गोवा सरकार की भारतीय जनता पार्टी (BJP) अपने ही विधायकों के विरोध के बाद धर्मांतरण विरोधी बिल फिलहाल टाल दिया है। यह बिल विधानसभा में मानसून सत्र के आखिरी दिनों में पेश होने वाला था, लेकिन सोमवार को मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत के साथ हुई बैठक में कुछ BJP विधायकों ने इस विधेयक पर ऐतराज जताया। एक निर्दलीय विधायक ने भी विधेयक पर आपत्ति जताई थी। भारी विरोध के बाद सरकार ने विधेयक को टाल का फैसला लिया।
गोवा कैबिनेट ने बीते सप्ताह 'गोवा प्रोहिबिशन ऑफ अनलॉफुल कन्वर्जन ऑफ रिलिजन बिल, 2026' को मंजूरी दी थी। कालांगुट सीट से BJP विधायक माइकल लोबो ने बैठक के बाद कहा कि सरकार ने इस बिल को कैबिनेट से जल्दबाजी में पास करवा रही है। उन्होंने कहा कि बिल को पहले अच्छी तरह समझने और सभी को साथ लेकर चलने की जरूरत है।
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BJP के कुछ विधायक और विपक्ष साथ कैसे आए?
माइकल लोबो ने कहा कि हर किसी की धार्मिक आस्था जरूरी है और सभी धर्मों का सम्मान होना चाहिए। उन्होंने कहा कि गोवा में हालात गलत रास्ते पर जा रहे हैं और इस पर जल्द बात होनी चाहिए। BJP समर्थित निर्दलीय विधायक अलेक्सो रेजिनाल्ड लोरेंको ने भी कहा कि बैठक में सब इस बात पर राजी हुए कि बिल इस सत्र में नहीं लाया जाएगा।
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक विरोध करने वाले विधायकों ने विधेयक के समय पर सवाल उठाते हुए कहा कि गोवा में धर्मांतरण का कोई आंकड़ा या सबूत नहीं है। उनके मुताबिक गोवा एक शांत राज्य है, जहां लोग मिलजुलकर रहते आए हैं, इसलिए इस माहौल को बिगाड़ने की जरूरत नहीं है। निर्दलीय विधायक अलेक्सो रेजिनाल्ड लोरेंको ने यह भी बताया कि जो थोड़े मामले दर्ज भी हुए हैं, उनमें अभी तक चार्जशीट नहीं लगी है। कई मामले या तो अदालत में खारिज हो चुके हैं या बंद कर दिए गए हैं।
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गोवा के धर्मांतरण विरोधी विधेयक में था क्या?
गोवा कैबिनेट से पास हुए इस ड्राफ्ट विधेयक में जबरदस्ती, दबाव, लालच, धोखे या शादी के जरिए धर्मांतरण कराने पर उम्रकैद तक की सजा रखी गई थी। साथ ही कम से कम 50 हजार रुपये जुर्माना और पीड़ित को 5 लाख रुपये तक मुआवजा देने की बात कही गई थी। धर्म बदलने वाले व्यक्ति को जिला मजिस्ट्रेट या अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट के पास कम से कम 60 दिन पहले यह लिखकर देना होगा कि वह अपनी मर्जी से और बिना किसी दबाव के धर्म बदल रहा है।
अगर कोई शादी सिर्फ गैरकानूनी धर्मांतरण के लिए की गई पाई जाती तो उसे रद्द माना जाएगा। पुजारी, कर्मकांडी, मौलवी या मुल्ला जैसे धार्मिक लोगों को गैरकानूनी धर्मांतरण में शामिल पाए जाने पर 3 से 10 साल तक की सजा रखी गई थी।
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चर्च से सामजिक संगठनों तक, सबने किया विरोध
विपक्षी दलों, सामाजिक संगठनों के लोगों और गोवा के कैथोलिक चर्च ने इस बिल को वापस लेने की मांग की थी। काउंसिल फॉर सोशल जस्टिस एंड पीस और कैथोलिक एसोसिएशन ऑफ गोवा ने एक साझा बयान जारी किया। बयान में कहा गया कि यह विधेय आपसी भरोसे की जगह शक पैदा करेगा, सामाजिक सौहार्द की जगह निगरानी और डर पैदा कर सकता है।
सरकार की आलोचना क्यों हुई?
काउंसिल फॉर सोशल जस्टिस एंड पीस और दूसरे संगठनों ने कहा कि सरकार को धर्मांतरण रोकने के नाम पर लोगों की निजी आस्था पर नजर नहीं रखनी चाहिए और न ही धार्मिक शिक्षा, प्रार्थना सभाओं या समाज सेवा जैसे कामों को अपराध की तरह देखना चाहिए। संगठनों ने कहा कि सिर्फ इसलिए ऐसा कानून नहीं लाना चाहिए क्योंकि BJP शासित दूसरे राज्यों में पहले से ऐसे कानून लागू हैं।
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गोवा में क्यों नहीं चला बीजेपी का दांव?
उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश समेत देश के 10 से ज्यादा राज्यों में धर्मांतरण विरोधी कानून लागू करने के बाद BJP गोवा में यह लागू करने में नाकामयाब रही। गोवा की कुल आबादी में ईसाई और मुस्लिम अल्पसंख्यक वर्ग की हिस्सेदारी करीब 33 फीसदी से ज्यादा है। गोवा की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति अन्य राज्यों से काफी अलग है। मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत के नेतृत्व वाली कैबिनेट ने अगस्त 2026 में गोवा गैर-कानूनी धर्मांतरण रोकथाम विधेयक के मसौदे को मंजूरी तो दे दी थी, लेकिन मानसून सत्र में इसे पेश करने से पहले ही कैथोलिक चर्च, सामाजिक संगठनों, विपक्षी दलों और खुद BJP के अल्पसंख्यक विधायकों ने कड़ा ऐतराज जता दिया।
पार्टी विधायक माइकल लोबो और निर्दलीय विधायक एलेक्सो रेजिनाल्डो लौरेंको जैसे नेताओं ने साफ कर दिया कि राज्य में जबरन धर्मांतरण का कोई ठोस डेटा नहीं है और बिना आम सहमति के ऐसे कानून से राज्य का सामाजिक सौहार्द बिगड़ेगा। इस मजबूत आंतरिक विरोध और जनसंख्या संतुलन को देखते हुए BJP सरकार को विधानसभा में यह विधेयक पेश करने का फैसला टालना पड़ा।
