उत्तराखंड के गंगोत्री हिमनद से पश्चिम बंगाल के गंगा सागर तक फैली विशाल गंगा देश की पौराणिक नदियों में से एक है। गंगा के किनारे देश के कई सांस्कृतिक महानगर बसे हैं। महानगरों की नदी होने की वजह से हरिद्वार के बाद गंगा में प्रदूषण हमेशा से एक समस्या बनी रही। कुछ ऐसा ही हाल मैदानी इलाकों में आकर यमुना का रहा। जून 2014 में सरकार ने गंगा और उसकी सहायक नदियों को साफ करने के लिए 'नमामि गंगे' कार्यक्रम शुरू किया।
गंगा को साफ करने के लिए चल रहे नमामि गंगे कार्यक्रम में अब तक 147 सीवेज परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं। जल शक्ति मंत्रालय के मुताबिक सीवरेज इन्फ्रास्ट्रक्चर की कुल 219 परियोजनाएं ली गई हैं, जिनकी अनुमानित लागत 35,664 करोड़ रुपये है। गंगा बेसिन के 10 राज्यों में कुल 6,603 मिलियन लीटर प्रति दिन (MLD) क्षमता के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) विकसित करने का काम लिया गया है। इनमें से अब तक 4,341 MLD शोधन क्षमता तैयार हो चुकी है।
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इतनी कवायद, क्या साफ हुई है गंगा?
जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की 2025 की रिपोर्ट में गंगा की मुख्य धारा के प्रदूषित हिस्सों में सुधार दर्ज किया गया है। उत्तराखंड का प्रदूषित ब्लॉक, हरिद्वार से सुल्तानपुर तक प्रदूषित ब्लॉक की सूची से बाहर हो गया है। उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में प्रदूषण का स्तर घटा है, लेकिन बिहार के कुछ खंड अब भी प्रदूषित बने हुए हैं।
2024-25 में गंगा और उसकी सहायक नदियों पर 50 जगहों और यमुना और उसकी सहायक नदियों पर 26 स्थानों पर हुई बायोमॉनिटरिंग में जैविक जल गुणवत्ता अधिकांश जगहों पर 'गुड' से 'मॉडरेट' श्रेणी में दर्ज की गई। अलग-अलग जलीय जीवों की मौजूदगी को नदी के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए सकारात्मक माना जा रहा है।
गंगा में लौट पाया है जीवन?
जल शक्ति मंत्रालय के मुताबिक जैव विविधता संरक्षण के क्षेत्र में भी काम हुआ है। वैज्ञानिक सर्वेक्षण के तहत करीब 7,680 किमी नदी क्षेत्र में लगभग 3,037 घड़ियाल पाए गए हैं। राष्ट्रीय घड़ियाल संरक्षण कार्य योजना तैयार की गई। अब तक करीब 6,800 जलीय जीवों को बचाकर उनका पुनर्वास किया गया है। 2021–23 के राष्ट्रव्यापी सर्वे में करीब 6,327 नदी डॉल्फिन दर्ज हुईं, जिनमें 6,324 गंगा डॉल्फिन और 3 सिंधु डॉल्फिन थीं।
संरक्षण प्रजनन कार्यक्रम के जरिए 1,500 से ज्यादा मीठे पानी के कछुओं के बच्चे देखे गए हैं। करीब 711 कछुए गंगा में छोड़े गए, जबकि 893 घड़ियाल के बच्चे और 1,899 कछुए उनके प्राकृतिक आवासों में छोड़े गए। गंगा और उसकी सहायक नदियों में करीब 2.05 करोड़ मछली के बीज भी छोड़े गए। उत्तर प्रदेश में सात गंगा बायोडायवर्सिटी पार्क विकसित किए गए हैं, पांच गंगा बेसिन राज्यों में 33,024 हेक्टेयर पर देशी प्रजातियों के पौधे लगाए गए हैं और 113 जिलों में 5,500 से ज्यादा गंगा प्रहरी सक्रिय हैं।
औद्योगिक प्रदूषण घटाने के लिए तीन कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (CETP) स्वीकृत हुए हैं: जाजमऊ (20 MLD), बंथर (4.5 MLD) और मथुरा (6.25 MLD)। इनमें से जाजमऊ और मथुरा के संयंत्र पूरे हो चुके हैं। अक्टूबर 2018 में अधिसूचित न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह (e-flow) मानकों के अनुपालन की निगरानी केंद्रीय जल आयोग (CWC) करता है। वेटलैंड संरक्षण, नदी किनारे वनीकरण, जलीय जीवों के प्राकृतिक वास संरक्षण और वैज्ञानिक निगरानी पर भी जोर दिया जा रहा है।
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कितना काम बाकी है?
नमामि गंगे के तहत ली गई 219 सीवरेज परियोजनाओं में से 147 पूरी हो चुकी हैं, जबकि 72 अब भी अधूरी हैं। कुल 6,603 MLD क्षमता में से 4,341 MLD (करीब 66%) तैयार हो पाई है, यानी लगभग 2,262 MLD (करीब 34%) शोधन क्षमता का काम अभी बाकी है। जुलाई 2025 में लोकसभा को दिए जवाब में मंत्रालय ने परियोजनाओं के पूरा होने में देरी के दो प्रमुख कारण बताए: नए STP के लिए उपयुक्त भूमि की पहचान और सीवर नेटवर्क के लिए वैधानिक मंजूरियां। इनमें रास्ते का अधिकार (Right of Way), सड़क खुदाई की अनुमति और वन व राजस्व विभागों जैसे सक्षम प्राधिकरणों से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) शामिल हैं।
मंत्रालय के अनुसार राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) नियमित समीक्षा बैठकों और केंद्रीय निगरानी समिति के जरिए परियोजनाओं की प्रगति देखता है और अड़चनें दूर करने की कोशिश करता है। हाइब्रिड एन्युइटी मॉडल (HAM) और 'वन सिटी/क्लस्टर–वन ऑपरेटर' के तहत 31 परियोजनाएं (1,955 MLD) ली गई हैं। इनमें से अब तक 11 परियोजनाएं (454 MLD) पूरी हो चुकी हैं और 6 परियोजनाएं (235 MLD) अंतिम चरण में हैं।
नमामि गंगे पर कितना खर्च हुआ?
राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) ने जून 2014 से 15 मार्च 2026 तक अलग-अलग क्रियान्वयन एजेंसियों को कुल 21,340 करोड़ रुपये दिए हैं। इसमें से 16,025.97 करोड़ रुपये सीवेज ट्रीटमेंट से जुड़ी परियोजनाओं के लिए दिए गए हैं। नमामि गंगे परियोजना को दो चरणों में लागू किया गया है। पहले चरण का काम मार्च 2021 तक चला, जबकि दूसरे चरण के लिए अप्रैल 2021 से मार्च 2026 तक 22,500 करोड़ रुपये का परिव्यय मंजूर हुआ था। सीवेज संयंत्रों के अलावा अन्य कार्यों पर भी पैसा खर्च हुआ है। NMCG ने राज्य वन विभाग के जरिए गंगा के मुख्य प्रवाह क्षेत्र में 33,024 हेक्टेयर में वनीकरण कराया है, जिस पर करीब 414 करोड़ रुपये खर्च हुए।
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कैसे हो रही है गंगा की सफाई?
नमामि गंगे कार्यक्रम में किसी एक तकनीक तक सीमित रहने के बजाय 'टेक्नोलॉजी-न्यूट्रल' दृष्टिकोण अपनाया गया है। स्थानीय भूगोल, उपलब्ध जमीन और सीवेज की प्रकृति के अनुसार तकनीक चुनी जाती है। उत्तराखंड के बद्रीनाथ और चमोली जैसे पर्वतीय क्षेत्रों में बिजली के करंट से पानी साफ करने वाली गैर-जैविक इलेक्ट्रोकोएगुलेशन तकनीक अपनाई गई है। यह ठंडे मौसम, पहाड़ी भूभाग और सीमित पहुंच वाले इलाकों के लिए उपयुक्त मानी गई है। राज्य में ऐसी 17 इकाइयां दर्ज हैं।
उत्तराखंड में ही जोकासो (Johkasou) नाम की तैयार (पैकेज्ड) इकाइयां 6 जगह हैं। यह तकनीक कम बहाव, कम जगह और सिविल निर्माण की मुश्किल वाले स्थानों के लिए उपयोगी बताई गई है। जहां जमीन कम थी, वहां बहुमंजिला तकनीक अपनाई गई। ऋषिकेश के मुनि की रेती में नमामि गंगे के तहत किसी नगरपालिका के लिए बना देश का पहला चार मंजिला STP (7.5 MLD) है, जो करीब 900 वर्ग मीटर में फैला है। जैविक पोषक तत्व हटाने की व्यवस्था के साथ भी इसमें प्रति MLD करीब 120 वर्ग मीटर जमीन लगती है।
छोटी बस्तियों के लिए बड़ा सीवर नेटवर्क महंगा पड़ सकता है, इसलिए वहां प्रकृति-आधारित समाधान अपनाए गए हैं। उत्तर प्रदेश के बिठूर (आबादी करीब 20 हजार) में STP के लिए उपयुक्त जमीन नहीं थी, इसलिए नालों पर ही 6 'कंस्ट्रक्टेड वेटलैंड' बनाए गए। इनमें पौधे, मिट्टी और सूक्ष्म जीव मिलकर प्राकृतिक तरीके से करीब 2 MLD सीवेज का उपचार करते हैं।
जैविक प्रदूषण का पैमाना (BOD) करीब 75 मिलीग्राम प्रति लीटर से घटकर 10 मिलीग्राम प्रति लीटर से नीचे आ गया। इसी तरह देवप्रयाग में 1.2 MLD क्षमता का सॉइल बायोटेक्नोलॉजी आधारित STP बना है। इसमें मिट्टी, देसी सूक्ष्म जीव और खास पौधों की मदद से पानी साफ होता है। मशीनें कम लगती हैं, इसलिए संचालन आसान रहता है।
