नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने बुधवार को संसद में अपना जो भाषण दिया, वह चर्चा में आ गया है। चर्चा इस कदर हुई कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) सांसद अनुराग ठाकुर उनके खिलाफ विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव लेकर आए हैं। संसदीय कार्यवाही के नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए अनुराग ठाकुर ने मांग की है कि इसे प्रिविलेज कमेटी को भेजकर इसकी जांच करवाई जाए। उन्होंने 'इडियट' और 'अंधभक्त' जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने पर आपत्ति दर्ज कराई है। इस मुद्दे ने एक बार फिर से विशेषाधिकार हनन के नियमों को फिर से तूल दे दिया है। रोचक बात है कि विशेषाधिकार हनन के कानून के तहत ही देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को जेल जाना पड़ा था।
बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर ने राहुल गांधी के खिलाफ जो नोटिस दिया है, उसमें उन्होंने रूल्स ऑफ प्रोसीजर एंड कंडक्ट ऑफ बिजनेस के नियम 222 और 223 का जिक्र किया है। अनुराग ठाकुर का कहना है कि राहुल गांधी ने 29 अगस्त को लोकसभा में अपने भाषण के दौरान स्पीकर की ओर से चेतावनी दिए जाने के बावजूद 'इडियट' और 'अंधभक्त' जैसे शब्दों का इस्तेमाल बार-बार किया।
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अनुराग ठाकुर ने आगे लिखा है कि नियम 352 (II) कहना है कि कोई सांसद बेहद जरूरी ना होने तक किसी ऐसे शख्स का सदन में जिक्र नहीं कर सकता है, जिसका कोई लेना-देना ना हो। उन्होंने नियम 352 के ही अन्य उपबंधों का जिक्र करते हुए कहा है कि अभद्र शब्दों का इस्तेमाल करना और 'इडियट' और 'अंधभक्त' जैसे शब्द सदन में बोलना सदन की गरिमा गिराने जैसा है।
क्या चाहते हैं अनुराग ठाकुर?
अनुराग ठाकुर ने लोकसभा के स्पीकर ओम बिरला से मांग की है कि पहले तो उनके इस नोटिस को नियम 222 के तहत स्वीकार किया जाए। साथ ही, राहुल गांधी ने जिन शब्दों का इस्तेमाल किया, उन्हें नियम 380 और 381 के तहत संदन की कार्यवाही से हटाया जाए। इसके अलावा, अनुराग ठाकुर की मांग यह भी है कि नियम 227 के तहत यह मामला प्रिविलेज कमेटी को भेजा जाए ताकि वह विस्तार से इसकी जांच करके कार्रवाई करे। उन्होंने यह भी मांग की है कि राहुल गांधी को निर्देश दिया जाए कि वह बिना किसी शर्त के सदन और गृहमंत्री से माफी मांगें।
क्या है विशेषाधिकार और उसके हनन का मामला?
संसदीय विशेषाधिकार का मतलब है कि सांसदों को कुछ खास अधिकार मिलते हैं। ये अधिकार देने का मकसद है कि बिना किसी हस्तक्षेप के वे अपने काम कर सकें। अब अगर कोई सांसद या विधायक इन्हीं अधिकारों का दुरुपयोग करे तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई होती है। विशेषाधिकार के कुछ उदाहरण ऐसे हैं कि कोई सांसद या विधायक सदन में जो कुछ भी बोलता है उसके लिए उसके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हो सकती है। इसी तरह, संसदीय कार्यवाही की न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती। यानी किसी अदालत में यह नहीं पूछा जा सकता है कि संसद में क्या और कैसे हुआ।
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विशेषाधिकार हनन में ही संसदीय कार्यवाही के नियम भी आते हैं। यानी संसद में सांसद किस तरह से काम करेंगे, कैसे अपने मुद्दे उठाएंगे, इन सबके नियम बनाए गए हैं। इसी को 'रूल्स ऑफ प्रोसीजर एंड कंडक्ट ऑफ बिजनेस' कहा जाता है। अनुराग ठाकुर ने राहुल गांधी के खिलाफ जो नोटिस दिया है उसमें भी नियम 222, नियम 223 और नियम 227 का जिक्र किया गया है।
बता दें कि विशेषाधिकार हनन का दोषी पाए जाने पर चेतावनी देकर छोड़ा जा सकता है, निलंबित किया जा सकता है या फिर संसद के किसी मौजूदा सत्र भर के लिए जेल भी भेजा जा सकता है।
क्यों जेल गई थीं इंदिरा गांधी?
सबसे पहले तो स्पष्ट कर दें कि इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द करने का मामला दूसरा है, वह साल 1975 में हुआ था। विशेषाधिकार हनन का यह मामला साल 1978 का है। उस वक्त जनता पार्टी की सरकार थी और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री थे। इंदिरा गांधी का बुरा दौर चल रहा था और हर दिन उन्हें मुंह की खानी पड़ रही थी।
मामला मारुति केस का था। वही मारुति जो संजय गांधी का सपना था। इंदिरा गांधी पर आरोप लगते रहे कि उन्होंने पद का दुरुपयोग करते हुए संजय गांधी को मनमानी करने दी और कंपनी डूब गई। जब जनता पार्टी की सरकार आई तो इस केस की जांच हुई। इंदिरा गांधी पर आरोप लगे थे कि मारुति केस की जांच कर रहे चार अधिकारियों को उन्होंने तब तंग किया था जब वह प्रधानमंत्री थीं। इसकी शिकायत संसद की विशेषाधिकार समिति से की गई।
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समिति की रिपोर्ट सदन में रखी जानी थी लेकिन जनता पार्टी के संसदीय बोर्ड ने इंदिरा गांधी को सजा देने का फैसला किया। साथ ही, इंदिरा गांधी की सांसदी खत्म करने और उन्हें जेल भेजने का निर्णय लिया गया। इस पर इंदिरा गांधी ने संसद में कहा, 'जनता पार्टी के संसदीय बोर्ड ने मुझे पहले ही दोषी मान लिया है तो मेरा अपने बचाव में कुछ कहने का कोई मतलब नहीं है। आपकी दी हुई सजा मुझे मजबूत बनाएगी। मेरा सूटकेस पैक है, मुझे सिर्फ गर्म कपड़े रखने हैं।' इसी के अगले दिन इंदिरा गांधी को गिरफ्तार कर लिया गया। वह 7 दिन के लिए जेल में रहीं और उन्हें तिहाड़ जेल के वार्ड नंबर 19 में रखा गया। उन्हें संसद से निलंबित भी कर दिया गया था।
कई अन्य नेताओं पर भी हुई कार्रवाई
साल 2005 में आए एक स्टिंग ऑपरेशन में 11 सांसदों को लेकर सवाल उठे थे कि वे पैसे लेकर सवाल पूछते हैं। इनमें 6 सांसद बीजेपी के, तीन बीएसपी के और एक-एक सांसद कांग्रेस और आरजेडी के थे। संसदीय समिति ने इन सांसदों की गतिविधि को अनैतिक पाया था और 10 लोकसभा सांसदों को निलंबित कर दिया था। 24 दिसंबर 2005 को सभी 11 सांसदों को संसद से निकाल दिया गया था। बाद में यह मामला अदालत में भी गया और इन सांसदों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा भी चला।
2023 में टीएमसी की सांसद महुआ मोइत्रा को एथिक्स कमेटी पैसे लेकर सवाल पूछने का दोषी पाया था। इसी के चलते 8 दिसंबर 2023 को उनकी सांसदी समाप्त कर दी गई। हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव में वह दोबारा चुनाव जीत गईं और सांसद बन गईं।
