सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को अपनी एक टिप्पणी में कहा कि हिंदू धर्म में आस्था साबित करने की खातिर मंदिर जाना जरूरी नहीं है। सिर्फ घर के अंदर एक दीपक जलाना भी आस्था साबित करने के लिए काफी है। शीर्ष अदालत ने हिंदू धर्म को जीवन जीने का एक तरीका बताया।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ जजों की संविधान पीठ ने सुनवाई की। इसमें केरल के सबरीमाला मंदिर और दाऊदी बोहरा समेत कई धर्मों द्वारा पालन की जाने वाली धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे पर सुनवाई चली।
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एक पक्ष के वकील डॉ. जी. मोहन गोपाल ने शीर्ष अदालत में तर्क दिया कि धार्मिक समुदायों के भीतर से ही सामाजिक न्याय की मांग उठ रही है। उन्होंने कहा, 'हिंदू धर्म को एक धार्मिक श्रेणी के तौर पर परिभाषित किया गया था। 1966 में यह माना गया कि हिंदू वह है, जो धर्म और दर्शन से जुड़े सभी मामलों में वेदों को सर्वोच्च सत्ता के तौर पर स्वीकार करता है। उन्होंने मुझसे कभी नहीं पूछा। हममें से किसी ने भी कभी ऐसा नहीं कहा। मेरे मन में वेदों के प्रति सर्वोच्च सम्मान और गहरी प्रशंसा है, लेकिन क्या यह सच है कि आज हर वह व्यक्ति जिसे हिंदू के रूप में वर्गीकृत किया गया है, सभी आध्यात्मिक और दार्शनिक मामलों में वेदों को सर्वोच्च सत्ता के रूप में स्वीकार करता है?।'
हिंदू धर्म जीवन जीने का तरीका है: जस्टिस नागरत्ना
जस्टिस नागरत्ना ने दलील का जवाब दिया। उन्होंने कहा, 'इसीलिए हिंदू धर्म को जीवन जीने का एक तरीका कहा जाता है। एक हिंदू होने के लिए किसी मंदिर जाना या कोई धार्मिक अनुष्ठान करना जरूरी नहीं है। वहीं चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, 'अगर कोई व्यक्ति अपनी झोपड़ी के अंदर एक दीपक भी जलाता है तो उसका धर्म साबित करने के लिए इतना ही काफी है।'
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संविधान पीठ में कौन-कौन?
2018 में पांच जजों की एक संविधान पीठ ने सबरीमाला अयप्पा मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को हटा दिया था। तब शीर्ष अदालत ने कहा था कि सदियों पुरानी यह प्रथा असंवैधानिक और अवैध है। बुधवार को भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं पर 15वें दिन 9 जजों की संविधानिक पीठ ने सुनवाई की। इसमें जस्टिस बीवी नागरत्ना, एमएम सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमनुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी वराले, आर महादेवन और जॉयमाल्य बागची शामिल हैं।
