देशभर में भारतीय जनता पार्टी (BJP) शाषित राज्यों में 'जेन अल्फा' के छात्र स्कूलों की खराब स्थिति को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। यूपी, मध्य प्रदेश, राजस्थान से लेकर बिहार तक के सरकारी स्कूलों की हालत खराब है। 'यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेसन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस' (UDISE+) के आंकड़े बताते हैं कि बड़ी संख्या में ऐसे स्कूल हैं, जहां न टॉयलेट है, न छत है, न छात्र हैं, न पढ़ाने वाले शिक्षक हैं।
निति आयोग ने मई 2026 में 'स्कूल एजुकेशन सिस्टम इन इंडिया: टेम्पोरल एनालिसिस एंड पॉलिसी रोडमैप फॉर क्वालिटी एनहांसमेंट' की एक रिपोर्ट जारी की। रिपोर्ट 2014 से लेकर 2024-2025 तक की समयावधि पर है। रिपोर्ट के अनुसार भारत में 14.71 लाख स्कूल हैं, जिनमें 24.69 करोड़ छात्र पढ़ते हैं और करीब 1.01 करोड़ शिक्षक काम करते हैं। यह दुनिया का सबसे बड़ा स्कूल सिस्टम है।
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किस हाल में हैं देश के स्कूल?
14.71 लाख स्कूल और 24.69 करोड़ छात्रों के बावजूद स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं अधूरी हैं, सीखने का स्तर कमजोर है और कई राज्य पीछे छूटे हुए हैं। सबसे बड़ी खराबी स्कूलों का पिरामिड मॉडल है। प्राथमिक स्कूल 7.3 लाख हैं, लेकिन अपर प्राइमरी 4.34 लाख, माध्यमिक सिर्फ 1.42 लाख और उच्च माध्यमिक 1.64 लाख। कक्षा 1 से 12 तक लगातार शिक्षा देने वाले स्कूल महज 5.4 प्रतिशत हैं। इससे बच्चे बार-बार स्कूल बदलते हैं और ड्रॉपआउट बढ़ता है।
राजस्थान में ऐसे स्कूल सबसे ज्यादा हैं, जहां पहली से 12वीं तक की पढ़ाई होती है लेकिन पश्चिम बंगाल में सिर्फ 0.91 प्रतिशत, बिहार में 1.40 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश में 2.90 प्रतिशत ही हैं। एक-तिहाई से ज्यादा स्कूलों में 50 से कम छात्र हैं। 5.1 प्रतिशत स्कूलों में 10 से कम और 8 प्रतिशत में 11-20 छात्र हैं। एक-शिक्षक वाले स्कूल 1,04,125 हैं, जिनमें 33.76 लाख छात्र पढ़ते हैं। शून्य नामांकन वाले स्कूल 7,993 हैं।
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जिन राज्यों में NDA की सरकार नहीं, उनका हाल क्या? राज्यवार देखिए-
कर्नाटक में स्कूलों का हाल क्या है?
कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है। कर्नाटक में स्कूलों में बच्चों के दाखिले का आंकड़ा सुधरा है। 10वीं तक नामांकन 100 फीसदी से अधिक पहुंच गया है। 11वीं-12वीं में यह पिछले 10 वर्षों में 29.68 फीसदी से बढ़कर 61.4 फीसदी हो गया है। पढ़ाई बीच में छोड़ने की दर अभी भी चिंताजनक है। 10वीं तक 18.3 फीसदी बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं और सिर्फ 62.5 फीसदी ही 11वीं तक पहुंचते हैं। केवल 1 फीसदी स्कूलों में पहली से 12वीं तक की लगातार शिक्षा उपलब्ध है। आधे स्कूलों में इंटरनेट नहीं है और मात्र 18.1 फीसदी स्कूलों में ही दिव्यांग बच्चों के लिए शौचालय की सुविधा है।
हिमाचल के स्कूल कैसे हैं?
हिमाचल प्रदेश में भी कांग्रेस की सरकार है। माध्यमिक स्तर पर स्कूल छोड़ने की दर 6.2 प्रतिशत है। केवल 48.9 प्रतिशत स्कूलों में स्मार्ट क्लासरूम हैं। दिव्यांग बच्चों के लिए अनुकूल शौचालय केवल 28.2 प्रतिशत स्कूलों में मौजूद हैं।
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तेलंगाना के स्कूल कैसे हैं?
तेलंगाना के स्कूलों में 10वीं तक 13.2 फीसदी बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं और 11वीं में केवल 72.8 फीसदी बच्चे ही आगे बढ़ते हैं। इसके अलावा, सिर्फ 6.8 प्रतिशत स्कूलों में दिव्यांग बच्चों के लिए शौचालय की सुविधा है।
केरल के स्कूल कैसे हैं?
केरल में भी कांग्रेस की सरकार है। स्कूली शिक्षा का स्तर काफी मजबूत है। यहां 99 फीसदी से ज्यादा बच्चे बिना पढ़ाई छोड़े अगली कक्षाओं में पहुंचते हैं और 10वीं तक ड्रॉपआउट दर केवल 4.8 फीसदी है। लगभग सभी स्कूलों में बिजली, कंप्यूटर और 91.7 फीसदी में इंटरनेट मौजूद है। राज्य में अभी 59.7 फीसदी स्कूलों में ही स्मार्ट क्लासरूम चालू हैं और केवल 35.5 फीसदी स्कूलों में दिव्यांग छात्रों के लिए शौचालय उपलब्ध हैं।
पंजाब के स्कूलों का हाल क्या है?
पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार है। पंजाब की ड्रॉपआउट दर भी काफी कम है। प्राइमरी में 2.5 फीसदी और माध्यमिक में 6.2 फीसदी प्रतिशत ड्रॉपआउट दर है। राज्य के लगभग सभी स्कूलों में बिजली-कंप्यूटर है। करीब 80.1 फीसदी कक्षाओं में स्मार्ट क्लासरूम हैं। करीब 44 फीसदी स्कूलों में अब भी दिव्यांग बच्चों के अनुकूल शौचालयों की कमी है।
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मिजोरम के स्कूलों का हाल क्या है?
मिजोरम में मिजोरम पीपल्स मूवमेंट (ZPM) की सरकार है। यह दल, NDA गठबंधन का हिस्सा नहीं है। मिजोरम में स्कूली बच्चों के बीच में ही पढ़ाई छोड़ने की दर देश में सबसे अधिक है। यहां प्राइमरी में 10.8 फीसदी, मिडिल स्कूल में 11.6 फीसदी और 10वीं तक आते-आते 17.4 फीसदी बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं। अगली कक्षाओं में दाखिला लेने वाले छात्रों की संख्या भी तेजी से घट रही है।
मिडिल से हाई स्कूल जाने वालों की दर 93.95 फीसदी से गिरकर 77.8 फीसदी हो गई है, जबकि 10वीं के बाद केवल 58.5 फीसदी छात्र ही 11वीं में पहुंच पाते हैं। इसके अलावा, स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं भी बेहद कमजोर हैं। केवल 11.3 फीसदी स्कूलों में स्मार्ट क्लासरूम हैं और मात्र 15 फीसदी स्कूलों में दिव्यांग बच्चों के लिए उपयुक्त शौचालय उपलब्ध हैं।
तमिलनाडु के स्कूलों का हाल क्या है?
तमिलनाडु में तमिलगा वेत्री कड़गम की सरकार है। 3 महीने पुरानी इस सरकार से पहले द्रविड़ मुनेत्र कड़गम की सरकार थी। तमिलनाडु में स्कूल छोड़ने की दर 3 फीसदी से भी कम है। करीब 87 फीसदी छात्र 10वीं के बाद 11वीं तक पहुंचते हैं। राज्य में स्मार्ट क्लासरूम का दायरा तेजी से बढ़कर 60.8 फीसदी हो गया है। लड़कों के चालू शौचालयों की संख्या 97.2 फीसदी से घटकर 90.9 फीसदी पर आ गई है।
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झारखंड के स्कूलों की हाल क्या है?
झारखंड के स्कूलों में बुनियादी ढांचे और ड्रॉपआउट दर में बड़ा सुधार हुआ है। प्राइमरी में स्कूल छोड़ने की दर करीब शून्य है। माध्यमिक स्तर पर यह घटकर 3.5 फीसदी रह गया है। 92.7 फीसदी स्कूलों में बिजली पहुंच गई है, 76 फीसदी स्कूलों में अब कंप्यूटर पहुंच गया है। 11वीं और 12वीं में केवल 48.6 फीसदी छात्र ही दाखिला ले पा रहे हैं। स्मार्ट क्लासरूम सिरफ 14.8 फीसदी हैं। दिव्यांग अनुकूल शौचालयों सिर्फ 6.4 प्रतिशत हैं।
