उत्तर प्रदेश के अयोध्या में स्थित राम मंदिर में चंदा चोरी का मामला सामने आने के बाद करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था को ठेस पहुंची है। राम मंदिर की तरह ही देश के बड़े मंदिरों में हर साल श्रद्धालुओं की ओर से करोड़ों रुपये का चढ़ावा दिया जाता है। इनमें नकद राशि के अलावा सोना, चांदी, आभूषण और अन्य कीमती वस्तुएं भी शामिल होती हैं। लंबे समय से यह सवाल उठता रहा है कि मंदिरों में आने वाले इस चढ़ावे का इस्तेमाल कैसे होता है और इसकी निगरानी किस तरह की जाती है। राम मंदिर में चंदा चोरी का मामला सामने आने के बाद इस मु्द्दे पर बहस एक बार फिर से शुरू हो चुकी है। 

 

देश के अलग-अलग राज्यों में मंदिरों के संचालन और उनके वित्तीय प्रबंधन के लिए अलग-अलग कानून लागू हैं। कई राज्यों में मंदिरों का प्रशासन संबंधित ट्रस्ट या धार्मिक संस्थाएं संभालती हैं, जबकि कई मंदिर राज्य सरकारों के बनाए गए कानूनों के तहत संचालित होते हैं। ऐसे में चढ़ावे के रखरखाव और खर्च की प्रक्रिया भी संबंधित कानून और ट्रस्ट के नियमों के अनुसार तय होती है। 

 

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चढ़ावे का हिसाब कैसे रखा जाता है?

मंदिरों में दानपात्र में आने वाली नकद राशि को तय प्रक्रिया के तहत खोला जाता है। इसके बाद नकदी की गिनती की जाती है और बैंक में जमा कराया जाता है। यदि चढ़ावे में सोना, चांदी या अन्य कीमती सामान होता है तो उसका अलग रिकॉर्ड तैयार किया जाता है। कई बड़े मंदिरों में यह पूरी प्रक्रिया अधिकारियों और कर्मचारियों की मौजूदगी में की जाती है। ऑडिट और लेखा-जोखा भी संबंधित नियमों के तहत कराया जाता है।

कहां खर्च किया जाता है चढ़ावे का पैसा?

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मंदिरों में मिलने वाले चढ़ावे का इस्तेमाल अलग-अलग उद्देश्यों के लिए किया जाता है। इसमें मंदिर के रखरखाव, पूजा-पाठ, कर्मचारियों के वेतन, श्रद्धालुओं की सुविधाओं, धार्मिक आयोजनों और कई मामलों में शिक्षा, स्वास्थ्य तथा सामाजिक सेवाओं से जुड़े कार्य भी शामिल हो सकते हैं। यह खर्च संबंधित मंदिर ट्रस्ट या प्रबंधन के नियमों के अनुसार किया जाता है। 

चोरी को कैसे रोका जाता है?

धार्मिक ट्रस्टों के लिए वित्तीय रिकॉर्ड रखना और ऑडिट कराना भी जरूरी होता है। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, मंदिरों और धार्मिक ट्रस्टों में आने वाले दान का लेखा-जोखा रखा जाता है। नकद दान, दानपात्र से मिलने वाली राशि और अन्य आय का रिकॉर्ड तैयार किया जाता है। इसके बाद तय नियमों के अनुसार, ऑडिट की प्रक्रिया पूरी की जाती है, ताकि आय और खर्च का हिसाब दर्ज रहे।

मंदिरों के दान का रिकॉर्ड नहीं

साल 2022 में लॉस्ट्रीट जर्नल ने केंद्र और कई राज्य सरकारों से सूचना के अधिकार (RTI) के तहत जानकारी मांगी थी। इसमें पूछा गया था कि मंदिरों से कुल कितना चढ़ावा आता है और इस राशि का उपयोग कहां किया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, कई विभागों और राज्य सरकारों ने जवाब दिया कि उनके पास इस तरह की जानकारी उपलब्ध नहीं है या मांगी गई जानकारी उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आती। 

 

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि गृह मंत्रालय ने बताया कि उसके पास इस संबंध में कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। वहीं कुछ विभागों ने आवेदन संबंधित राज्य सरकारों या अन्य विभागों को भेजने की बात कही। कई राज्यों ने भी उपलब्ध रिकॉर्ड न होने या RTI कानून की धारा 2(एफ) का हवाला देते हुए जानकारी नहीं दी।

 

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कोर्ट में भी उठा मुद्दा

रिपोर्ट के अनुसार, मंदिरों के प्रबंधन और चढ़ावे के उपयोग से जुड़े मामले पर सुप्रीम कोर्ट में भी सुनवाई हुई थी।  केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में साफ कहा है कि वह मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण के पक्ष में नहीं है। लॉस्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक, देश के कई राज्यों में मंदिरों के संचालन के लिए अलग-अलग कानून लागू हैं। इन कानूनों के तहत मंदिरों की संपत्ति, दान, प्रशासन और वित्तीय प्रबंधन की व्यवस्था तय की गई है। अलग-अलग राज्यों में संबंधित अधिनियमों के अनुसार मंदिरों का संचालन किया जाता है।