जस्टिस यशवंत वर्मा से जड़े कथित कैश कांड की जांच रिपोर्ट बुधवार को संसद के दोनों सदनों में पेश कर दी गई है। राज्यसभा में महासचिव पीसी मोदी और लोकसभा में महासचिव उत्वल कुमार सिंह ने जांच समिति की दो खंड़ों वाली रिपोर्ट सदन के पटल पर रखी। रिपोर्ट के साथ जांच के दौरान दर्ज किए गए मौखिक और दस्तावेजी सबूत भी पेश किए गए।
जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास में 14 मार्च 2025 की रात आग लगने के बाद कथित तौर पर अधजली नोटों की गड्डियां मिलने से यह मामला सामने आया था। उस समय वह दिल्ली हाई कोर्ट के जज थे। मामले की जांच शुरू होने के बाद उन्हें इलाहाबाद हाई कोर्ट भेज दिया गया था। बाद में उन्होंने इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज पर से इस्तीफा दे दिया, जिससे संसद में उनके खिलाफ चल रही महाभियोग प्रक्रिया प्रभावी रूप से खत्म हो गई।
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जज के सरकारी क्वार्टर से मिला था अधजला कैश
14 मार्च 2025 की रात जस्टिस वर्मा के सरकारी घर में आग लग गई थी। आग बुझाने पहुंचे दमकलकर्मियों को कथित तौर पर एक स्टोर रूम में अधजली नोटों की गड्डियां मिली थीं। मामला सामने आने के बाद तत्कालीन चीफ जस्टिस संजीव खन्ना ने इसकी जांच के लिए एक आंतरिक समिति बनाई। समिति ने अपनी जांच में कहा कि जिस स्टोर रूम में कथित तौर पर नकदी मिली थी उस पर जस्टिस वर्मा का सीधे या फिर परोक्ष तौर पर नियंत्रण था। इसके बाद यह मामला काफी चर्चा में आ गया।
200 से ज्यादा सांसदों ने उठाई थी आवाज
जुलाई 2025 में 200 से ज्यादा सांसदों ने जस्टिस वर्मा को पद से हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने अगस्त 2025 में तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की। समिति ने मामले से जुड़े दस्तावेजों और गवाहों के बयानों की जांच की और मई 2026 में अपनी रिपोर्ट स्तीकर को सौंप दी। अब यह रिपोर्ट लोकसभा और राज्यसभा में पेश की गई है। रिपोर्ट दो खंड़ों में है और इसमें जांच के दौरान जुटाए गए मौखिक और दस्तावेजी सबूत भी शामिल हैं।
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इस्तीफे के बाद क्या होगा?
जस्टिस वर्मा ने संसद में महाभियोग की प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज पद से इस्तीफा दे दिया था। ऐसे में उन्हें महाभियोग के जरिए हटाने की प्रक्रिया का अब कोई व्यावहारिक असर नहीं रह गया है। जानकारों के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के अनुसार, अगर कोई जज राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा भेज देता है और उसकी कॉपी सार्वजनिक हो जाती है तो इसे इस्तीफा प्रभावी होने के लिए पर्याप्त माना जाता है। इसके लिए राष्ट्रपति की मंजूरी जरूरी नहीं होती। हालांकि, राष्ट्रपति की तरफ से औपचारिक स्वीकृति और इसके बाद कानून मंत्रालय के न्याय विभाग की ओर से अधिसूचना जारी करना तय प्रक्रिया का हिस्सा है। फिलहाल, जस्टिस वर्मा के इस्तीफे की अधिसूचना जारी नहीं हुई है।
