सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक याचिका की सुनवाई की दौरान कहा है कि किसी भी प्रदर्शन स्थल पर किसी का भी हमेशा के लिए अधिकार नहीं होता है। प्रदर्शन स्थल का इस्तेमाल एक तय समय तक ही किया जा सकता है, उसे दूसरों के लिए भी खाली छोड़ना होता है। जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाला बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी एक याचिका की सुनवाई कर रही थी। 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'आप हमेशा किसी एक प्रदर्शन स्थल पर नहीं आ सकते हैं। दूसरे भी प्रदर्शनकारी हैं। कहां किसान जाएंगे, कहां काम करने वाले लोग जाएंगे। ट्रेड यूनियन के लोग कहां जाएंगे। कहां बेघर लोग जाएंगे। हर किसी के पास प्रदर्शन का अधिकार है।'

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कोर्ट ने विरोध प्रदर्शनों के दौरान मजदूरों के होने वाले नुकसान का भी जिक्र किया है।

CJI सूर्यकांत:-
कुछ विवादित दावे हैं। विरोध प्रदर्शन का अधिकार, संवैधानिक है, ठीक वैसे ही जैसे व्यापार और व्यवसाय चलाने का अधिकार। हम प्रतिष्ठानों के आधार पर ही व्यवसायों की बात नहीं कर रहे हैं। हम दिहाड़ी मजदूरों की आजीविका के बारे में बात कर रहे है। वे लोग अपने घर का खर्च चलाने के लिए कहां जाएं।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन को जुलाई में सिर्फ एक दिन की इजाजत दी गई थी, यह प्रदर्शन 17 दिनों तक चला। बिना इजाजत प्रदर्शन के दौरान उन्होंने संसद मार्च भी किया। यह भारत की संप्रभुता का प्रतीक चिह्न है। आपको संसद में जाने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। आप बिना इजजात सुप्रीम कोर्ट में प्रदर्शन करने नहीं जा सकते हैं। 

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व्यापारियों की शिकायत क्या है?

सीनियर अधिवक्ता मुकुल रोहतगी व्यापारियों की तरफ से पेश हुए थे। उन्होंने दावा किया, 'प्रदर्शनों की वजह से 2 हजार करोड़ का नुकसान हो रहा है। रामलीला मैदान, दिल्ली में प्रदर्शन स्थल की जगह है। यह जगह, कनॉट प्लेस से सिर्फ 1 मील की दूरी पर है।'

 

मुकुल रोहतगी ने कहा, 'सिर्फ रामलीला मैदान के ही आसपास के इलाके में 50 लाख से ज्यादा लोग रहते हैं। वहां थोक बाजार हैं, आसिफ अली रोड है, दरियागंज, तुर्कमान गेट, कमला मार्केट और जामा मस्जिद, यह सब एक मील के दायरे में है। सरकार को एक योजना बनानी चाहिए, अब यह दिल्ली या किसी एक राज्य का मामला नहीं रह गया है। यह सिर्फ जंतर मंतर के बारे में भी नहीं है।'

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प्रदर्शन के खिलाफ क्या दलीलें दी गईं?

विरोध प्रदर्शनों के खिलाफ वकीलों ने दलील दी कि त्योहारों के मौके पर प्रदर्शनों की वजह से व्यापारियों को भारी नुकसान होता है और करोड़ों मजदूर, मजदूर, टेम्पो वाले और लोडर प्रभावित होते हैं। जस्टिस बागची ने पूछा कि क्या सिर्फ प्रदर्शनकारियों को ही नुकसान का जिम्मेदार माना जाए जबकि सरकार भी सड़कों पर बैरिकेडिंग करती है और कभी दुकानें बंद करवाती है। 

 

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि प्रदर्शनकारियों ने दुकानें जबरदस्ती बंद करवाईं, कभी-कभी हिंसा भी होती है, बिना अनुमति के लाखों लोगों को संसद की ओर मार्च के लिए नहीं बुलाया जा सकता और इससे दूसरों की रोजी-रोटी छिनती है।

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'सार्वजनिक स्थल पर निजता की उम्मीद बेमानी'

वकीलों ने कहा कि रामलीला मैदान प्रदर्शन के लिए तय जगह है, जंतर मंतर पहले ही शिफ्ट हो चुका है तो लोग कहां प्रदर्शन करें। प्रशांत भूषण ने निगरानी और निजता का मुद्दा उठाया तो अदालत ने कहा कि सार्वजनिक जगह पर खड़े होकर निजता की उम्मीद नहीं की जा सकती।