वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन ( SIR ) को लेकर शुरुआत से ही सवाल उठते रहे हैं। इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में सुनवाई हुई लेकिन इस पर रोक नहीं लगाई गई। करोड़ों लोगों के नाम कटे और विपक्षी पार्टियों ने चुनाव प्रभावित किए जाने के आरोप भी लगाए। अब सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने एक यूनिवर्सिटी के कार्यक्रम में कहा है कि इंसान के मर जाने के अलावा किसी भी अन्य स्थिति में बिना सुनवाई किए वोटर लिस्ट से उसका नाम नहीं काटा जा सकता है।

 

रविवार को उन्होंने इसे मनमाना काम बताया है और नियमों के खिलाफ कहा है। अब उनके इस बयान को लेकर अलग तरह से चर्चा शुरू हो गई है। उनका यह बयान ऐसे वक्त में आया है जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ देश की राजधानी दिल्ली समेत कई जगहों पर प्रदर्शन शुरू हो गए हैं।

 

रविवार को हैदराबाद की NALSAR यूनिवर्सिटी में पहुंचे जस्टिस उज्जल भुइयां ने लोगों के वोटिंग अधिकार को लेकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि विदेशी शासन के खिलाफ लंबी लड़ाई के बाद हमने वोटिंग का अधिकार हासिल किया है और इसे कोई भी संस्था छीन नहीं सकती या कोई भी अदालत इसके छीने जाने का समर्थन नहीं कर सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि संविधान से ऊपर कोई भी नहीं है।

 

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क्या बोले जस्टिस उज्जल भुइयां?

NALSAR यूनिवर्सिटी के एक कार्यक्रम में पहुंचे जस्टिस उज्जल भुइयां ने कहा, 'एक नागरिक का वोटर होना और वोट डालना बेहद अहम है। यही स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की नींव है। रिप्रेजेंटनशन ऑफ पीपल्स ऐक्ट, 1950 की धारा 22 किसी वोटर का नाम वोटर लिस्ट से हटाने की अनुमति देती है लेकिन यह तभी हो सकता है जब उस वोटर को सुनवाई का मौका दिया जाएगा। लाल बाबू हुसैन बनाम इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर के केस में सुप्रीम कोर्ट ने गाइडलाइन जारी की है कि जिसके मुताबिक, संबंधित वोटर को नोटिस जारी करके उसकी सुनवाई की जानी चाहिए।'

उन्होंने आगे कहा है, 'अगर किसी शख्स का नाम एक बार वोटर लिस्ट में शामिल हो गया है तो बिना उसके मर गए उसका नाम बिना नोटिस और सुनवाई के वोटर लिस्ट से बाहर नहीं किया जा सकता है। UK सुप्रीम कोर्ट एक केस में  2013 में एक फैसला सुनाया कि वोट देने का अधिकार प्रिवेलज नहीं है। भारत में भी स्थिति अलग नहीं है। भारत में भी किसी के वोट देने का अधिकार छीना नहीं जा सकता है। यह ऐसा होगा जैसे शरीर से आत्मा निकाल ली गई हो।'

 

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'संविधान का उल्लंघन है'

लोगों का नाम वोटर लिस्ट से हटाने को गलत बताते हुए जस्टिस उज्जल भुइयां ने कहा, 'भारतीय संविधान नागरिकों का दो वर्ग बनाने की अनुमति नहीं देता है। एक वर्ग वोटिंग अधिकार वाला और दूसरा वर्ग बिना वोटिंग अधिकार वाला नहीं हो सकता है। कोई भी प्रक्रिया जो नागरिकों को बिना वोटिंग अधिकार वाला बनाती है, वह मेरी राय में संविधान के अनुच्छेद 14 और 326 का उल्लंघन होगी। अगर कोई प्रक्रिया ऐसा करती है और अपने ही देश में लोगों को सेकेंड क्लास नागरिक बनाती है तो वह पूरी तरह से मनमानी है और किसी भी तरह से इसे सही नहीं ठहराया जा सकता है।'  

 

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बता दें कि चुनाव आयोग के कमिश्नरों में SIR को लेकर असहमति की इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के बाद से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार निशाने पर हैं। तमाम विपक्षी दलों के नेता और सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ता उनका इस्तीफा मांग रहे हैं। वहीं, चुनाव आयोग ने इस पर स्पष्टीकरण जारी करके कहा था कि असहमति तो प्रक्रिया का हिस्सा है लेकिन फैसले आपसी सहमति के बाद ही लिए गए हैं।