देश के सबसे बड़े केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CRPF) ने सुरक्षा के मोर्चे पर एक ऐतिहासिक रिकॉर्ड बनाया है। 30 अक्टूबर 2025 से 30 अक्टूबर 2026 के बीच, यानी पूरे 12 महीनों के दौरान किसी भी ऑपरेशन के दौरान CRPF का एक भी जवान शहीद नहीं हुआ। ऐसा 47 साल बाद देखने को मिला है। इससे पहले जनवरी 1979 में ऐसा दौर समाप्त हुआ था। बल के महानिदेशक के अनुसार, आधुनिक उपकरणों, बेहतर रणनीतिक योजना, उन्नत ट्रेनिंग और घायल जवानों को तुरंत अस्पताल पहुंचाने की वजह से यह संभव हो पाया है।


इस ऐतिहासिक उपलब्धि के पीछे क्या सिर्फ बेहतर रणनीति और आधुनिक उपकरण ही वजह हैं? या फिर देश में सुरक्षा चुनौतियों का ढांचा ही बदल चुका है? आंकड़े बताते हैं कि जहां एक तरफ नक्सली हिंसा में भारी गिरावट आई है। वहीं दूसरी तरफ मणिपुर और जम्मू-कश्मीर जैसे नए संवेदनशील मोर्चों पर CRPF की बड़ी तैनाती हुई है। यानी जवानों के लिए खतरे खत्म नहीं हुए हैं बल्कि उनकी जगह बदल गई है।

 

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2010 से 2026 तक का सफर

CRPF के इतिहास में मौतों के आंकड़ों को देखें तो यह स्पष्ट होता है कि समय के साथ सुरक्षा स्थितियों में बड़ा सुधार आया है। साल 2010 में  छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में एक बड़ा माओवादी हमला हुआ था जिसमें 75 लोगों की जान चली गई। इसके बाद 2019 में जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में आत्मघाती आतंकी हमला हुआ जिसमें करीब 40 जवान शहीद हो गए थे। वहीं 2024 में छत्तीसगढ़, जम्मू-कश्मीर और मणिपुर में अलग-अलग मुठभेड़ में कुल 12 जवानों की मौत हो गई थी। 30 अक्टूबर 2025 तक 9 जवानों की मौत हुई है। 

 

31 अक्टूबर 2025 से 30 अक्टूबर 2026  के बीच में एक भी मौक नहीं हुई है। 47 साल में पहली बार लगातार 12 महीने में शून्य मौत का आंकड़ा पार किया है। 2010 और 2019 की घटनाएं बड़े हमलों से जुड़ी थीं, जबकि 2024 और 2025 के आंकड़े नियमित ऑपरेशनों के दौरान हुए नुकसान को दर्शाते हैं।

क्या नक्सलवाद कमजोर होने से घटा मौतों का ग्राफ?

CRPF की मौतों में आई इस भारी कमी का सीधा संबंध नक्सलवाद के पतन से है। गृह मंत्रालय के आंकड़े इस बदलाव की गवाही देते हैं। साल 2010 में जहां नक्सली हिंसा की 1,936 घटनाएं दर्ज हुई थीं। वहीं 2025 में यह घटकर महज 234 रह गईं। इसका मतलब है इसमें लगभग 88% की कमी आई। 2010 में नागरिकों और सुरक्षा बलों की कुल 1,005 मौतें हुई थीं, जो 2025 में घटकर 100 पर आ गईं।

 

हिंसा से प्रभावित पुलिस स्टेशनों की संख्या भी 465 से घटकर 119 रह गई। 31 मार्च 2026 को देश को आधिकारिक रूप से 'LWE-Free' (वामपंथी उग्रवाद मुक्त) घोषित कर दिया गया। साफ है कि जिस नक्सल प्रभावित इलाके में कभी जवानों के लिए सबसे ज्यादा जोखिम था, वहां अब हालात काफी हद तक नियंत्रण में हैं।

मणिपुर और जम्मू-कश्मीर

नक्सल मोर्चे पर शांति का मतलब यह नहीं है कि CRPF के जवानों के सामने चुनौतियां खत्म हो गई हैं। बल की बटालियनों को अब अन्य संवेदनशील इलाकों में तैनात किया जा रहा है। मणिपुर की हिंसा के बाद वहां CRPF की करीब 20,000 जवानों वाली 200 कंपनियां तैनात की गईं। विशेष कमांडो दस्ता 'कोबरा' (CoBRA) की 2 नई यूनिटें वहां भेजी गईं। खतरे को देखते हुए जवानों के लिए नई SOP जारी की गई। बिना बुलेटप्रूफ गाड़ियों के आवाजाही पर रोक लगाई गई। करीब 100 स्वदेशी 'मार्क्समैन' हल्के बुलेटप्रूफ गाड़ी तैनात किए गए। 

 

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उधमपुर और कठुआ के पहाड़ी व जंगली इलाकों में आतंकवाद विरोधी ऑपरेशनों के लिए CRPF की 21 नई कंपनियां तैनात करने का खाका खींचा गया। नक्सल मोर्चे से मुक्त हुई यूनिटों को जम्मू क्षेत्र के उग्रवाद विरोधी अभियानों में शिफ्ट किया जा रहा है।

 

CRPF का लगातार 12 महीने तक शून्य ऑपरेशनल मौत का रिकॉर्ड निश्चित रूप से एक बड़ी उपलब्धि है। यह हमारे जवानों की बेहतर ट्रेनिंग, आधुनिक तकनीक और समय पर मिले मेडिकल सपोर्ट का परिणाम है। हालांकि, मणिपुर और जम्मू-कश्मीर जैसे इलाकों में CRPF की बढ़ती तैनाती यह दिखाती है कि देश के अंदर सुरक्षा की चुनौतियां खत्म नहीं हुई हैं बल्कि उनका स्वरूप और जगह बदल चुकी है।