पश्चिम बंगाल के पहाड़ी क्षेत्र दार्जीलिंग वाले इलाके में एक नए राज्य की मांग का मुद्दा फिर से चर्चा में है। इस बार केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह खुद इसकी वजह बने हैं। वह शनिवार को पश्चिम बंगाल पहुंचे और एक अहम मीटिंग में वादा किया कि इस समस्या का स्थायी समाधान निकाला जाएगा। एक बार फिर से एक कमेटी बनाई गई है जो इसी समाधान के संभावित तरीकों पर चर्चा करेगी। अब इस इलाके के लोगों को उम्मीद है कि दशकों पुरानी यह मांग शायद पूरी हो जाएगी और उन्हें एक ऐसा समाधान मिलेगा जिसके बाद प्रदर्शन करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। 

 

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह शनिवार यानी 22 अगस्त को पश्चिम बंगाल पहुंचे थे। उन्होंने दार्जीलिंग हिल्स के मुद्दे से जुड़े लोगों से मुलाकात की। इस मीटिंग में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के अलावा स्थानीय सांसद, विधायक और कई अलग-अलग समूहों के नेता भी मौजूद रहे। इस मीटिंग में अमित शाह ने एलान किया कि एक कमेटी बनाई जाएगी जो इस समस्या के 'स्थायी राजनीतिक समाधान' को तय करने और सहमति बनाने का ड्राफ्ट तैयार करेगी।

 

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गृह मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया कि इस कमेटी की अगुवाई पूर्व डिप्टी नेशनल सिक्योरिटी अडवाइजर और मौजूदा वार्ताकार पंकज कुमार सिंह करेंगे। इसी बयान में बताया गया कि 22 अगस्त को हुई मीटिंग में पहाड़ी इलाकों के लोगों की समस्याओं के बारे में विस्तार से चर्चा हुई और उनकी पहचान, स्थायी समाधान औऱ संविधान के नियमों के तहत एक पहचान देने को लेकर चर्चा हुई। गृहमंत्री अमित शाह ने खुद भरोसा दिलाया है कि भारत के संविधान के तहत संभव समाधान दिया जाएगा और गोरखा समुदाय की मांगों को लेकर वह खुद ध्यान देंगे।

मीटिंग में कौन-कौन आया?

इस मीटिंग में दार्जीलिंग से लोकसभा के सांसद राजू बिस्ता, इस क्षेत्र के तमाम विधायक, गोरखा जनमुक्ति मोर्चा, गोरखा नेशनल लिबरेशन के नेता, पूर्व विदेश सचिव और अब बीजेपी के सांसद हर्ष वर्धन शृंगला और पश्चिम बंगाल के सीएम शुभेंदु अधिकारी मौजूद थे। 

क्या है गोरखालैंड का विवाद?

पश्चिम बंगाल के नक्शे को देखें तो एकदम उत्तरी छोर पर आने वाले दार्जीलिंग क्षेत्र कोलकाता से काफी दूर दिखेगा। यह दूरी सिर्फ किलोमीटर में ही नहीं, क्षेत्रीय पहचान, भाषा और अन्य चीजों में भी दिखती है। इसी के आधार पर लंबे समय से मांग करते रहे हैं कि उनके इस इलाके को लेकर एक अलग राज्य बना दिया जाए और उसका नाम गोरखालैंड रखा जाए।

 

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लोगों का कहना है कि इसके लिए दार्जीलिंग की पहाड़ियों के साथ-साथ तराई क्षेत्र और दुआर क्षेत्र को भी शामिल किया जाए। इसको लेकर पिछले कई दशक में कई प्रदर्शन हुए हैं। इसी को लेकर कई बार हिंसा भी हो चुकी है। साल 2017 में ही 100 दिन लंबा प्रदर्शन चला था। तब 11 लोगों की जान भी गई थी।

 

इसके समाधान के तौर पर साल 1988 में दार्जीलिंग गोरखा हिल काउंसिल (DGHC)  और साल 2011 में गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (GTA) का गठन हुआ लेकिन इनसे लोग संतुष्ट नहीं हुए। यही वजह है कि लोग चाहते हैं कि अलग राज्य बनाया जाए। लोगों का तर्क है कि इस क्षेत्र के लोग मौलिक रूप से बंगाल से अलग हैं और वे अलग भाषा भी बोलते हैं।

क्या है स्थायी समाधान की बात?

इसका एक जिक्र साल 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी के मैनिफेस्टो में आया था। तब से ही इस पर खूब चर्चा हुई है। स्थानीय लोगों में भी उत्साह है और वे लगातार बीजेपी के नेताओं को अपना सांसद और विधायक चुन रहे हैं। मई 2026 में पहली बार पश्चिम बंगाल में बीजेपी की सरकार बनने के बाद उम्मीदें और बढ़ गई हैं। लोग भी दबाव बना  रहे हैं कि अब सही मौका है क्योंकि राज्य और केंद्र में एक ही पार्टी की सरकार है।

 

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हालांकि, इस तरह की कमेटी पहली बार नहीं बनाई जा रही है। अक्तूबर 2025 में भी पंकज कुमार सिंह को ही जिम्मेदारी दी गई थी कि वह गोरखा प्रतिनिधियों से बात करके उनकी मांग समझें। इसके पहले भी केंद्र और राज्य की सरकार की ओर से बातचीत के कई प्रयास हो चुके हैं।

 

समाधान की बात करें तो सबसे चर्चित मांग नया गोरखालैंड बनाने की रही है। हालांकि, समूचे बंगाल के लोग ऐसा नहीं चाहते हैं। एक तो दार्जीलिंग की लोकेशन बेहद संवेदनशील है। इसके एक और नेपाल, दूसरी ओर भूटान और नीचे की ओर मशहूर चिकन नेक और फिर बांग्लादेश है। इसी वजह से इस क्षेत्र को शांत और संतुष्ट रखना बेहद अहम है। चर्चा है कि अगर इस क्षेत्र के प्रतिनिधि सहमत होते हैं तो इसे एक केंद्र शासित प्रदेश बनाने पर विचार हो सकता है।