logo

मूड

ट्रेंडिंग:

36% स्कूलों में इंटरनेट नहीं, 35% में डेस्कटॉप, डिजिटल रेस में कितने पिछड़े हम?

भारत का जोर, डिजिटल और स्मार्ट लर्निंग पर है। भारत स्मार्ट और AI लर्निंग में कितना आगे बढ़ा है, हकीकत क्या है? पढ़ें फ्राइडे रिलीज के इस अंक में जमीनी हकीकत।

Primary Schools in India

संविलयन उच्च प्राथमिक विद्यालय, गैंसड़ा. सिद्धार्थनगर। Photo Credit: Khabargaon

भारत डिजिटल क्रांति की तरफ तेजी से बढ़ रहा है। 1 जुलाई 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'डिजिटल इंडिया' अभियान की शुरुआत की थी। इंदिरा गांधी इनडोर स्टेडियम, नई दिल्ली में 'डिजिटल इंडिया वीक' के उद्घाटन कार्यक्रम में उन्होंने इस महत्वाकांक्षी परियोजना की नींव रखी थी। उम्मीद थी कि भारत तेजी से डिजिटल होगा, 'पावर टू एंपावर' नारा सच होगा। इस अभियान के तहत ही देश में ऑनलाइन सरकारी सेवाओं, ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी, डिजीलॉकर और डिजिटल पेमेंट पर जोर दिया गया था। स्कूलों में भी क्रांतिकारी बदलाव लाने का वादा किया गया था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बताया था कि डिजिटल इंडिया का मकसद सिर्फ तकनीक का प्रसार करना नहीं है, बल्कि देश के आखिरी बच्चे तक शिक्षा, रोजगार और सशक्तिकरण पहुंचाना है। क्या ऐसा हो पाया? जवाब हां और न के बीच में है। पिछले 10 साल में भारत के स्कूलों में कंप्यूटर, इंटरनेट और स्मार्ट क्लासरूम की उपलब्धता में काफी सुधार हुआ है। जहां इंटरनेट नहीं था, वहां भी पहुंचा लेकिन आज भी बड़े सुधार की गुंजाइश बची हुई है। 

यूनिफआइड डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम ऑफ एजुकेशन (UDISE+) के आंकड़े बताते हैं कि साल 2014-15 में जहां सिर्फ 26.42 प्रतिशत स्कूलों में काम करने योग्य कंप्यूटर थे, वहीं 2024-25 में यह बढ़कर 64.7 फीसदी हो गया है। शुरुआती सालों में बढ़ोतरी धीमी रही, लेकिन 2020-21 में 41.2 प्रतिशत इजाफे के बाद हालात बेहतर हुए। कुछ राज्य डिजिटल एजुकेशन में आगे बढ़े, कुछ बहुत पीछे छूट गए। 

यह भी पढ़ें: जितनी कमाई नहीं, उससे ज्यादा है प्राइवेट स्कूलों की फीस, कैसे पढ़ेंगे बच्चे?

कहां बेहतर है कंप्यूटर सुविधाएं? राज्यवार देखिए आंकड़े

देश के कुछ राज्य और केंद्र शासित प्रदेश, कंप्यूटर सुविधा में बेहतर क्षमता के साथ काम कर रहे हैं। लक्षद्वीप में 100 फीसदी स्कूलों में कंप्यूटर सुविधाएं हैं। दिल्ली के 99.9 स्कूलों में कंप्यूटर कक्षाएं हैं। पुडुचेरी में 99.5 प्रतिशत, चंडीगढ़ में 99.5 प्रतिशत, केरल में 99.5 प्रतिशत और पंजाब में 99 प्रतिशत स्कूलों में कंप्यूटर सुविधाएं हैं। गुजरात, हरियाणा, दादरा-नगर हवेली, सिक्किम, तमिलनाडु, उत्तराखंड और नागालैंड में भी बहुत अच्छी स्थिति है।

कौन से राज्य पिछड़े हैं?

  • मेघालय: 19.7%
  • पश्चिम बंगाल: 25.1%
  • बिहार: 25.2%
  • मणिपुर: 38%
  • जम्मू-कश्मीर: 43.1%
  • अरुणाचल प्रदेश: 47.7% 

Niti Aayog Report on Primary Education AI Infographics ChatGPT

 

किन राज्यों में सुधार दिखा?

पिछले दशक में सबसे ज्यादा सुधार असम में दिखा है। पहले सिर्फ 9.8 प्रतिशत स्कूलों में कंप्यूटर था, अब 78.7 फीसदी स्कूलों में कंप्यूटर सुविधाएं हैं। झारखंड में 9.7 फीसदी से 76 फीसदी तक स्कूल, अब कंप्यूटर युक्त हो गए हैं। ओडिशा में पहले 13.7 प्रतिशत स्कूलों में कंप्यूटर था, अब 76.7 प्रतिशत स्कूलों में है। उत्तराखंड में 33 फीसदी से बढ़कर यह आंकड़ा 91.3 प्रतिशत तक पहुंच गया है। दादरा-नगर हवेली में 40.1 प्रतिशत से बढ़कर यह संख्या 97.2 प्रतिशत तक पहुंच गई है। कर्नाटक में 38.7 फीसदी से 55.7 फीसदी स्कूल, कंप्यूटर सुविधाओं वाले हैं। गोवा में 43.5 प्रतिशत से यह संख्या बढ़कर 57.1 प्रतिशत तक पहुंच गई है। 

यह भी पढ़ें: जवान होते भारत को चला रही 'बूढ़ों की सरकार', मंत्री, CM, PM सब 60 के पार

चिंता की क्या बात है?

एक तिहाई से ज्यादा स्कूल अभी भी कंप्यूटर से वंचित हैं और राज्यों के बीच बड़ा अंतर बरकरार है। हाल के कुछ वर्षों में इंटरनेट कनेक्टिविटी भी बढ़ी, फिर भी एक तिहाई स्कूल इन सुविधाओं से बाहर हैं। 2014-15 में सिर्फ 8.05 प्रतिशत स्कूलों में इंटरनेट था, जो 2024-25 में बढ़कर 63.5 फीसदी हो गया। 2019-20 के बाद बढ़ोतरी तेज हुई और 2020-21 के बाद कवरेज दोगुना से भी ज्यादा हो गया। दिल्ली, चंडीगढ़, लक्षद्वीप, पुडुचेरी, दादरा-नगर हवेली, दमन-दीव और आंध्र प्रदेश में इंटरनेट लगभग सभी स्कूलों में उपलब्ध है। गुजरात में 96.5%, गोवा में 93.2%, केरल में 91.7% और पंजाब में 88.9% स्कूलों में कंप्यूटर और इंटरनेट कनेक्टिविटी है। 

एक तिहाई स्कूल, 'डिजिटल डिटॉक्स' पर

देश का एक बड़ा वर्ग, जिसका काम, कंप्यूटर और स्मार्टफोन आधारित है, डिजिटल डिटॉक्स पर जाता है। तर्क दिया जाता है कि इससे कंप्यूटर, डिवाइस की आदत कुछ दिन छूटेगी, दिमाग बेहतर होगा, कुछ वक्त लोग, सिर्फ खुद से जुड़ेंगे, लत से दूर रहेंगे। देश के एक तिहाई स्कूलों का क्या, जहां पहले से ही सब डिजिटल डिटॉक्स पर हैं, शौक से नहीं, बल्कि इस वजह से कि वहां सुविधाएं ही नहीं हैं। 

नीति आयोग ने UDISE+ के हवाले से कहा है कि पश्चिम बंगाल के सिर्फ 18.6 फीसदी स्कूल इंटरनेट से जुड़े हैं। मेघालय में 26.4%, अरुणाचल प्रदेश में 33.6%, मणिपुर में 36.6%,  त्रिपुरा में 41.7%, मध्य प्रदेश 45.7% और उत्तर प्रदेश में 45.9% स्कूलों में ही इंटरनेट है। कर्नाटक में सिर्फ 50.7% स्कूल इंटरनेट से जुड़े हैं। 

Niti Aayog Report on Primary Education AI Infographics ChatGPT

कहीं सुधार है या सिर्फ निराशा है?

सबसे ज्यादा सुधार दादरा-नगर हवेली है। यहां पहले 6.7 फीसदी स्कूलों में इंटरनेट था, अब 99.5 प्रतिशत स्कूलों में है। आंध्र प्रदेश में 12.3% से 99% तक सुधार हुआ। असम में 1.3% स्कूल इंटरनेट कनेक्टिविटी वाले थे, अब 87.2% प्रतिशत हो गए हैं। बिहार में 1.3% से 84.8% स्कूल इंटरनेट कनेक्शन वाले हुए हैं। ओडिशा में 1.8% से बढ़कर यह आंकड़ा 83.8% प्रतिशत तक पहुंचा। पश्चिम बंगाल, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर में सुधार बहुत कम रहा।


7 में 6 स्कूल, स्मार्ट क्लास रूम के बिना 

नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि फंक्शनल स्मार्ट क्लासरूम की हालत अभी देश में बेहतर नहीं है। कहीं इंटरनेट नहीं है, कहीं कंप्यूटर हैं तो इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई की हालत खराब है। जो की पढ़ाई में डिजिटल क्लासरूम में बड़े सुधार की जगह बाकी है। साल 2021-22 में 14.9 प्रतिशत स्कूल, स्मार्ट क्लासरूम की सुविधा से संपन्न थे, साल 2024-25 में इसमें इजाफा हुआ, अब यह संख्या 30.6 फीसदी हो गई है। आज भी सात में से छह स्कूलों में स्मार्ट क्लासरूम नहीं हैं। 

यह भी पढ़ें: आरक्षण देने को बेताब भारत में कितनी सुरक्षित हैं महिलाएं? हैरान कर देंगे आंकड़े

स्मार्ट क्लासरूम के आंकड़े क्या हैं?

  • जो राज्य अच्छा कर रहे हैं
    चंडीगढ़: 95.2%
    लक्षद्वीप: 86.1%
    पंजाब: 80.1%
    दिल्ली: 75.7%
    पुडुचेरी: 72.5%
  • जिन राज्यों में बड़े परिवर्तन की दरकार है
    मेघालय: 4.3%
    पश्चिम बंगाल: 5.7%
    मिजोरम: 11.3%
    झारखंड: 14.8%
    बिहार: 14.9%)
    जम्मू-कश्मीर: 16.5%
    मणिपुर: 18.6%
    मध्य प्रदेश: 19.6%
    उत्तर प्रदेश: 19.8%

Niti Aayog Report on Primary Education AI Infographics ChatGPT

 

कहां आंकड़े बेहतर हुए हैं?

साल 2022 के बाद से इन राज्यों में आंशिक सुधार दिखा है। तमिलनाडु में पहले एक भी क्लास, स्मार्ट क्लासरूम वाला नहीं था, अब 60.8 फीसदी स्कूलों में स्मार्ट क्लास हैं। चंडीगढ़ ने 41.2 प्रतिशत से 95.2 प्रतिशत का आंकड़ा छुआ है। जमीन पर आंकड़ों की तस्वीर की पड़ताल करने, खबरगांव ने कुछ स्कूलों से, सामाजिक कार्यकर्ताओं और वहां के शिक्षकों से बात की। उनका क्या कहना है, आइए जानते है-


मृत्युंजय शुक्ल पेशे से अधिवक्ता हैं और सार्वजनिक शिक्षा के लिए काम भी करते हैं। उन्होंने खबरगांव के लिए कुछ स्कूलों का दौरा किया, वहां की स्थिति का विवरण बताया। मृत्युंजय, पहले संविलयन उच्च प्राथमिक विद्यालय, गैंसड़ा गए।

उन्होंने गैंसड़ा के प्राइमरी स्कूल के अध्यापक प्रकाश नाथ त्रिपाठी से बात की। प्रकाश नाथ त्रिपाठी ने बताया, 'डिजिटल इंडिया की क्रांति का असर शिक्षा व्यवस्था पर कुछ हद तक सकारात्मक ही रहा है। प्राथमिक विद्यालय में बच्चों की प्राथमिक शिक्षा की नींव रखी जाती है। ऐसे में नई तकनीक उनके सोचने, समझने की क्षमता को एक नई दिशा देती है।  दुनिया बदल रही है तो कहीं न कहीं ये तकनीक बच्चों के लिए अनिवार्य ही है।'

Primary Schools Gainsada Siddharthnagar
गैसड़ा प्राइमरी स्कूल।

चूकते कहां हैं स्कूल?

अध्यापक प्रकाश नाथ त्रिपाठी बताते हैं, 'आज भी कुछ ग्रामीण विद्यालय, जो दूरस्थ इलाकों में मौजूद हैं; वहां बिजली, तेज इंटरनेट, लैब आदि की व्यवस्था नहीं हो पाई है। परिगंवा इसीलिए डिजिटल इंडिया की क्रांति में ये विद्यालय पीछे ही रह गए हैं। स्कूलों में वाईफाई के लिए केबल बिछाए गए थे लेकिन अभी तक उस दिशा में काम नहीं हो पाया है। उम्मीद है आने वाले दिनों में हो जाएगा।' 

यह भी पढ़ें: सिर्फ विधायक के वेतन से BJP के सुदीप मुखर्जी ने कैसे खरीद ली 10 करोड़ की जमीन?



सिद्धार्थनगर के शोहरतगढ़ ब्लॉक में एक प्राइमरी स्कूल परिगंवा में है। यहां संतोष कुमार यादव शिक्षा मित्र के तौर पर सेवाएं दे रहे हैं। उन्होंने कहा, 'गांव में एक अरसे तक, बैठने की व्यवस्था नहीं थी। बच्चे जमीन पर बैठते थे। अब क्लास में बेंच है। यहां मुख्यमंत्री कंपोजिट विद्यालय प्रोजेक्ट, यूपी स्मार्ट क्लासरूम, आईसीटी प्रोजेक्ट और भारत नेट प्रोजेक्ट जैसी कुछ स्कीम चल रहीं हैं लेकिन ज्यादातर स्कूलों में अभी वाई फाई तक नहीं पहुंचा है। मेरे ही स्कूल में नेट नहीं है। जो सीटें हैं, उनमें से ज्यादातर प्रधान या हेड मास्टर की कोशिश की वजह से आईं हैं।'

Siksha Mitra

प्राइमरी स्कूल क्यों छोड़ रहे हैं बच्चे?

शिक्षा मित्र, संतोष कुमार यादव बताते हैं, 'जगह-जगह लोगों ने प्राइवेट स्कूल खोल लिया है। शिक्षक भले ही बीएड या बीटीसी न हों, धड़ल्ले से पढ़ा रहे हैं। लोगों में यह धारणा बैठ गई है कि सरकारी स्कूल है, क्या ही पढ़ाई होगी। गरीब तबके के बच्चे भी इसी ऊहापोह में रहते हैं कि कैसे यहां से निकलकर प्राइवेट स्कूल जाएं। अध्यापकों के बच्चे, ग्राम प्रधान और गांवों के मजबूत लोगों के बच्चे जब तक यहां नहीं पढ़ेंगे, स्कूलों से लोग भागते रहेंगे। यहां योग्य शिक्षक हैं, परीक्षा पास कर यहां तक पहुंचे हैं, अच्छी पढ़ाई होती है फिर भी बच्चे स्कूल छोड़ रहे हैं।'

यह भी पढ़ें: स्कूल छोड़ते बच्चे, शिक्षक नदारद, नीति आयोग ने क्या खमियां गिनाई हैं?

संतोष कुमार, शिक्षा मित्र, प्राथमिक विद्यालय, परिगंवा:- 

एक अच्छा संकेत यह है कि मिड डे मिल और स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्ति के बाद एक सुधार दिखा है कि पहले 50-60 बच्चे भी स्कूल नियमित पढ़ने नहीं आते थे, अब 130 से 150 के बीच में बच्चे पढ़ने आते हैं। स्कूल में बच्चों के मनोरंजन के साधन भी हैं, झूले और राइड्स भी बनाए गए हैं, ऐसे में अब छात्रों की संख्या बढ़ी है।

Primary Schools Parigawa
प्राथमिक विद्यालय, परिगंवा, शोहरतगढ़, सिद्धार्थनगर।

इस संबंध में बेसिक शिक्षा अधिकारी और अलग-अलग ब्लॉक शिक्षा अधिकारियों से खबरगांव ने संपर्क करने की कई बार कोशिश की, उनका जवाब नहीं आया। फोन रिसीव नहीं किया गया। 

मृत्युंजय शुक्ल बताते हैं, 'कंप्यूटर की सुविधा अभी ज्यादातर विद्यालयों में नहीं आ पाई है। शिक्षक भी कंप्यूटर के विशेषज्ञ नहीं हैं। प्राइमरी स्कूलों आज भी कई बच्चे ऐसे हैं जिनके पास स्मार्ट फोन आदि की व्यवस्था नहीं है। ये बच्चे इस दौड़ में पीछे छूट रहे हैं; इसीलिए सरकार को इन पहलुओं पर ध्यान देने की आवश्यकता है।'

स्कूल की चुनौतियां, जिनसे नीति आयोग वाकिफ है

नीति आयोग की रिपोर्ट ने शिक्षा व्यवस्था में असमानता को भी प्रमुख चुनौती बताया है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों, ग्रामीण इलाकों, आदिवासी समुदायों और विशेष जरूरत वाले बच्चों को अभी भी समान अवसर नहीं मिल पा रहे हैं। डिजिटल शिक्षा के विस्तार के बावजूद इंटरनेट और स्मार्ट डिवाइस तक पहुंच में बड़ा अंतर है। रिपोर्ट के अनुसार छोटे और दूरस्थ स्कूलों में डिजिटल सुविधाओं की भारी कमी है। इसी वजह से ऑनलाइन शिक्षा और तकनीक आधारित सीखने का लाभ सभी बच्चों तक समान रूप से नहीं पहुंच पा रहा।

हिंदी की कक्षा में छात्रा को प्रोत्साहित करते प्रकाश त्रिपाठी, अध्यापक, गैंसड़ा प्राथमिक विद्यालय। 

स्कूल बेहतर कैसे हो सकते हैं?

नीति आयोग ने अपनी 2026 में आई रिपोर्ट, 'स्कूल एजुकेशन सिस्टम इन इंडिया' में स्कूली शिक्षा में सुधार के लिए 33 बड़ी सिफारिशें दी हैं। इनमें सबसे अहम है 'कंपोजिट स्कूल' और 'स्कूल कॉम्प्लेक्स' मॉडल। इसका मतलब है कि छोटे-छोटे अलग स्कूलों को संसाधनों के स्तर पर आपस में जोड़ा जाए, ताकि शिक्षक, प्रयोगशाला, लाइब्रेरी और खेल सुविधाओं का साझा उपयोग हो सके। रिपोर्ट का मानना है कि इससे शिक्षा की गुणवत्ता और प्रशासनिक दक्षता दोनों बढ़ेंगी।

कुछ स्कूलों में अब शिक्षकों को स्मार्ट लर्निंग सिखाने के लिए टैब की व्यवस्था सरकार ने की है। 

नीति आयोग को भारतीय स्कूल व्यवस्था से उम्मीद क्या है?

नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, 'भारत ने स्कूल शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति की है, लेकिन अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। केवल स्कूलों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि कक्षा के भीतर शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना सबसे जरूरी है।'

 

नीति आयोग का मानना है कि शिक्षा सुधार केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज का मिशन होना चाहिए। केंद्र और राज्य सरकारों के साथ-साथ शिक्षकों, समुदायों, उद्योग जगत और सामाजिक संगठनों को मिलकर काम करना होगा। तभी भारत 2047 तक एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था बना सकेगा जो हर बच्चे को समान अवसर और बेहतर भविष्य दे सके।


और पढ़ें