दिल्ली पुलिस सोमवार से अचानक चर्चा में आ गई है। कुछ दिनों पहले अलग-अलग प्रदर्शनकारियों को रोक रही दिल्ली पुलिस के सामने सोमवार को उसके ही जवान और अफसर उतर आए। इस प्रदर्शन के चेहरे के तौर पर सामने आए ACP मनस्वी वशिष्ठ को अब सस्पेंड भी कर दिया गया है। वैसे भी आमतौर पर यह होता है कि चाहे कोई भी प्रदर्शन करे लेकिन पुलिस के लोग ऐसा नहीं करते। इसके बावजूद यह पहली बार नहीं जब दिल्ली पुलिस के जवानों ने प्रदर्शन किया हो। पहले भी दिल्ली पुलिस के जवानों ने कई प्रदर्शन किए हैं। इनकी संख्या कम जरूर है लेकिन ये प्रदर्शन ऐतिहासिक रहे हैं। ऐसा ही एक प्रदर्शन ठीक 60 साल पहले यानी 1966 में हुआ था जिसके बाद कई अहम बदलाव हुए। एक बदलाव यह भी था कि निचली रैंक के जवानों को हाफ पैंट से छुटकारा मिल गया। इसी के बाद से हर पुलिसकर्मी फुल पैंट में नजर आने लगा।
आज आप दिल्ली पुलिस को खाकी वर्दी में देखते हैं। एक में पैंट और शर्ट दोनों हल्के खाकी रंग की होती है। दूसरी वर्दी में कमीज और जैकेट गहरे खाकी रंग की और पैंट हल्के खाकी रंग की होती है। शर्ट हाफ या फुल हो सकती है लेकिन पैंट सभी पुलिसकर्मी फुल ही पहन सकते हैं। हालांकि, आपको यह जानकर हैरानी होगी कि 1966 से पहले ऐसा नहीं था। तब निचली रैंक के पुलिसकर्मी हाफ पैंट पहनते थे। आपने पुरानी फिल्मों भी ऐसे पुलिसकर्मी देखे भी होंगे। 1966 के आंदोलन के बाद ही इसमें भी बदलाव किया गया था।
1966 में दिल्ली पुलिस के जवानों ने क्यों किया था प्रदर्शन?
इतिहास में बहुत कम ऐसे मौके हैं जब पुलिस के जवान प्रदर्शन पर उतर आए हों। ऐसा ही एक वाकया साल 1966 में हुआ था। साल 1966 के मई महीने में दिल्ली पुलिस के लगभग 7 हजार जवान वर्दी पहनकर प्रदर्शन करने उतर आए थे। तब मुख्य मांग काम के निश्चित घंटे, काम करने लायक स्थिति और बेहतर जीवन की मांग को लेकर प्रदर्शन करने उतरे थे। एक और मांग थी कि उन्हें यूनियन बनाने का अधिकार दिया जाए। तब इंदिरा गांधी नई-नई प्रधानमंत्री बनी थीं और सत्ता संभालने की कोशिश ही कर रही थीं।
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उस वक्त प्रदर्शन करने उतरे पुलिसकर्मियों में ज्यादातर निचली रैंक के कर्मचारी ही थे। इन लोगों ने दिल्ली पुलिस यूनियन नाम का एक संगठन बनाने का एलान किया था। इसी दिल्ली पुलिस यूनियन के बैनर तले 12 किलोमीटर का एक पैदल मार्च निकाला गया था जो राष्ट्रपति भवन तक गया था। चंद महीने पहले ही सत्ता पर काबिज हुईं इंदिरा गांधी की सरकार इसके बाद सकते में आ गई थी और उसने आनन-फानन में कार्रवाई की।
तब इंदिरा गांधी चाहती थीं कि प्रदर्शनकारियों को तुरंत खदेड़ दिया जाए। हालांकि, तब सीमा सुरक्षा बल (BSF) के महानिदेशक के एफ रुस्तमजी ने बातचीत की कोशिश की। यह बातचीत बेनतीजा निकली और प्रदर्शन लगभग एक साल से ज्यादा समय तक चला।
आखिर में जस्टिस जी डी खोसला की अगुवाई में साल 1968 में बने खोसला आयोग ने पुलिसकर्मियों के काम के घंटे कम किए और उनके काम में सुधार की सिफारिश की। हालांकि, केंद्र सरकार ने तब भी यूनियन बनाने की अनुमति नहीं दी और आज भी दिल्ली पुलिस का कोई यूनियन नहीं है।
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कैसे अलग थी पुलिस की वर्दी?
पुराने जमाने में अफसरों को ही फुल पैंट वाली वर्दी पहनने की अनुमति थी। कांस्टेबल हाफ पैंट पहना करते थे। एसएचओ फुल पैंट और कीज के साथ पगड़ी पहनते थे। वहीं, महिला कांस्टेबल साड़ी और ब्लाउज पहनती थीं। माउंटेड पुलिसकर्मी यानी घोड़े और ऊंट पर सवार होकर गस्त करने वाले जवान चुस्त पायजामे जैसे फुल पैंट पहनते थे।
खोसला कमीशन की सिफारिशों के आधार पर जब तमाम बदलाव हुए तब पुलिसकर्मियों की वर्दी में भी बदलाव किया गया। उसी के बाद से निचली रैंक के पुलिसकर्मियों को भी फुल पैंट पहनने की अनुमति दी गई।
