जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। पिछले साल दिल्ली स्थित उनके घर से भारी मात्रा में नकदी बरामद होने के बाद से उन पर सवाल उठ रहे थे। उनके खिलाफ महाभियोग प्रक्रिया भी शुरू होने वाली थी और इसी बीच अब उन्होंने इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज के पद से इस्तीफा दे दिया है। इसके साथ ही संसद में अब उनके खिलाफ चल रही महाभियोग प्रक्रिया भी रूक गई है।   महाभियोग का खौफ ऐसा है कि इसके कारण अब तक कुल तीन जज इस्तीफा दे चुके हैं। 

 

भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में यह तीसरी बार है जब महाभियोग की प्रक्रिया पूरी होने से ठीक पहले किसी सिटिंग जज ने इस्तीफा दिया है। जज को हटाने के लिए संविधान में एक जटिल प्रक्रिया बताई गई है। अब तक किसी भी जज को भारत में महाभियोग प्रक्रिया के जरिए हटाया नहीं गया है। जस्टिस वर्मा के अलावा अब तक दो अन्य जजों ने महाभियोग प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। 

 

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जस्टिस सौमित्र सेन

कलकत्ता हाई कोर्ट के जज सौमित्र सेन पर 1983 के एक मामले में रिसीवर रहते हुए 33.23 लाख रुपये की हेराफेरी का आरोप लगा। कोर्ट की ओर से जमा राशि को उन्होंने अपने पर्सनल अकाउंट में ट्रांसफर कर लिया था। जब इस मामले में जांच हुई तो उन्हें दोषी पाया गया था। राज्यसभा ने 2011 में उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पारित कर दिया। भारत के इतिहास में यह पहली बार था जब किसी जज के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव किसी सदन से पास हुआ हो। हालांकि, उन्हें महाभियोग के जरिए नहीं हटाया गया क्योंकि महाभियोग प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। लोकसभा में प्रस्ताव पहुंचने से पहले उन्होंने 1 सितंबर 2011 को इस्तीफा दे दिया था। 

जस्टिस पीडी दिनाकरण

पीडी दिनाकरण सिक्किम उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश थे। उन पर कांचीपुरम जिले में करीब 197 एकड़ सरकारी और प्राइवेट जमीन हड़पने का गंभीर आरोप लगा। आय से अधिक संपत्ति रखने और पद के दुरुपयोग का भी मामला था। साल 2009 में सुप्रीम कोर्ट में उनकी नियुक्ति की सिफारिश के समय ये आरोप सुर्खियों में आए। जांच समिति ने आरोपों को सही पाया। महाभियोग शुरू होने से ठीक पहले 29 जुलाई 2011 को उन्होंने इस्तीफा दे दिया।

 

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क्यों देते हैं इस्तीफा?

जस्टिस यशंवत वर्मा, पीडी दिनाकर और सौमित्र सेन ने महाभियोग प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही इस्तीफा दे दिया। ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि पद से इस्तीफा देने के बाद महाभियोग प्रक्रिया वहीं समाप्त हो जाती है। ऐसी स्थिति में जज को रिटायरमेंट के सारे लाभ मिलते हैं। उन्हें एक रिटायर्ड जज के तौर पर सारी सुविधाएं मिलती रहती हैं।