चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) का नाम और चुनाव चिह्न फ्रीज कर दिया है। आयोग ने पश्चिम बंगाल में 2 सीटों पर होने वाले उपचुनाव से पहले TMS में चल रहे सिंबल विवाद पर अपना अंतरिम आदेश जारी किया है। बता दें कि अप्रैल 2026 के विधानसभा चुनाव में हार झेलने के बाद पार्टी दो हिस्सों में बंट चुकी है। इनमें से एक का नेतृत्व ममता बनर्जी कर रही हैं और दूसरे का अरूप रॉय। ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई वाली बागी खेमे ने अरुप रॉय को अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AITC) का चेयरमैन बनाया है।
पश्चिम बंगाल में विधानसभा की दो सीटों नंदीग्राम और रेजीनगर पर उपचुनाव होने हैं। दोनों गुटों ने अपने-अपने उम्मीदवार तृणमूल कांग्रेस के नाम पर ही उतार दिए, जिससे भ्रम की स्थिति बनी। इस वजह से 17 सितंबर 2026 को चुनाव आयोग ने पार्टी का नाम और सिंबल पूरी तरह फ्रीज कर दिया यानी इस चुनाव में दोनों ही गुट तृणमूल कांग्रेस का नाम और निशान इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे।
चुनाव आयोग के अंतरिम आदेश में ममता बनर्जी के गुट का नाम 'ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस' (MAITC) और निशान 'फुटबॉल प्लेयर' रखा गया है। अरूप रॉय के ग्रुप को 'डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस' (DTC) नाम और निशान 'लिफाफा' दिया गया है।
यह भी पढ़ें: कभी वापस मिले तो कभी खत्म हो गए, फ्रीज होने वाले चुनाव चिह्नों की कहानी
क्या है पूरा विवाद?
अप्रैल 2026 में विधानसभा चुनाव हारने के बाद तृणमूल कांग्रेस टूट गई। नेता प्रतिपक्ष पद पर शोभनदेव चट्टोपाध्याय की नियुक्ति का विरोध करते हुए 59 विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुन लिया था। बाद में पार्टी ने ऋतब्रत बनर्जी और विधायक संदीपन साहा को हस्ताक्षर जालसाजी के आरोप में पार्टी से निकाल दिया। इसी के बाद ऋतब्रत गुट ने खुद को असली तृणमूल कांग्रेस बताते हुए जुलाई में पार्टी दफ्तर पर भी कब्जा कर लिया।
ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी दोनों पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर दावा जताते हुए चुनाव आयोग पहुंचे। अब उपचुनाव से पहले चुनाव आयोग ने पार्टी का नाम और 'फूल-घास' चुनाव चिह्न फ्रीज कर दिया और दोनों गुटों को नए नाम व सिंबल के लिए तीन-तीन विकल्प देने को कहा, जबकि इस पूरे विवाद पर अंतिम फैसला आ चुका है।
अब ममता बनर्जी गुट का नाम 'ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस' (MAITC) और निशान 'फुटबॉल प्लेयर' रखा गया है। अरूप रॉय के ग्रुप को 'डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस' (DTC) नाम और निशान 'लिफाफा' दिया गया है।
TMC नाम और चुनाव चिह्न विवाद, कब-क्या हुआ?
- अप्रैल 2026: विधानसभा चुनाव में TMC की करारी हार हुई।
- मई-जून 2026: नेता प्रतिपक्ष पद पर शोभनदेव चट्टोपाध्याय नियुक्ति का विरोध हुआ और 59 विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुना
- जून 2026: TMC ने ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को हस्ताक्षर जालसाजी के आरोप में पार्टी से निकाला
- जुलाई 2026: ऋतब्रत गुट ने खुद को असली TMC बताया और पार्टी दफ्तर पर कब्जा कर ताला लगा दिया
- 16 सितंबर 2026: उपचुनाव की आखिरी तारीख, दोनों गुटों ने TMC के नाम पर उम्मीदवार उतारे
- 17 सितंबर 2026: चुनाव आयोग में दिल्ली में सुनवाई हुई
- 18 सितंबर 2026: चुनाव आयोग ने TMC का नाम और सिंबल फ्रीज किया, दोनों गुटों को नए नाम-सिंबल के लिए 3-3 विकल्प मांगे
अब ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को पश्चिम बंगाल, मेघालय और त्रिपुरा राज्यों में मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी के तौर पर माना जाएगा और इसका नाम 'ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस' और निशान 'फुटबॉल प्लेयर' रखा गया है। अरूप रॉय के ग्रुप को 'डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस' नाम और निशान 'लिफाफा' दिया गया है।
कौन-कौन इस विवाद में शामिल?
ममता बनर्जी, तृणमूल कांग्रेस की मूल नेता हैं और पार्टी की संस्थापक भी। दूसरी ओर ऋतब्रत बनर्जी हैं, जो बागी गुट के नेता हैं। ऋतब्रत विधानसभा में 59 विधायकों को लेकर अलग हुए। साथ में संदीपन साहा, जो ऋतब्रत बनर्जी के साथ हस्ताक्षर जालसाजी के आरोप में पार्टी से निकाले गए थे। शोभनदेव चट्टोपाध्याय को पार्टी नेतृत्व द्वारा नेता प्रतिपक्ष चुना गया था, जिनकी नियुक्ति का विरोध हुआ। भारत निर्वाचन आयोग (ECI), जहां दोनों गुटों के दावों पर सुनवाई कर फैसला आया।
कहां से शुरू हुआ यह विवाद?
बता दें कि यह विवाद पश्चिम बंगाल विधानसभा, कोलकाता से शुरू हुआ, विधानसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी नेतृत्व ने नेता प्रतिपक्ष पद के लिए शोभनदेव चट्टोपाध्याय की नियुक्ति की, जिसका विरोध करते हुए ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में 59 विधायकों ने बगावत कर दी और खुद को अलग गुट घोषित कर लिया। इसके बाद दोनों गुट पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर दावा जताते हुए नई दिल्ली स्थित भारत निर्वाचन आयोग (ECI) पहुंचे, जहां 17 सितंबर 2026 को सुनवाई हुई और 18 सितंबर को आयोग ने पार्टी का नाम व चुनाव चिह्न फ्रीज करने का अंतरिम आदेश दिया।
कैसे सुलझा विवाद?
बता दें कि इस पूरे विवाद को सुलझाने के लिए चुनाव आयोग ने 'चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968' के पैरा-15 का इस्तेमाल किया, यह कानूनी प्रावधान किसी मान्यता प्राप्त पार्टी में टूट होने पर असली गुट और उसके नाम-निशान पर फैसला करने का अधिकार आयोग को देता है। हालांकि, यह अंतिम फैसला नहीं, चुनाव आयोग ने साफ कहा है कि दोनों गुटों के बीच विवाद पर अंतिम निर्णय अभी लंबित है और फिलहाल नाम व चुनाव चिन्ह आवंटित किए गए हैं।
