भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) पहली बार देश के इतिहास में प्रतिस्थापन स्तर (Replacement Rate) से नीचे आ गई है। सिर्फ एक दशक में यह 2.3 से घटकर यह आंकड़ा, 1.9 पर पहुंच गया है। प्रतिस्थापन स्तर आम तौर पर 2.1 माना जाता है, अगर आंकड़ों में इससे ज्यादा गिरावट देखी जाती है तो इसका साफ मतलब है कि आने वाली पीढ़ियों की संख्या घटने वाली है। 

देश की राजधानी दिल्ली की स्थिति और भी चिंताजनक है। यहां की प्रजनन दर मात्र 1.2 है, जो फिनलैंड जैसी विकसित देशों से भी कम है। शिक्षित वर्ग में तो यह गिरावट कई साल पहले ही शुरू हो चुकी थी। अब पूरे देश में औसत जन्म दर प्रतिस्थापन स्तर के नीचे पहुंच गई है। यह आंकड़े, जनसंख्या को लेकर डराने वाले हैं।

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जनसंख्या पर आई इस रिपोर्ट में क्या है?

द इकॉनमिस्ट की एक रिपोर्ट AF पोस्ट और एलन मस्क ने शेयर की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि साल 1950 में भारत की आबादी 36 करोड़ थी और एक महिला औसतन 6 बच्चे पैदा करती थी। आज भारत की जनसंख्या 1.45 अरब हो गई है और यह दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है। अब औसतन एक महिला सिर्फ 1.9 बच्चे पैदा कर रही है। इसे टोटल फर्टिलिटी रेट (TFR) कहते हैं। 

क्यों डराती है यह रिपोर्ट?

जनसंख्या स्थिर रखने के लिए यह दर 2.1 से ऊपर होनी चाहिए। दिल्ली में तो यह और भी कम, सिर्फ 1.2 है। तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में TFR 1.3 है। शहरों में औसत 1.5 है। पहले विशेषज्ञों का मानना था कि गरीब उत्तर भारत के राज्य जनसंख्या बढ़ने में देरी करेंगे, लेकिन अब वे भी तेजी से दक्षिण के राज्यों के बराबर आ रहे हैं।

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एलन मस्क ने क्या चिंता जताई है?

एलन मस्क, CEO, टेस्ला
भारत की जन्म दर, रिप्लेसमेंट दर से भी नीचे गिर गया है। जो लोग भारत में ज्यादा पढ़े लिखे हैं, उनमें यह आंकड़ा, पहले ही बहुत गिर चुका था। 

 

 

जनसंख्या विस्फोट के डर से बाहर निकली सरकार

सरकार का रवैया भी बदल गया है। 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 'जनसंख्या विस्फोट' की चेतावनी देते थे। अब अधिकारी चीन की तरह जनसंख्या घटने की चिंता कर रहे हैं। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने तीसरे बच्चे पर 30,000 रुपये देने का ऐलान किया है। स्कूली किताबों में जनसंख्या कम होने के खतरों के बारे में लोगों को बताया जाएगा।  

क्यों घट रहे हैं बच्चे?

फैमिली वेलनेस और प्लानिंग कोच, श्रद्धा पांडेय कहती हैं, 'लड़कियां अब पढ़-लिख रहीं हैं। जो लड़कियां वर्किंग हैं या बेहतर पढ़ाई कर रही हैं, वे कम बच्चे चाहती हैं। जो परिवार काउंसलिंग के लिए आते हैं, उनका भी साफ कहना होता है कि एक बच्चा हो लेकिन नेक बच्चा हो। बच्चों के डायपर से लेकर उनकी स्कूल फीस तक इतनी महंगी है कि लोग दो बच्चों के बारे में सोच नहीं पा रहे हैं, तीसरा कैसे सोच सकेंगे।'

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और क्या वजह है आबादी घटने की?

फैमिली वेलनेस और प्लानिंग कोच श्रद्धा पांडेय बताती हैं, 'लोगों का नजरिया बदल रहा है। पहले लोग यह सोचते थे कि अगर बेटा नहीं है तो वंश आगे नहीं बढ़ेगा। अब लोग बेटे और बेटी में भेदभाव नहीं करते। अगर दो बेटियां भी हो गईं तो भी वे तीसरे बच्चे के बारे में नहीं सोचते हैं। लड़का हो या न हो तब भी।'
 

कम आबादी के खतरे क्या हो सकते हैं?

भारत में अगर ऐसा ही चलन रहा तो युवाओं का देश, बूढ़ों का देश हो सकता है। बुजुर्गों की आबादी अचानक से बढ़ेगी और युवाओं की घटेगी। जो वर्ग कमाने वाला है, वह घट जाएगा तो लोगों की निर्भरता भी बढ़ जाएगी। 2030 तक काम करने वाली उम्र की आबादी का अनुपात चरम पर पहुंच सकता है। जनसंख्या वैज्ञानिकों का अनुमान है कि भारत की आबादी 2040 के आसपास चरम पर पहुंचकर उसके बाद तेजी से घटेगी। सदी के अंत तक यह 1 अरब से थोड़ी ज्यादा रह सकती है।

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अब क्या कर रही हैं सरकारें?

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने ज्यादा बच्चे पैदा करने पर प्रोत्साहन योजना शुरू की है। उन्होंने कहा है कि तीसरे बच्चे पर 30 हजार रुपये सरकार की तरफ से अनुदान मिलेगा। भारत में 70 साल से लगातार बच्चों की संख्या घट रही है। अब लोग ज्यादा बच्चा पैदा करने से कतरा रहे हैं। कई कपल तो अब नो चाइल्ड पॉलिसी पर काम करे हैं। मतलब दंपति के तौर पर कमाई तो वे ज्यादा चाहते हैं लेकिन बच्चों की जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहे हैं। 

चिंता क्या है?

दिल्ली में सविता देवा का परिवार गणेश नगर में रहता है। उनकी एक बेटी है, सरकारी स्कूल की टीचर है। शादी 90 के दशक में हुई थी, तब जनसंख्या नियंत्रण को लेकर खूब कैंपेन चलाए गए। अब उनकी शिकायत है कि बढ़ती आबादी पर सरकार की सलाह तो मान ली लेकिन बेटी अकेली हो गई। 

सविता देवी ने कहा, 'बेटी की नौकरी BPSC के जरिए बिहार में लगी है। वह वहीं रहकर पढ़ाती है। हम पति-पत्नी ही रहते है। अब अकेला लगता है। अगर घरवालों की सलाह मानकर हमने एक और बच्चा किया होता तो शायद इस तरह से अकेले नहीं होते।'