सरकार अब देश के हर पायलट का साल में कम से कम एक बार अचानक डोप टेस्ट कराने पर विचार कर रही है। केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू ने मंगलवार को कहा कि एविएशन सेक्टर में नशीले और साइकोएक्टिव पदार्थों के इस्तेमाल से जुड़े मौजूदा नियमों की समीक्षा की जा रही है। नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) इस संबंध में एविएशन सेक्टर क्षेत्र से जुड़े अलग-अलग लोगों और संगठनों से भी बातचीत कर रहा है।

 

मौजूदा नियमों के तहत हर साल कुल पायलटों में से कम से कम 10 फीसदी का रैंडम डोप टेस्ट किया जाता है। अब सरकार इस व्यवस्था को बदलकर हर पायलट को साल में कम से कम एक बार जांच के दायरे में लाने पर विचार कर रही है। खास बात यह होगी कि टेस्ट कब होगा इसकी जानकारी पहले से नहीं दी जाएगी।

 

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एयर इंडिया की घटना के बाद बढ़ी सख्ती

पायलटों की डोप टेस्टिंग का मुद्दा 4 अगस्त की एयर इंडिया की फुकेट-दिल्ली फ्लाइट की घटना के बाद फिर चर्चा में आया। उड़ान के दौरान टर्बुलेंस के बीच फ्लाइट अचानक करीब 300 फीट नीचे आ गई थी। यह एयरबस A320neo विमान था। घटना के बाद पायलट-इन-कमांड का कन्फर्मेटरी ड्रग टेस्ट कराया गया, जिसमें गांजे की पुष्टि हुई थी। इस मामले की जांच विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो (AAIB) कर रहा है। मंत्री के मुताबिक, विमान और उसका डेटा रिकॉर्ड सुरक्षित हैं और जांच एजेंसी के कब्जे में हैं। शुरुआती रिपोर्ट जल्द आने की उम्मीद है।

 

घटना के बाद एयर इंडिया और एयर इंडिया एक्सप्रेस ने अपने पायलटों का साइकोएक्टिव सब्सटेंस यानी नशीले पदार्थों का टेस्ट शुरू किया। इस अभियान के तहत दोनों एयरलाइंस के करीब 5,000 पायलटों की जांच की गई। शुरुआती जांच में एयर इंडिया ग्रुप के दो पायलटों की रिपोर्ट नॉन-नेगेटिव आई है। अब इन दोनों के सैंपल को फाइनल पुष्टि के लिए कन्फर्मेटरी टेस्ट के लिए भेजा गया है।

 

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FIP ने 20-25% टेस्ट की मांग की

भारतीय पायलट संघ (FIP) ने भी डोप टेस्टिंग का दायरा बढ़ाने की मांग की है। संगठन ने सालाना रैंडम टेस्ट को मैजूदा 10 फीसदी से बढ़ाकर 20-25 फीसदी करने का सुझाव दिया है। FIP का कहना है कि एक ही पायलट का दोबारा रैंडम टेस्ट भी हो सके और पूरे साल अलग-अलग समय पर अचानक जांच की जाए। संगठन ने यूरिन टेस्ट के साथ ओरल-फ्लूइड टेस्ट यानी लार के नमूने से होने वाली जांच शुरू करने का भी सुझाव दिया है। इस टेस्ट की मदद से एयरपोर्ट और दूसरी ऑपरेशनल जगहों पर जल्दी जांच की जा सकती है। इससे फ्लाइट ऑपरेशन में होने वाली देरी या रुकावट को भी कम किया जा सकेगा।