और युवाओं के समय दोनों का नुकसान है।
