दिल्ली हाई कोर्ट के जज और बाद में मणिपुर के चीफ जस्टिस रहे सिद्धार्थ मृदुल के बारे में एक रोचक जानकारी सामने आई है। खुलासा हुआ है कि वह जज के पद पर रहते हुए ही एक गैस एजेंसी चला रहे थे। आमतौर पर संवैधानिक पद पर बैठे शख्स के लिए इसे नैतिक रूप से गलत माना जाता है। बाद में जब इसकी शिकायत हुई तो भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) ने उनसे इस पर जवाब मांगा। उनकी तरफ से कोई जवाब न आने पर उनकी डीलरशिप कैंसल कर दी गई है। ये सब होते-होते ही वह मणिपुर के चीफ जस्टिस भी बने और अब रिटायर भी हो चुके हैं।

 

आमतौर पर देखा जाता है कि संवैधानिक शपथ पर बैठे लोग और खासकर जज किसी भी कंपनी, पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग (PSU) या किसी सरकार से कोई संबंध नहीं रखते हैं। हालांकि, रिटायर्ड जस्टिस सिद्धार्थ मृदुल के मामले में ऐसे नहीं हुआ। अब सामने आया है कि उनके 16 साल के करियर में भी वह गैस एजेंसी चलाते रहे। वह 21 नवंबर 2024 को रिटायर भी हो गए और उनकी डीलरशिप कैंसल करने का फैसला 6 जुलाई 2026 को सामने आया है।

कैसा रहा सिद्धार्थ मृदुल का करियर?

साल 1986 में वकालत की शुरुआत करने वाले सिद्धार्थ मृदुल सबसे पहले दिल्ली हाई कोर्ट में वकील बने। लगभग 22 साल वकालत करने के बाद वह दिल्ली हाई कोर्ट में ही मार्च 2008 में जज बने। अक्तूबर 2023 में उनका प्रमोशन हुआ और वह मणिपुर हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस बने। हालांकि, इस दौरान उनकी गैस एजेंसी चलती रही। ना तो उन्होंने गैस एजेंसी सरेंडर की और ना ही कंपनी ने इसकी तरफ ध्यान दिया। उनकी डीलरशिप का आखिरी रिन्यूअल 2025 में हुआ था और यह डीलरशिप 2030 तक चलनी थी लेकिन अब इसे कैंसल कर दिया गया है।

 

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बताया गया है कि सबसे पहले साल 1984 में सिद्धार्थ मृदुल को LPG की एजेंसी मिली। BPCL की यह एजेंसी सिद्धार्थ मृदुल की कंपनी 'Kitchen Flame' के नाम पर ली गई थी। 25 अगस्त 1995, 24 अगस्त 2005, 23 अगस्त 2010, 25 अगस्त 2015 और 7 मई 2025 और फिर 29 सितंबर 2025 को उनकी एजेंसी का रिन्यूअल होता रहा। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, हालिया एग्रीमेंट पर सिद्धार्थ मृदुल की तस्वीर भी लगी हुई है और उन्होंने किचन फ्लेम की ओर से दस्तखत भी किए हैं।

सिद्धार्थ मृदुल ने इसमें क्या गलत किया?

भारत में पारदर्शिता को ध्यान में रखते हुए जजों को यह बताना होता है कि किन कंपनियों में वे शेयरहोल्डर हैं। सिद्धार्थ मृदुल ने इसी का उल्लंघन किया। उन्होंने कभी इसका एलान ही नहीं किया कि उनके पास एक गैस एजेंसी भी है। इतना ही नहीं, जब BPCL ने सिद्धार्थ मृदुल को नोटिस भेजा तो उन्होंने उसका जवाब भी नहीं दिया।

 

दरअसल, इसी मामले में BPCL को सिद्धार्थ मृदुल के खिलाफ एक शिकायत मिली थी। शिकायत में कहा गया कि सिद्धार्थ मृदुल जज रहे हैं। इसी शिकायत के आधार पर ही BPCL ने उनको नोटिस भेजकर पूछा कि उनकी डीलरशिप क्यों न कैंसल कर दी जाए? BPCL ने अपने नोटिस में लिखा कि यह डीलरशिप के नियमों के खिलाफ है और कभी यह भी नहीं बताया कि आपकी गैरमौजूदगी में डिस्ट्रीब्यूशन का काम कैसे होता था। BPCL ने 30 जनवरी और 26 फरवरी को भी सिद्धार्थ मृदुल को चिट्ठी लिखी लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।

 

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ऐसे में BPCL ने 6 जुलाई को उनकी डीलरशिप कैंसल कर दी। यह भी बताया गया है कि दो महीने पहले ही सिद्धार्थ मृदुल के 'किचन फ्लेम' के मैनेजर रहे दीपक यादव की विधवा मोनिका यादव ने दिल्ली हाई कोर्ट में एक याचिका दायर करके मांग की थी कि BPCL को निर्देश दिया जाए कि वह उनकी शिकायत पर ध्यान दे और एजेंसी के प्रोपरायटरशिप का पुनर्गठन उनके पक्ष में किया जाए। हाई कोर्ट ने BPCL को निर्देश दिए थे कि 2 महीने में उनकी याचिका पर फैसले हो। अब जब BPCL ने सिद्धार्थ मृदुल की डीलरशिप कैंसल कर दी है तो मोनिका यादव ने फिर से हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है और आरोप लगाए हैं कि BPCL ने उनकी अपील मानी ही नहीं।