भारत ने समुद्री परिवहन क्षेत्र को कार्बन उत्सर्जन से मुक्त करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। गुजरात के कांडला में देश के पहले पोर्ट-बेस्ड ई-मेथनॉल (e-Methanol) उत्पादन प्लांट की नींव रखी गई है। इस प्रोजेक्ट को दीनदयाल पोर्ट अथॉरिटी (DPA) और असम पेट्रो-केमिकल्स लिमिटेड (APCL) मिलकर बनाएंगे। दोनों कंपनियों की इसमें 76:24 की हिस्सेदारी होगी। इस प्रोजेक्ट पर करीब 2,300 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। प्लांट की कुल क्षमता रोजाना 150 टन ई-मेथनॉल बनाने की होगी। इसे दो चरणों में तैयार किया जाएगा।
इस परियोजना की आधारशिला 26 सितंबर को रखी गई। पहले चरण में प्लांट को 1,200 करोड़ रुपये की लागत से तैयार किया जाएगा। इसमें हर दिन 50 टन उत्पादन की क्षमता होगी और इसे जनवरी 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। दूसरे चरण में 1,100 करोड़ रुपये का निवेश कर रोजाना 100 टन की अतिरिक्त उत्पादन क्षमता बढ़ाई जाएगी। इस चरण को मार्च 2027 तक पूरा करने की योजना है।
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जहाजों में मेथनॉल का क्या काम है?
अंतरराष्ट्रीय कारोबार में इस्तेमाल होने वाले बड़े मालवाहक और कंटेनर जहाज लंबे समय से भारी ईंधन तेल और मरीन डीजल पर चलते रहे हैं। समुद्र में प्रदूषण कम करने के लिए नियम सख्त होने के साथ अब कई शिपिंग कंपनियां मेथनॉल को इन ईंधनों के विकल्प के तौर पर अपना रही हैं। मेथनॉल सामान्य तापमान पर तरल रहता है, इसलिए इसे LNG की तरह बहुत ज्यादा ठंडे तापमान में रखने की जरूरत नहीं होती।
मेथनॉल से चलने वाले डुअल-फ्यूल इंजन जरूरत के हिसाब से मेथनॉल या पारंपरिक ईंधन दोनों में से किसी का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके इस्तेमाल से सल्फर ऑक्साइड का उत्सर्जन लगभग खत्म हो जाता है। इससे जहाजों से होने वाले प्रदूषण को कम करने और कार्बन फुटप्रिंट घटाने में मदद मिल सकती है।
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जहाजों के लिए क्यों खास है ई-मेथनॉल?
आम तौर पर इस्तेमाल होने वाला मेथनॉल (एक तरह का ईंधन) जमीन से निकलने वाले कोयले या प्राकृतिक गैस से बनाया जाता है, जिससे प्रदूषण फैलता है। इसके उलट, ई-मेथनॉल बिल्कुल साफ-सुथरे तरीके से तैयार होने वाला ईंधन है। इसे बनाने के लिए सूरज की धूप या हवा (विंड एनर्जी) से बनने वाली बिजली का इस्तेमाल होता है। साथ ही, फैक्ट्रियों या हवा में मौजूद नुकसानदेह कार्बन डाइऑक्साइड गैस को सोखकर इसमें मिलाया जाता है। इसी वजह से इसे पर्यावरण के लिए बहुत सुरक्षित ईंधन माना जाता है।
समुद्री जहाजों में जब इस ईंधन का इस्तेमाल होगा, तो उनसे निकलने वाला जहरीला धुआं और गैसें काफी कम हो जाएंगी। अच्छी बात यह है कि यह साफ ईंधन गुजरात के कांडला बंदरगाह (Port) पर ही मिलने लगेगा। इससे एशिया और यूरोप के बीच चलने वाले बड़े जहाजों को अपने रास्ते में ही बिना भटके यह हरा-भरा ईंधन आसानी से मिल सकेगा।
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आपको बता दें कि डेनमार्क और चीन जैसे देशों में ई-मेथनॉल का इस्तेमाल समुद्री जहाजों में ईंधन के तौर पर शुरू हो चुका है। वहीं, स्पेन, नॉर्वे, फिनलैंड, फ्रांस और पुर्तगाल समेत कई देशों में समुद्री जहाजों के लिए ई-मेथनॉल तैयार करने की परियोजनाओं पर काम चल रहा है।
वैश्विक बाजार से लगभग आधी कीमत पर बनेगा ईंधन
इस कांडला परियोजना की सबसे बड़ी खासियत इसकी कम लागत है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ग्रीन मेथनॉल की कीमत करीब 1,300 अमेरिकी डॉलर प्रति टन है, जबकि कांडला प्लांट में इसे करीब 750 डॉलर प्रति टन की लागत पर बनाने का अनुमान है। यानी भारत वैश्विक औसत से काफी कम कीमत पर स्वच्छ ईंधन तैयार कर सकेगा। इससे भारत को 2070 तक नेट-जीरो का लक्ष्य हासिल करने में मदद मिलेगी और सिंगापुर-रॉटरडैम रूट पर वह दुनिया के बड़े ग्रीन-फ्यूल हब में शामिल हो सकता है।
