अमेरिकी फाइटर जेट एफ-35 का जो जलवा आज है, यही जलवा 1960 के दशक में मिग 21 लड़ाडू विमान का था। यह विमान चार महाद्वीपों के 60 से अधिक देशों की वायुसेना का हिस्सा रहा। वितयनाम युद्ध में अपना शौर्य दिखाया। मध्य पूर्व में इसकी मौजूदगी ने इजरायल में खौफ की लहर पैदा की। 1971 में पाकिस्तान को तोड़कर बांग्लादेश बनाने में अहम भूमिका निभाई।
मिग-21 के मुकाबले दुनिया का कोई ऐसा सुपरसोनिक विमान नहीं है, जिसका उत्पादन इतने बड़े पैमाने पर किया गया हो। सबसे अधिक वायुसेना में सेवा देने का रिकॉर्ड भी मिग-21 के नाम है। 60 साल से अधिक समय तक सेवा देने वाला इकलौता विमान है। इस विमान की इतनी दहशत थी कि इजरायल ने इसे चोरी करने का प्लान बनाया। इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद इराक से एक मिग-21 विमान को चुराने में सफल रही। बाद में अमेरिका ने मिग-21 विमानों को हासिल किया और वर्षों तक अध्ययन किया।
पिछले साल 26 सितंबर को चंडीगढ़ एयरफोर्स स्टेशन से मिग- 21 विमान को भारतीय वायुसेना से आखिरी विदाई मिली। छह दशकों तक इस विमान ने भारत के हर संघर्ष में सबसे निर्णायक भूमिका निभाई। आज यह विमान भले ही आउटडेटेड हो गया हो, लेकिन इसके शौर्य और पराक्रम के इतने किस्से हैं, जितने शायद ही किसी और विमान के हो। आज की कहानी दुनियाभर में अपना जलवा दिखाने और अमेरिका-इजरायल में खौफ करने वाले सोवियत संघ विमान मिग-21 की।
कैसे पड़ी सुपरसोनिक विमान की नींव?
1950 से 1953 के बीच उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के बीच कोरियाई युद्ध लड़ा गया। यह शीतयुद्ध में लड़ी गई पहली बड़ी जंग थी। उत्तर कोरिया के खेमे में सोवियंत संघ और चीन जैसे देश थे। दक्षिण कोरिया को अमेरिका का समर्थन हासिल था। इस युद्ध ने यह साबित कर दिया कि आने वाला समय जेट विमानों का है। ठीक वैसे जैसे यूक्रेन युद्ध ने ड्रोन तकनीक को स्थापित किया। कोरियाई युद्ध मानव इतिहास का पहला ऐसा युद्ध था, जिसमें फाइटर जेट विमानों का इस्तेमाल किया गया। पूरे युद्ध में फाइटर जेट ने सबसे अहम और निर्णायक रोल निभाया। इसी युद्ध में पहली बार दो जेट विमानों के बीच डॉकफाइट भी हुई।
कोरियाई युद्ध में फाइटर जेट की भूमिका ने रूस और अमेरिका के बीच सुपरसोनिक विमान बनाने की होड़ छेड़ दी। दोनों देश आवाज की गति से तेज चलने वाले विमान बनाने में जुट गए। अमेरिका और सोवियंत संघ के बीच असल लड़ाई आकाश में सबसे तेज पहुंचने की थी। दोनों देशों ने मैक-1 की रफ्तार से तेज विमान बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया।
किसे मिली थी मिग-21 बनाने की जिम्मेदारी?
सोवियंत संघ की मिकोयान-गुरेविच डिजाइन ब्यूरो को एक सुपरसोनिक विमान बनाने की जिम्मेदारी सौंपी गई। ब्यूरो ने एक हल्के और बेहद तेज विमान का डिजाइन तैयार किया। इसके डेल्टा पंख बेहद खास थे, जो विमान को गति देने में मदद करते थे। यह विमान छोटी दूरी की लड़ाई के लिए डिजाइन किया गया था।
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करीब 15 मीटर लंबे मिग- 21 विमान में सिर्फ एक टुमान्स्की टर्बोजेट इंजन लगा था। यह इंजन विमान को न केवल मैक 2.05 की गति देता, बल्कि कुछ मिनटों में ही विमान को 50 हजार फुट की ऊंचाई पर भी पहुंचा देता था। हल्का और छोटा होने की वजह से मिग 21 तेजी से उड़ान भरने, अपने लक्ष्य तक पहुंचने और उसे तबाह करने में माहिर था।
मिग-21 के पीछे क्या थी सोवियत संघ की रणनीति?
सोवियत संघ का विचार मिग-21 के रूप में एक छोटे, हल्के और सस्ते विमान को बनाने का था, ताकि बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जा सके। यह रणनीति बेहद सटीक बैठी। इसका मुख्य लक्ष्य तेजी से उड़ान भरना और दुश्मन पर कहर बहनकर टूटना था। सस्ता होने के कारण बड़े पैमाने पर उत्पादन हुआ। दुनियाभर के देशों ने इसे खरीदा भी।
मिग-21 का धड़ छोटा। कॉकपिट में जगह भी कम होती थी। इसके डेल्टा पंख अन्य विमानों की तुलना में पतले थे। ईंधन क्षमता भी सीमित थी। हालांकि यह उस रणनीति का नतीजा था, ताकि विमान को तेज और किफायती बनाया जा सके।
1959 में शुरु हुआ उत्पादन
16 जून 1955 को मिग 21 ने अपनी पहली उड़ान भरी। चार साल बाद 1959 में विमान का उत्पादन आरंभ हुआ। इसी साल यह विमान सोवियत एयरफोर्स का हिस्सा बना। छह दशक में 11,496 मिग-21 विमानों का उत्पादन हुआ। सबसे बड़ी फ्लीट सोवियत संघ के पास 10,645 विमानों की थी।
सोवियत विदेश नीति का हिस्सा बना मिग-21
मिग-21 विमान की सफलता का अंदाजा आप इस बात से भी लगा सकते हैं कि यह विमान सिर्फ एक दशक में ही दुनिया में फैल चुका था। सोवियत संघ ने इसे अपनी विदेश नीति का हिस्सा बनाया लिया था। सोवियत संघ से जुड़े हर देश को यह विमान सौंपा गया।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि छोटे और विकासशील देशों ने इस विमान को क्यों अपनाया? इसकी वजह यह थी कि यह विमान बेहद सरल था। कम प्रशिक्षण की जरूरत होती थी। निर्माण और रखरखाव भी किफायती था। पश्चिमी विमानों की तुलना में संचालन भी सस्ता था। उबड़-खाबड़ रनवे से भी उड़ान भर सकता था। इस विमान को रखने के लिए बहुत बड़े बुनियादी ढांचे की जरूरत नहीं होती।
इन प्रमुख संघर्षों में लिया हिस्सा
- वियतनाम युद्ध
- सिनाई युद्ध
- गोलान हाइट्स युद्ध
- भारत-पाकिस्तान-1965
- भारत-पाकिस्तान सीमा- 1971
- अंगोला युद्ध
- इथियोपिया युद्ध
- इराक युद्ध
- सीरिया युद्ध
- कारगिल युद्ध
वियतनाम में जब अमेरिका को छकाया
1960 के दशक में अमेरिका ने उत्तर वियतनाम पर सबसे बड़े हवाई हमले का आगाज किया। इसी जंग ने सोवियत संघ के विमान मिग- 21 को दुनियाभर में सबसे बड़ी पहचान दिलाई। अमेरिका को अपने एफ-4 फैंटम और एफ-105 थंडरचीफ पर बेहद भरोसा था। यह विमान बड़े, अत्याधुनिक और शक्तिशाली माने जाते थे। जब इनका मुकाबला हल्के और छोटे मिग-21 विमान से हुआ तो अमेरिका को धूल खानी पड़ी। वियतनाम की सेना अपने ग्राउंड कंट्रोल इंटरसेप्शन की मदद से अमेरिकी विमानों का पहले से ही पता लगा लेती थी। इसके बाद तेजी के साथ मिग-21 विमानों से हमला करके मौके से भाग लेती थी।
मिग-21 विमान हासिल करने वाले प्रमुख देश
- मिस्र
- सीरिया
- इराक
- भारत
- क्यूबा
- उत्तर वियतनाम
- अंगोला
- मोजाम्बिक
- इथियोपिया
- उत्तर कोरिया
1965 से बालाकोट तक: हर जंग का हिस्सा रहा मिग-21
साल 1963 में भारत को अपना पहला मिग-21 विमान मिला। भारतीय वायुसेना ने 1200 से अधिक विमानों का संचालन किया। 840 विमानों का निर्माण लाइसेंस के तहत भारत में किया गया। मिग-21 विमान ने दो साल बाद 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में हिस्सा लिया। पहली बार भारतीय वायुसेना ने सुपरसोनिक स्पीड से किसी जंग में हिस्सा लिया। छह साल बाद मिग-21 विमानों ने 1971 के भारत-पाकिस्तान संघर्ष में अहम भूमिका निभाई। भारतीय वायुसेना सेना ने मिग-21 विमान से पाकिस्तान को मिले कई अमेरिकी एफ-104 स्टारफाइटर को मार गिराया।
पाकिस्तान का विभाजन: 1971 की जंग में मिग-21 विमान भारत के हवाई मोर्चे का सबसे अहम हिस्सा था। इस विमान ने ग्राउंड फोर्सेज को सपोर्ट दिया। दुश्मन की एयरफील्ड और रणनीतिक ठिकानों पर हमला किया। कुछ ही दिनों में भारतीय वायुसेना ने एयर सुपीरियरिटी हासिल कर ली। ढाका के गवर्नर हाउस पर मिग 21 विमानों के सटीक हमलों ने पाकिस्तान को आत्मसमर्पण पर मजबूर किया।
कारगिल युद्ध: कारगिल युद्ध में भारतीय वायुसेना ने मिग-21 विमानों का इस्तेमाल किया। जबकि यह विमान हिमालय जैसे ऊंचाई वाले रणक्षेत्र के लिए बनाया ही नहीं गया था। ऑपरेशन सफेद सागर के तहत मिग- 21 विमानों ने टोही और हवाई हमलों में न केवल अहम भूमिका निभाई, बल्कि पाकिस्तानी सैनिकों को कब्जाई पोस्टों से भागने पर मजबूर किया। 27 मई 1999 को पाकिस्तानी ग्राउंड फायर ने एक मिग-21 विमान को मार गिराया था, लेकिन मिग-21 विमान की बमबारी ने भारत की ग्राउंड फोर्सेज को आगे बढ़ने का रास्ता तैयार किया।
बालाकोट एयर स्ट्राइक: 2019 में पुलवामा अटैक के बाद भारत ने बालाकोट में एयर स्ट्राइक को अंजाम दिया। यह घटना 26 फरवरी 2019 की है। अगले दिन यानी 27 फरवरी को पाकिस्तान की सेना ने जवाबी हमला किया। इसी दिन भारत के मिग-21 विमान और पाकिस्तान के एफ-16 के बीच एरियल एंगजमेंट हुई। मिग-21 उड़ा रहे विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान ने एक एफ-16 को मार गिराया। हालांकि उनका विमान पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्र में जा गिरा। अभिनंदन को पकड़ लिया गया और बाद में रिहा कर दिया गया।
भारत ने मिग-21 से क्या सीखा
भारत ने लाइलेंस के तहत मिग-21 विमानों का निर्माण किया। इससे हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स को सोवियत तीकनीक को समझने का अवसर मिला। भारत में ही एविएशन इकोसिस्टम तैयार हुआ। एविएशन से जुड़ी उन्नत और आधुनिक तकनीक को समझने का मौका मिला। बाद में यह अनुभव तेजस जैसे स्वदेशी विमान के निर्माण में काम आया।
मिग-21 की खामियां
छह दशकों तक अपनी सेवाएं देने वाले मिग-21 की डिजाइन सॉलिड थी। इसे रफ्तार के लिए बनाया गया था, जिस पर वह खरा भी उतरा। मगर इस विमान में कई खामियां थीं। विमान की सामान्य कॉम्बैट रेंज 600 से 650 किलोमीटर थी।
भारत ने सबसे आखिरी विमान मिग-21 बाइसन का इस्तेमाल किया। यह एयरक्राफ्ट पुराने वाले मिग-21 विमान से अलग था। इसमें पुराने विमान का सिर्फ एयरफ्रेम और डिजाइन ही था। बाकी रडार और इलेक्ट्रॉनिक्स वारफेयर सिस्टम को आधुनिक बनाया गया। अपग्रेड होने के बाद विमान की रेंज 1000 से 1470 किमी के आसपास हो गई थी।
यह एक छोटा विमान था। कॉकपिट पर जगह कम होती थी। सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि विमान सिर्फ एक इंजन पर निर्भर था। इंजन खराब होने की स्थिति में पायलट के पास कोई बैकअप प्रपल्शन नहीं था। विमान की ईंधन क्षमता भी कम थी। यही कारण है कि यह विमान लंबी दूरी के मिशन करने के सक्षम नहीं था। छोटा और हल्का होने के कारण हथियार ले जाने की क्षमता भी सीमित थी।
आज भी जिंदा मिग-21
तमाम खामियों के बावजूद यह मिग-21 का जलवा थी था कि वर्षों पहले शीत युद्ध और सोवियत संघ का अंत हो गया। एफ-4 और एफ-104 जैसे उसके अमेरिकी साथी म्यूजियम में चले गए। बाद में अमेरिका ने एफ-16 और एफ- 35 जैसे आधुनिक विमानों का निर्माण किया। मगर 60 वर्षों की सेवा के बाद मिग 21 विमान आज भी जिंदा है।
अंगोला से अफगानिस्तान: 40 संघर्षों का बना गवाह
मिग-21 ने दुनियभार में लगभग 40 से अधिक संघर्षों में हिस्सा लिया। इस विमान ने ऑस्ट्रेलिया और अंटार्कटिका को छोड़कर बाकी सभी महाद्वीपों में युद्ध लड़ा। भारत ने कई युद्धों में मिग-21 विमान का व्यापक इस्तेमाल किया। 1990 के दशक में यमन गृहयुद्ध में मिग-21 ने हिस्सा लिया। डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो के संघर्ष में भी यह विमान शामिल रहा।
1970 से 1980 तक अंगोला के गृहयुद्ध में मिग-21 विमानों ने अपना दबदबा साबित किया। क्यूबा के पायलटों ने दक्षिण अफ्रीका की सेनाओं के साथ संघर्ष में हिस्सा लिया। यह विमान 1978-79 में युगांडा और तंजानिया युद्ध का गवाह भी बना।
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ओगाडेन युद्ध में सोमालिया ने इथियोपिया के खिलाफ मिग-21 विमानों को उतारा। वहीं इथियोपिया ने मिग-21 विमान से इरिट्रिया में जमीनी हमलों को अंजाम दिया। 1998-2000 में इरिट्रियाई मिग-21 विमानों ने इथियोपिया पर हमला किया। सूडान और लीबिया ने गृहयुद्धों में इन विमानों को उतारा। लीबिया ने इन विमानों का युद्ध में भी इस्तेमाल किया। यह विमान जॉर्जिया में भी संघर्ष का हिस्सा रहा।
मध्य-पूर्व में मिस्र ने मिग-21 विमानों का सबसे व्यापक इस्तेमाल किया। इजरायल के खिलाफ छह दिवसीय युद्ध और योम किप्पुर युद्ध में इन विमानों को उतारा गया। 1967 और 1973 में सीरिया ने लेबनान संघर्ष के दौरान इजरायल के खिलाफ इन विमानों से लड़ाई लड़ी। 1979 से 1989 तक सोवियत अफगान युद्ध चला। इस युद्ध में भी मिग-21 विमानों ने जमीनी हमलों को अंजाम दिया।
जब मिग-21 से अमेरिकी को मिली सबसे बड़ी चुनौती
वियतनाम और उत्तर कोरिया में मिग-21 विमान की सफलता ने अमेरिका को न केवल परेशान किया, बल्कि अपनी रणनीति बदलने पर भी मजबूर किया। उत्तर वियतनाम ने अमेरिका के खिलाफ लगभग 50 मिग-21 विमानों का इस्तेमाल किया। रूसी आंकड़ों के मुताबिक उत्तर वियतनाम में मिग-21 ने 165 हवाई जीत हासिल की। उत्तर वियतनाम ने दावा किया कि मिग- 21 ने 103 एफ-4 विमानों को तबाह किया। 1972 में 53 और विमानों को मार गिराने का दावा किया। बदले में 60 से 65 मिग-21 विमानों को नुकसान पहुंचा। 1960 के दशक में उत्तर कोरिया ने भी मिग-21 विमानों से कई अमेरिकी विमानों को तबाह किया। बड़े पैमाने पर अमेरिका को नुकसान उठाना पड़ा।
मोसाद ने चोरी किया मिग-21
कोरिया और वियतनाम में मिग-21 विमानों की क्षमता ने न केवल अमेरिका बल्कि पूरे पश्चिमी जगत को हैरत मे डाल दिया। इजरायल के दुश्मन अरब देशों के पास भी यही विमान था। इससे इजरायल भी बेहद चिंतित था, क्योंकि इस सोवियत विमान के बारे में इजरायल और पश्चिम के देशों को बहुत कम जानकारी थी। यह अपने वक्त का सबसे एडवांस्ड फाइटर जेट था। इजरायल इस विमान की तकनीक को समझना चाहता था।
उसकी खुफिया एजेंसी मोसाद ने ऑपरेशन 'याहालोम' चलाया। 1966 में एक इराकी पायलट मुनीर रादफा एक मिग-21 विमान को इजरायल ले आया। वर्षों तक इस विमान का अध्ययन किया गया। उसकी खामियों को तलाशा गया और बाद में अमेरिका के अनुरोध पर उसे दे दिया गया। बदले में अमेरिका ने इजरायल को एफ-4 फैंटम II फाइटर जेट देने का वादा किया। अमेरिका मिग- 21 इसलिए हासिल करना चाहता था, क्योंकि यह वियतनाम में तबाही का पर्याय बन चुका था। इजरायल से भेजा गया मिग-21 विमान को एरिया 51 में रखा गया। प्रोजेक्ट हैव डोनट के तहत इसका व्यापक अध्ययन किया गया। इसकी खामियां तलाशी गईं और नई सुरक्षा रणनीति बनाई गई।
इंडोनेशिया से अमेरिका ने हासिल किए 13 मिग-21 विमान
इंडोनेशिया की एयरफोर्स ने सोवियत संघ से 22 मिग-21 विमानों को खरीदा था। बाद में इंडोनेशिया में सत्ता परिवर्तन हुआ और अमेरिकी समर्थित सरकार आ गई। उसने 13 इंडोनेशियाई मिग-21 विमानों को अमेरिका को सौंप दिया। बदले में इंडोनेशिया को अमेरिकी विमान मिले। हालांकि सोवियत संघ इस कदम से नाराज हुआ और उसने बाकी बचे विमानों के लिए रखरखाव सहायता को वापस ले लिया। अमेरिका ने इन मिग-21 विमानों का इस्तेमाल अध्ययन में किया।
चीन ने बढ़ाई मिग-21 की पीढ़ियां
चीन के चेंगदू-7 विमान मिग-21 का ही एक संस्करण हैं। 1960 के दशक में चीन ने सोवियत संघ से मिग-21 विमानों का उत्पादन लाइसेंस हासिल किया। इसके बाद अपने यहां चेंगदू-7 विमानों का निर्माण शुरू किया। दुनियाभर में यह विमान एफ-7 के नाम से भी जाना जाता है। एफ-7 फाइटर जेट म्यांमार, बांग्लादेश, तंजानिया और पाकिस्तान की वायुसेना का हिस्सा हैं। 2013 तक चीन ने कुल 2400 विमानों का उत्पादन किया।
