दिल्ली के लोगों को फिलहाल जहरीली हवा और धुंध से राहत मिलती नहीं दिख रही है। दिवाली से कुछ ही दिन पहले शहर की हवा लगातार चौथे दिन 'बहुत खराब' श्रेणी में बनी रही। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार, 5 नवंबर को दिल्ली का 24 घंटे का औसतन एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 369 दर्ज किया गया। हालांकि यह 4 नवंबर के 377 से मामूली कम था लेकिन हफ्ते की शुरुआत के मुकाबले हवा ज्यादा खराब हुई है।
प्रदूषण के बिगड़ते हालातों को देखते हुए एयर क्वालिटी अर्ली वॉर्निंग सिस्टम (AQEWS) ने चेतावनी दी है कि शुक्रवार से रविवार के बीच दिल्ली की हवा 'गंभीर' (Severe) श्रेणी में पहुंच सकती है। गुरुवार रात 10 बजे तक दिल्ली के 59 एक्टिव मॉनिटरिंग स्टेशनों में से 22 स्टेशनों पर हवा का स्तर 'गंभीर' दर्ज किया गया। इसमें पंजाबी बाग में सबसे ज्यादा 459 AQI दर्ज हुआ, जिसके बाद जहांगीरपुरी (457), रोहिणी (453), आईआईटी दिल्ली (452) और डीटीयू (443) का नंबर रहा। इस जहरीली हवा में सबसे मुख्य प्रदूषक तत्व PM2.5 पाया गया है।
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जानिए CPCB का AQI का पैमाना
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के तय मानकों के अनुसार हवा की गुणवत्ता को कुछ इस तरह मापा जाता है। AQI अगर 0 से 50 के अंदर मापा जाए तो 'अच्छा' है। 51 से 100 के बीच 'संतोषजनक'। 101 से 20 के बीच 'मध्यम'। 201 से 300 के बीच 'खराब'। 301 से 400 से 'बहुत खराब'। 401 से 500 में 'गंभीर'।
प्रदूषण की दो मुख्य वजहें
दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण में वाहनों के धुएं और पड़ोसी राज्यों में जलने वाली पराली का बड़ा हाथ माना जा रहा है। 'डिसीजन सपोर्ट सिस्टम' (DSS) के मुताबिक, 5 नवंबर को दिल्ली के PM2.5 प्रदूषण में गाड़ियों के धुएं का हिस्सा 17.9% था जो शुक्रवार को 18.3% हो गया। 7 नवंबर यानी शनिवार को 21.1% तक होने का अनुमान है। पराली के धुएं का योगदान गुरुवार को 15.6% दर्ज किया गया। इसके शुक्रवार को बढ़कर 19.2% होने का अनुमान है। फिर शनिवार को घटकर 1.6% पर आने की संभावना जताई गई है।
नासा के आंकड़े क्या बता रहे हैं?
नासा (NASA) के आंकड़ों के अनुसार 1 अक्टूबर से 4 नवंबर के बीच पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की 2,251 घटनाएं दर्ज की गईं। खासकर पंजाब में 2,025 और हरियाणा में 226 मामले सामने आए हैं। पिछले साल इसी अवधि के दौरान यह आंकड़ा 2,579 था।
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हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि नासा के सैटेलाइट दोपहर करीब 1:30 बजे के आसपास तस्वीरें लेते हैं जबकि किसान अक्सर दोपहर के बाद या देर शाम पराली जलाते हैं। इस वजह से सैटेलाइट का यह आंकड़ा पराली जलाने की असली और कुल संख्या से काफी कम हो सकता है।
